टीन का भोंपू, गुड़ की मिठाई से लेकर सोशल मीडिया तक, बिहार में यूं बदलता गया चुनाव प्रचार का तरीका

1952 में देश के पहले आम चुनाव यानी लोकसभा चुनाव के साथ बिहार में विधानसभा चुनाव भी कराए गए। देश का यह पहला चुनाव था तो बहुत सारी चीजें पहली बार हो रही थीं। इलाके में सड़कें नहीं थी। वाहनों की कमी थी। नेताओं को जनता तक बात पहुंचानी होती थी। इसके लिए स्कूली बच्चों की मदद ली जाती थी।

Bihar Assembly Election 2025 : बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहा है। इस चुनाव की हर छोटी बड़ी खबर, घटनाएं बिना देरी सभी तक पहुंच रही हैं। यानी चुनाव से जुड़ी हर गतिविधि, घोषणा, बयान लोगों तक रीयल टाइम में पहुंच रहे हैं। चुनाव-प्रचार के अंदाज, तरीके और साधन सभी आधुनिक हो गए हैं। चुनाव प्रचार में राजनीतिक दल सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल भी कर रहे हैं। जनता तक अपनी बात पहुंचाने और उससे जुड़ने के लिए सोशल मीडिया सबसे सशक्त संचार माध्यम बनकर उभरा है लेकिन एक समय ऐसा भी था जब संचार के साधन बहुत सीमित थे और आम लोगों तक इनकी पहुंच नहीं थी। चुनाव प्रचार तब भी होता था लेकिन उसका तरीका और पहुंच आज की तरह आधुनिक, तेज और सर्वव्यापी नहीं था। आज हम बिहार के बीते जमाने के चुनाव प्रचार के बारे में बात करेंगे।

Bihar Assembly Election

समय के साथ बदलता गया चुनाव प्रचार का रूप। तस्वीर-टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल

चुनाव प्रचार में ली जाती थी स्कूली बच्चों की मदद

1952 में देश के पहले आम चुनाव यानी लोकसभा चुनाव के साथ बिहार में विधानसभा चुनाव भी कराए गए। देश का यह पहला चुनाव था तो बहुत सारी चीजें पहली बार हो रही थीं। इलाके में सड़कें नहीं थी। वाहनों की कमी थी। नेताओं को जनता तक बात पहुंचानी होती थी। इसके लिए स्कूली बच्चों की मदद ली जाती थी। स्कूली बच्चों की रैली निकाल कर हाथ में झंडा दे दिया जाता और उन्हें पूरे गांव में घुमाया जाता था। बच्चों से नारे लगवाए जाते थे। तब लोगों को पता चलता था चुनाव का समय आ गया है।

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