Bihar Election: "शेषनवा को भैंसया पर चढ़ाकर के गंगाजी में हेला देंगे, अरे राज्य चुनाव आयुक्त कमिश्नर! हम तुमारा चीफ मिनिस्टर है, और तुम हमारा अफसर... तो ई शेषनवा कहां से बीच में टपकता है जी?", यह बात 1995 की है जब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव आग बबूला हो उठे थे। वजह थे उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन।
बिहार ने एक ऐसा दौर देखा था, जब बूथ कैपचरिंग और गोलीबारी के बिना चुनाव जीतना एक सपना था। 1984 लोकसभा चुनाव के दौरान इस राज्य में 24 लोगों की मौत हुई थी। 1985 विधानसभा चुनाव में 63 लोग मारे गए थे। 1989 लोकसभा चुनाव में 40 और 1990 विधानसभा चुनाव में 87 लोगों की मौत हुई थी। इसी साल पहली बार लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने।
1990: लालू यादव और टीएन शेषन का उदय
10 मार्च 1990 को पटना के पशु चिकित्सालय महाविद्यालय में अपने चपरासी भाई के क्वार्टर में रहने वाले 46 वर्षीय लालू यादव (Lalu Yadav) बिहार के मुख्यमंत्री बन गए। इसी साल दिल्ली के अशोक रोड स्थित निर्वाचन आयोग में एक शख्स की एंट्री हुई थी, नाम था टीएन शेषण। 12 दिसंबर 1990 को टीएन शेषन (T. N. Seshan) को देश का मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया।
टीएन शेषन ने अपनी ईमानदारी और ताकत का ऐसा इस्तेमाल किया, जिसकी वजह से सिस्टम को मन मुताबिक चलाने वालों में खौफ भर गया। इससे पहले देश ने ना तो चुनाव आयोग का ऐसा रूप देखा था और न ही ऐसा दमदार चीफ इलेक्शन कमिश्नर।
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साल 1990 से लेकर 1995 तक बिहार में लालू राज रहा। इस दौरान केंद्र में तीन प्रधानमंत्री और तीन पार्टियां सत्ता में आई। वहीं, बिहार में लालू यादव गरीबों और यादवों के मसीहा बन गए थे। पांच सालों के दौरान बिहार में बहुत कुछ बदल गया। अगर कुछ नहीं बदला तो वो था बिहार में चुनाव का तरीका।
टीएन शेषन ने बदल दिया EC का रूप-रंग
1991 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में टीएन शेषन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। शेषन का आदेश था कि चुनाव में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी हुई तो अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई होगी। हिमाचल चुनाव में भी टीएन शेषन ने सख्त रवैया अपनाया। उस समय देश में यह बात काफी चलन में थी कि भारत के नेता सिर्फ दो चीजों से डरते हैं। ऊपर भगवान और नीचे टीएन शेषन।
हालांकि, शेषन के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी साल 1995 का बिहार विधानसभा चुनाव। उस समय बैलेट पेपर से चुनाव हुआ करता था। बिहार में 'गुंडाराज' चरम पर था। बिहार में बूथ कैप्चरिंग, बैलेट पेपर लूट की और मारपीट-हिंसा की खबरें आम बात बन गई थी।
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शेषन ने असंभव को संभव कर दिखाया...
टीएन शेषन ने भी ठान लिया कि चाहे जो हो जाए, वो बिहार में पारदर्शी तरीके से चुनाव करवा कर ही दम लेंगे। शेषन ने सुनिश्चित किया कि जब तक बिहार में पार्दशी तरीके से चुनाव कराने का माहौल न बने तब तक चुनाव नहीं होंगे। विभिन्न कारणों से विधानसभा चुनाव की तारीखों को चार बार बदला गया।
मृत्युंजय शर्मा ने वेस्टलैंड बुक्स (Westland Books) से प्रकाशित अपनी किताब ”ब्रोकेन प्रॉमिसेज: कास्ट, क्राइम एंड पॉलिटिक्स इन बिहार” (Broken Promises: Caste, Crime and Politics in Bihar) में 1995 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव का जिक्र किया है।
उन्होंने लिखा है कि शेषन ने स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव (Free and fair Election) कराने के लिए पंजाब से कमांडो हायर कर लिए और बिहार के तमाम पोलिंग बूथ पर तैनात कर दिया। साथ ही, पहली बार कई चरणों में मतदान (Voting in phases) कराने का फैसला किया। शेषन की नजरें उन बूथों पर थी जो हिंसा और बूथ कैप्चरिंग के लिए बदनाम थे। राज्य में बड़े पैमाने पर अर्द्धसैनिक बलों (Para Military Forces) की तैनाती की गई।
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चुनाव के दौरान शेषन व लालू के बीच जो भी हुआ, उसका जिक्र दिवंगत पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने भी अपनी किताब 'बंधु बिहारी' में किया है। किताब में बताया गया है कि चुनाव के दौरान हर सुबह अपने आवास पर होने वाली अनौपचारिक बैठकों में लालू का गुस्सा शेषन पर होता था।
फूट पड़ा लालू यादव का गुस्सा
किताब के मुताबिक ऐसी ही एक बैठक में लालू ने कहा था, ''शेषन पगला सांड जैसा कर रहा है। मालूम नहीं है कि हम रस्सा बांध के खटाल में बंद कर सकते हैं।" लालू ने यहां तक कह दिया था कि ई शेषनवा जानता नहीं है हमें, हम इसके भैंसिया पे चढ़ा के गंगाजी में हेला देंगे।"
जब शेषन ने चौथी बार चुनाव स्थगित किया, तो लालू प्रसाद यादव का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने राज्य के तत्कालीन मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी आरजेएम पिल्लई को फोन लगाया। लगभग डांटने वाले अंदाज में कहा, "पिल्लई, हम तुम्हारा चीफ मिनिस्टर और तुम हमारा अफसर। ई शेषनवां कहां से बीच में टपकता रहता है? फैक्स भेजता रहता है... सब फैक्स-वैक्स उड़ा देंगे... इलेक्शन हो जाने दो।"
किसी भी हाल में टीएन शेषन बिहार में निष्पक्ष, शांतिपूर्ण और साफ-सुथरे चुनाव चाहते थे। राष्ट्रीय जनता दल और बिहार के लोगों के लिए ऐसा पहली बार हो रहा था, जब मुख्यमंत्री लालू यादव बेबस दिख रहे थे। जैसा लालू यादव चाहते थे। वैसा हो नहीं रहा था।
निष्पक्ष चुनाव में 'लालू राज' की हुई जीत
1995 बिहार विधानसभा चुनाव, देश में चलने वाला सबसे लंबा विधानसभा चुनाव था। 8 दिसंबर 1994 को चुनाव का ऐलान हुआ और 28 मार्च 1995 को चुनाव खत्म हुआ। हालांकि, लालू यादव के लिए यह दुख के भेस में सुख साबित हुआ। लालू यादव को राज्य के हर सूबे में जाकर चुनाव प्रचार करने का मौका मिल गया।
बिहार में हुए पहले स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव में लालू यादव ने 1990 के तुलना में जीत हासिल की। लालू यादव के नेतृत्व में जनता दल को 324 में से 167 सीटें मिलीं। पिछली बार से 45 अधिक। पहली बार राजद ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई।
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यह सिर्फ लालू यादव की जीत नहीं थी बल्कि चुनाव आयोग या यू कहें टीएन शेषन की भी जीत थी। उनकी जिद्द ने देश को दिखा दिया की चुनाव आयोग कितनी शक्तिशाली है। 11 दिसंबर 1996 तक टीएन शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी संभाली। उनके 6 साल के कार्यकाल ने चुनाव आयोग को ऐसा 'शक्तिशाली शेर' बना दिया था, जिसके डर से भ्रष्ट नेता और गुंडे थर-थर कांपते थे।
