Jamui Assembly Constituency Election 2025: बिहार में दो चरणों में होने वाले विधानसभा चुनावों में जमुई भी शामिल है। जमुई विधानसभा क्षेत्र में मतदान 11 नवंबर को होगा, जबकि मतों की गिनती 14 नवंबर को की जाएगी। जमुई, जो बिहार और झारखंड की सीमा पर स्थित है, एक जिला मुख्यालय के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक विरासत और भूगर्भीय विविधताओं के लिए जाना जाता है। फरवरी 1991 में यह मुंगेर से अलग होकर एक स्वतंत्र जिले के रूप में स्थापित हुआ।
जमुई विधानसभा चुनाव 2025
यह जिला भारत के 250 सबसे पिछड़े जिलों में शामिल है और ‘पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष’ (BRGF) पर निर्भर है। जमुई का इतिहास गौरवशाली रहा है, लेकिन वर्तमान में यह अनेक सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। यहां की साक्षरता दर महज 64.33% है, जिससे शिक्षा की स्थिति स्पष्ट होती है। गरीबी और आधारभूत सुविधाओं की भारी कमी यहां की प्रमुख समस्याएं हैं। जिला खनिज संसाधनों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है यहां मिका, कोयला, सोना और लोहा जैसे बहुमूल्य खनिज पाए जाते हैं। इसके बावजूद, प्रशासनिक उपेक्षा और योजनाओं के समुचित क्रियान्वयन की कमी ने इस क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा से दूर कर दिया है। जमुई की आवाज आज भी राज्य और केंद्र की सत्ता गलियारों तक सही मायनों में नहीं पहुंच पाई है।
बिहार की प्रमुख विधानसभा सीट
जमुई विधानसभा सीट बिहार की एक प्रमुख और राजनीतिक रूप से जागरूक सीट मानी जाती है, जिसका राजनीतिक इतिहास बदलावों और विभिन्न दलों के प्रभाव से भरा रहा है। वर्ष 1957 में इस सीट की स्थापना हुई थी, और शुरुआती वर्षों में यहां कांग्रेस, समाजवादी दलों और वामपंथी शक्तियों का खासा वर्चस्व देखने को मिला। 1967 से लेकर 1977 तक त्रिपुरारी प्रसाद सिंह ने लगातार चार बार जीत हासिल कर इस सीट पर मजबूत पकड़ बनाई। 1980 के दशक में यह क्षेत्र कभी कांग्रेस, तो कभी निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा।
किसने कब मारी चुनाव में बाजी?
1990 के बाद यहां जनता दल और फिर जेडीयू जैसे दलों की उपस्थिति बढ़ी और नए चेहरों ने सियासी मैदान में कदम रखा। 2005 का चुनाव खासतौर पर आरजेडी और जेडीयू के बीच कड़ा मुकाबला रहा, जिसमें विजय प्रकाश यादव और अभय सिंह जैसे नेताओं ने जीत दर्ज की। 2010 में जेडीयू ने फिर से सीट पर कब्जा जमाया, लेकिन 2015 के चुनाव में आरजेडी के विजय प्रकाश यादव ने वापसी करते हुए एक बार फिर से जीत हासिल की। जमुई की यह सीट समय-समय पर बदलते राजनीतिक समीकरणों और नेतृत्व के उत्थान-पतन का गवाह रही है, जो इसे बिहार की राजनीति में एक खास स्थान दिलाती है।
2020 की जीत में भाजपा का नया अध्याय
वर्ष 2020 में जमुई विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज की, जब अंतरराष्ट्रीय शूटर और पूर्व केंद्रीय मंत्री दिवंगत दिग्विजय सिंह की बेटी श्रेयसी सिंह ने आरजेडी के विजय प्रकाश यादव को लगभग 41,049 मतों के अंतर से हराकर बड़ी जीत हासिल की। इस परिणाम के साथ बीजेपी ने इस सीट पर एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू किया। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी क्षेत्र की संसदीय सीट से लोजपा (रामविलास पासवान) के प्रत्याशी अरुण भारती की जीत ने एनडीए की स्थिति को और मजबूत किया है। इससे आने वाले विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को लाभ मिलने की संभावना बढ़ गई है, खासकर तब जब वह पहले से ही इस क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ बना चुकी है।
जमुई में जातीय समीकरण क्या है?
यदि जातीय समीकरणों की बात करें, तो जमुई में यादव, मुस्लिम, अनुसूचित जाति और राजपूत समुदाय की उल्लेखनीय जनसंख्या है, जो हर चुनाव में परिणामों को गहराई से प्रभावित करती है। जमुई विधानसभा क्षेत्र की जनसंख्या संरचना में अनुसूचित जाति के मतदाता लगभग 18.63% हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय के मतदाताओं की भागीदारी करीब 13.6% है। यहां की आबादी में ग्रामीण क्षेत्रों का प्रभुत्व है, जहां 79.64% मतदाता गांवों से संबंधित हैं, जबकि मात्र 20.36% मतदाता शहरी क्षेत्रों से आते हैं। मतदाताओं की संख्या में भी समय के साथ बढ़ोतरी हुई है। 2020 के विधानसभा चुनाव में कुल मतदाता संख्या 2,95,169 थी, जो 2024 के लोकसभा चुनाव तक बढ़कर 3,22,586 हो गई।
2025 में राजनीतिक मुकाबले का केंद्र
हालांकि, जमुई क्षेत्र में विकास, रोजगार और स्थानीय अपेक्षाओं को लेकर मतदाताओं की चिंताएं अब भी कायम हैं, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों और अनुसूचित जाति के समुदायों में। ऐसे में 2025 के आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा विधायक श्रेयसी सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अपनी लोकप्रियता को बरकरार रखते हुए ठोस विकास कार्यों के आधार पर जनता का विश्वास दोबारा हासिल कर सकें। समग्र रूप से देखा जाए तो जमुई विधानसभा सीट एक बार फिर दिलचस्प राजनीतिक मुकाबले का केंद्र बन सकती है, जहां जातिगत समीकरण, विकास का मुद्दा और प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
