बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के मद्देनजर बिहार के मुख्यमंत्रियों के बारे में जानते-जानते अब हम आ पहुंचे हैं राज्ये के आठवें मुख्यमंत्री तक। मुख्यमंत्री सीरीज के तहत हम एक-एक मुख्यमंत्री के बारे में जान रहे हैं। आज बिहार के उस भोला पासवान शास्त्री के बारे में जानेंगे, जो तीन बार मुख्यमंत्री रहे। लेकिन कभी भी एक साल पूरा नहीं कर पाए। पहली बार वह 100 दिन के लिए मुख्यमंत्री रहे, जबकि दूसरी बार सिर्फ 13 दिन ही अपने पद पर रहे। तीसरी और आखिरी बार उनका कार्यकाल सबसे लंबा रहा और इस बार वह 222 दिन तक मुख्यमंत्री के पद पर रहे। पहली बार वह चौथी विधानसभा में मुख्यमंत्री बने और बाकी के दोनों बार पांचवी विधानसभा में मुख्यमंत्री रहे। चलिए जानते हैं भोला पासवान शास्त्री के बारे में, जिनकी ईमानदारी के कई किस्से आज भी जिंदा हैं।
बिहार के आठवें मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री
शुरुआती जीवन
भोला पासवान शास्त्री का जन्म 21 सितंबर 1914 को पूर्णिया जिले के बैरगाछी गांव में हुआ था। भोला पासवान ने 'शास्त्री' की उपाधि प्राप्त की थी। वह अत्यंत ईमानदार व्यक्ति थे। महात्मा गांधी से प्रभावित होकर वह भी स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए। भोला पासवान शास्त्री का जन्म एक बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था, लेकिन वे सुशिक्षित और बौद्धिक रूप से सशक्त थे।
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राजनीतिक जीवन
कांग्रेस ने भोला पासवान शास्त्री को तीन बार अपना नेता चुना और अविभाजित बिहार का मुख्यमंत्री बनाया। 1968 में वह पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, लेकिन 100 दिन ही इस पद पर रहे। इसके बाद 1969 में वह 13 दिन के लिए और 1971 में 222 दिन तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। वह बिहार के पहले मुख्यमंत्री थे जो अनुसूचित जाति के थे। उनका कार्यकाल निर्विवाद था और उनका जीवन बिल्कुल बेदाग व पारदर्शी था। उनके सम्मान में 1980 में भोला पासवान शास्त्री कॉलेज बभनगामा बिहारीगंज, मधेपुरा की स्थापना की गई।
पेड़ के नीचे जमीन पर बैठकर करते थे मीटिंग
भोला पासवान शास्त्री भले ही मुख्यमंत्री रहे हों या उससे पहले मंत्री, वह पेड़ के नीचे ही अपने काम निपटाते थे। वह जमीन पर कंबल बिछाकर बैठ जाते थे और वहीं पर अधिकारियों के साथ बैठकर सभी सभी मामलों का निपटारा करते थे। उनकी ईमानदारी की तो कसमें खाई जाती थीं। साल 1973 में वह केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार में भी मंत्री बने। तीन बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उनके पास कोई आलीशान बंगला नहीं था। वह हमेशा झोपड़ी में जिए और अंत समय तक झोपड़ी में ही जीवन भी गुजारा।
भोला पासवान शास्त्री पेड़ के नीचे बैठक बुलाते थे और झोपड़ी में रहते थे। इसके अलावा साइकिल से गांव जाना भी उनकी पहचान और विशिष्टता थी। जून 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ तो हरिहर सिंह की कांग्रेस सरकार गिर गई। उस समय भोला पासवान शास्त्री ने कांग्रेस (संगठन) गुट का साथ दिया और वह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन सिर्फ 13 दिन ही इस पद पर रहे। जून 1971 तक भोला पासवान कांग्रेस में वापस आए और 1972 विधानसभा चुनावों के दौरान वह 7 महीने तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। साल 1973 में वह केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार में मंत्री भी रहे।
श्राद्ध कर्म के लिए भी नहीं थे पैसे
भोला पासवान शास्त्री की ईमानदारी की कसमें खाई जाती थीं। जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके खाते में श्राद्ध कर्म तक के लिए पैसे नहीं थे। वह विवाहित थे, लेकिन पत्नी से अलग हो गए थे। उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी। उनके भतीजे बिरंची पासवान ने ही उन्हें मुखाग्नि दी थी। उस समय पूर्णिया के जिलाधीश ने उनका श्राद्ध कर्म करवाया था।
