बिहार में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो गई है। कल यानी सोमवार 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके पूरे चुनाव कार्यक्रम की जानकारी दी। इसके तहत 6 नवंबर को पहले चरण का मतदान होगा और 11 नवंबर को दूसरे चरण के तहत वोटिंग होगी। बाल दिवस के दिन यानी 14 नवंबर को मतगणना होगी। बिहार विधानसभा चुनावों को देखते हुए हम लगातार बिहार की राजनीति से जुड़े कई स्पेशल लेख की सीरीज पेश कर रहे हैं। ऐसी ही एक सीरीज बिहार के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को केंद्र में रखकर भी की जा रही है। इसी सीरीज में आज बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री रहे पंडित विनोदानंद झा की कहानी। पंडित विनोदानंद झा 2 साल 226 दिन तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। उनको मुख्यमंत्री पद से हटाने की कहानी बड़ी ही रोचक है। इस कहानी के बारे में भी जानेंगे।
बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री विनोदानंद झा
पं. विनोदानंद झा का शुरुआती जीवन
पंडित विनोदानंद झा का जन्म देवघर के प्रधान तीर्थ पुरोहित परिवार में हुआ था। 17 अप्रैल 1900 को जन्मे विनोदानंद झा ने देवघर में ही अपनी प्रारंभिक शिक्षा हासिल की। बाद में वह उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता चले गए और वहां विक्टोरिया हाई स्कूल में एडमिशन लिया। आगे चलकर उन्होंने कोलकाता सेंट्रल कॉलेज से पढ़ाई की और 1920 में अहमदाबाद में आयोजित हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन के बाद उन्होंने छात्र जीवन त्याग दिया, क्योंकि इससे पहले ही 1917 में उन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल होने शुरू कर दिया था। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण साल 1922, 1930, 1932, 1940 और 1942 में वह जेल भी गए। कहते हैं जब वह दुमका जेल में बंद थे तो एक अंग्रेज कमिश्नर आरचर ने उन्हें जान से मारने की कोशिश की थी।
किसानों के लिए बनी कमेटी में अहम भूमिका
विनोदानंद ने जेल में भी पढ़ाई जारी रखी। राजनीत व कई अन्य विषयों पर उन्होंने अच्छी पकड़ बना ली और लोग उन्हें बड़े ही धैर्यपूर्वक सुनते थे। देवघर नगर पालिका से उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखा। उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी सदस्य के तौर पर भी काम किया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में किसानों के लिए बनी कमेटी में विनोदानंद की मुख्य भूमिका मानी जाती है। उन्होंने श्रमिकों की समस्याओं के समाधान का मार्ग भी निकाला, इस संबंध में उनका काम प्रशंसनीय था। यही कारण है कि उन्हें आगे चलकर श्रम मंत्री का पद दिया गया।
मुख्यमंत्री पद तक का सफर
विनोदानंद झा को संथालपरगना की अच्छी जानकारी थी। बिहार विधानसभा के लिए चुने जाने के बाद उन्होंने संथालपरगना योजना कमेटी का गठन किया। वह 1936 से 1939 तक संसदीय सचिव के पद पर भी रहे। 1942 की क्रांति में उन्होंने पूरे संथालपरगना में क्रांति को घर-घर तक पहुंचाया। 1946 से 1951 तक वह स्वायत्त शासन विभाग और स्वास्थ्य विभाग में मंत्री भी रहे। साल 1961 में पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की मृत्यु के बाद 17 दिन के लिए दीप नारायण सिंह को कार्यवाहक मुख्यमंत्री बनाया गया। उनके बाद विनोदानंद झा को मुख्यमंत्री बनाया गया। वह 2 साल 226 दिन तक इस पद पर रहे।
मुख्यमंत्री विनोदानंद झा, 1962 में बीसीसी मेंबर्स मीटिंग के दौरान (फोटो - बिहार चैंबर्स ऑफ कॉमर्स)
मछली कांड और पंडित नेहरू से शिकायत
मुख्यमंत्री रहते हुए पंडित विनोदानंद झा ने उस समय सभी को चौंका दिया। जब उन्होंने कुछ कांग्रेस नेताओं पर ही साल 1963 में अपनी हत्या की साजिश रचने का आरोप लगा दिया। अपनी ही पार्टी के नेताओं पर लगाए गए इस आरोप से पार्टी में खलबली मच गई। मुख्यमंत्री ने इस बारे में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से भी शिकायत कर दी। दरअसल मुख्यमंत्री रहते हुए विनोदानंद झा ने एक बार खाने के लिए मछली मंगवाई। इस बीच उन्हें सूचना मिली थी कि मछली में जहर मिला है। सीएम विनोदानंद ने तुरंत इसकी शिकायत प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से कर दी और कहा कि 'मेरी हत्या की साजिश की गई थी, दुश्मनों ने मुझे मारने के लिए मछली भेजी थी।' खुफिया विभाग ने इस आरोप की जांच की और पीएमओ को एक मोटी जांच रिपोर्ट भेजी, इसमें के.बी. सहाय के करीबी माने जाने वाले रामलखन सिंह यादव का नाम मुख्य आरोपी के तौर पर दर्ज था।
कामराज्ड हो गए पंडित विनोदानंद झा
'मछली कांड' कांग्रेस कांग्रेस के लिए शर्मिंदगी का कारण बना और राजनीतिक गलियारों में इसको लेकर काफी चर्चा भी रहती थी। इसी बीच 'कामराज प्लान' सुर्खियों में आया। यह प्लान तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रह चुके के. कामराज के दिमाग की उपज बताया जाता है। कहते हैं उस समय उन्होंने 10 साल से सत्ता में बैठे कांग्रेसी नेताओं को पद छोड़कर संगठन में लाने के लिए यह प्लान बनाया गया था। इस प्लान के तहत उस समय कई मुख्यमंत्रियों को हटाया गया था। बिहार के मुख्यमंत्री विनोदानंद झा भी इस लिस्ट में आ गए। इस प्लान के तहत 2 अक्टूबर 1963 को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। उस समय के अखबारों ने इसके लिए एक नया शब्द गढ़ा 'कामराज्ड'। इस तरह से बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री पंडित विनोदानंद झा कामराज्ड हो गए।
सांसद बनने के कुछ ही महीनों बाद निधन
1900 में जन्मे पंडित विनोदानंद झा ने साल 1971 का लोकसभा चुनाव भी लड़ा। इस चुनाव में उन्होंने भारतीय जनसंघ के सुरेंद्र झा 'सुमन' को हराया और पहली बार लोकसभा पहुंचे। हालांकि, 13 अगस्त 1971 को उनका निधन हो गया। जब उनकी मृत्यु हुई तब वह घुटने के इलाज के लिए वेल्लोर जा रहे थे और रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई।
