Swami Vivekananda Chicago Speech in Hindi: तीस वर्ष का ज्योतिपुंज था, ज्ञान पुष्प का सुरभि कुंज था, मस्तक पर अरुणिम वो रेखा चकित रह गया जिसने देखा। जी हां, यहां पर हम बात कर रहे हैं देश के लाखों करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा के रहे स्रोत तेजस्वी युवा सन्यासी स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) की। स्वामी जी की सोच व उनका दर्शन विश्व बंधुत्व भावना से भरा है। इसके अलावा पूरी दुनिया को वह अपना देश मानते थे। भारत की वैदिक परंपरा को वैश्विक पटल पर रखने वाले विवेकानंद एक दूसरे की श्रेष्ठता के बजाए सार्वभौमिक धर्म की कल्पना करते थे। स्वामी जी अपनी मातृभूमि को ही स्वर्ग (Swami Vivekananda Chicago Speech) मानते थे। स्वामी विवेकानंद को भारतीय पुनर्जागरण का पुरोधा कहा जाता है, जिन्होंने भारत को विश्वगुरू के रूप में एक नई पहचान दिलाई। वह महज 25 साल की उम्र में सांसारिक मोह माया का त्याग कर सन्यासी बन गए, उन्होंने अपना पूरा जीवन ईश्वर की भक्ति और मानवता में निहित ईश्वर की सेवा में समर्पित कर दिया। स्वामी जी वेदांत के विख्यात व प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरू थे।
स्वामी विवेकानंद का शिकागो भाषण
ज्ञान परंपरा के शिखर पुरुष स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था, उनके पिता विश्वनाथ दत्त एक मशहूर वकील थे। माता भुवनेश्वरी देवी एक गृहंणी थी, वह प्यार से उन्हें नीलेश्वर पुकारती थी, लेकिन नामकरण के समय उनका नाम नरेंद्र नाथ दत्त (Swami Vivekananda Chicago Speech In Hindi) रखा गया। प्रत्येक वर्ष स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस बार हम स्वामी जी की 160वीं जन्मजयंती मनाने जा (Swami Vivekananda Speech) रहे हैं।
आपको शायद ही पता होगा कि, स्वामी जी बचपन में अंग्रेजी भाषा से काफी नफरत करते थे, वह अंग्रेजी नहीं सीखना चाहते थे। लेकिन जब बात देश के सम्मान की आई तो स्वामी जी ने अंग्रेजों को नतमस्तक होने के लिए मजबूर कर दिया। भारत को चूहों और सांपों का देश कहने वाले अंग्रेजों को भारत को विश्वगुरू मानना पड़ा।
पूरी दुनिया हो उठी थी जब स्वामी विवेकानंद की मुरीद:
11 सितंबर 1893 का दिन आज भी हमारे इतिहास के पन्नों में दर्ज है। यही वह दिन है जब भारत के एक युवा सन्यासी पश्चिमी देशों सूट बूट वाले बड़े बड़े विद्वानों को बौना साबित कर दिया था। तथा भारत को विश्व गुरु के रूप में एक बार फिर पुनर्स्थापित कर दिया था। इस दिन का जिक्र करते ही हर भारतीय की छाती गर्व से भर जाती है। जब भी स्वामी विवेकानंद का जिक्र होता है, अमेरिका के शिकागो की धर्म संसद में भाषण की बात जरूर की जाती है। यही वह दिन था जब पूरा विश्व भारत के एक युवा तपस्वी का मुरीद हो उठा था और भारत को अपना विश्वगुरु मानने के लिए मजबूर हो गया था। यहां हम आपके स्वामी विवेकानंद का पूरा भाषण लेकर आए हैं।ऐसे पहुंचे अमेरिका:
1893 में अमेरिका के शिकागो की विश्व धर्म संसद स्वामी विवेकानंद के जीवन के लिए एक नया मोड़ साबित हुई। राजस्थान के खेतड़ी के राजा अजीत सिंह के आर्थिक सहयोग से स्वामी विवेकानंद शिकागो के धर्म संसद में शामिल हुए। कहा जाता है कि, अजीत सिंह ने ही उन्हें स्वामी विवेकानंद नाम दिया और उन्हें शिकागो में आयोजित धर्म संसद में भाग लेने के लिए प्रेरित किया था।स्वामी जी शिकागो धर्म संसद में भाग लेने पहुंचे, तो भारत को तीसरी दुनिया मानने वाले और संपेरों का देश कहने वाले अंग्रेज उन्हें देख मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने स्वामी जी का मजाक उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ा। स्वामी विवेकानंद सभा में निश्चिंत बैठे रहे और सभा में अलग-अलग देशों से आए विद्वानों को एकाग्र होकर सुनते रहे। कुछ देर बाद स्वामी विवेकानंद का नाम पुकारा गया, वह बड़े ही सहज भाव से मंच की ओर बढ़े। पूरे विश्व की निगाहें मंच की ओर टिकी थी कि, भारत क्या कहेगा। स्वामी जी मंच पर खड़े होकर बड़ी सहजता से चारों ओर देखने लगे, लोगों की उत्सुकता बढ़ने लगी कि भारत आखिर क्या बोलेगा। कुछ पल गुजर जाने के बाद, स्वामी जी सिर्फ पांच शब्द बोले, जिसे सुनने के बाद सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इन्हीं पांच शब्दों ने आने वाले 500 वर्षों के लिए सनातन संस्कृति का ध्वज गाड़ दिया। बता दें इस दौरान स्वामी विवेकानंद की उम्र महज 30 वर्ष थी।
पांच शब्दों ने गाड़ दिया सनातन संस्कृति का ध्वज
स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण की शुरुआत सिस्टर्स एंड ब्रदर्श ऑफ अमेरिका से की, इन पांच शब्द दुनिया में विश्व बंधुत्व का संदेश बनकर गूंज उठे। स्वामी जी ने भाषण के शुरुआत में ही कहा कि, आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा ह्रदय अपार हर्ष से भर गया है।कुछ इस तरह दी हिंदू धर्म की परिभाषा
स्वामी जी ने सनात धर्म की परिभाषा देते हुए कहा कि, मैं आपको दुनिया के पौराणिक भिक्षुओं की तरफ से धन्यवाद देता हूं, मैं आपको सभी धर्मों के जननी के तरफ से धन्यवाद देता हूं और मैं आपको सभी जाति संप्रदाय के लाखों करोड़ो हिंदुओं की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मेरा धन्यवाद उन वक्ताओं को भी जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार पूर्व के देशों से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता व सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। उन्होंने कहा कि, हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे गर्व है कि मैं ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी सताए गए लोगों को शरण दी है।सभी धर्मों का किया सम्मान
स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण में सभी धर्मों का सम्मान करते हुए कहा कि, मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने उन इजराइलियों की स्मृतिया बचाकर रखी हैं, जिनके मंदिरों को रोमियों ने तोड़कर खंडहर बना दिया था, तब उन्होंने भारत में शरण ली। मुझे इस बात पर गर्व है, जिसने महान पारसी देशों के अवशेषों को शरण दी और अभी भी उन्हें बढ़ावा दे रहा है। भाइयों मैं आपको एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा, जिसे मैंने बचपन से ही स्मरण किया व दोहराया है। यह श्लोक रोजाना करोड़ो लोगों द्वारा दोहराया जाता है। जिस तरह विभिन्न धाराओं की उत्पत्ति विभिन्न स्रोतों से होती है, उसी प्रकार मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग अलग मार्ग चुनता है, जो देखने में भले ही अलग हों, लेकिन सभी का रास्ता ईश्वर तक ही होता है।इस भाषण के बाद पूरा विश्व स्वामी विवेकानंद का मुरीद हो उठा था। विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद को सर्वश्रेष्ठ वक्ता माना गया व भारत को विश्वगुरु की उपाधि दी गई। अगले दिन न्यूयॉर्क टाइम्स का फ्रंट पेज स्वामी जी के भाषण से भरा हुआ था।
