Bharat Kokila Sarojini Naidu: The woman who called Mahatma Gandhi Mickey Mouse: भारत कोकिला के नाम से विख्यात सरोजिनी नायडू की जयंती पर देशभर में उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया जा रहा है। कवयित्री, स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर वक्ता के रूप में उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और महिला सशक्तिकरण को नई दिशा दी। उनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक वैज्ञानिक और शिक्षाविद थे, जबकि उनकी मां वरदसुंदरी कवयित्री थीं। साहित्य और विज्ञान के इस अनोखे संगम ने सरोजिनी के व्यक्तित्व को गहराई दी। उनका जीवन आज भी साहस, संवेदनशीलता और राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा देता है। सरोजिनी नायडू को आमतौर पर एक कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद किया जाता है, लेकिन उनके व्यक्तित्व के कई ऐसे अनछुए पहलू भी हैं, जो उन्हें और भी विशिष्ट बनाते हैं।
कैम्ब्रिज और लंदन के किंग्स कॉलेज की छात्रा
13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में जन्मी सरोजिनी नायडू बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा की धनी थीं। मात्र 12 वर्ष की आयु में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी और किशोरावस्था में ही अंग्रेजी में लंबी कविताएं लिखकर सबको चौंका दिया था। बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने कैम्ब्रिज और लंदन के किंग्स कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की, जहां उनके लेखन को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। प्रसिद्ध कवि एडमंड गोस ने उनकी रचनाओं को भारतीय विषयों पर केंद्रित करने की सलाह दी, जिसके बाद उनकी कविताओं में भारतीय संस्कृति, प्रकृति और लोकजीवन की झलक और प्रखर हो गई।
सरोजिनी नायडू की जयंती
महात्मा गांधी को मिकी माउस कहने वाली महिला
सरोजिनी नायडू का एक अनछुआ पहलू उनका निर्भीक और विनोदी स्वभाव भी था। वे महात्मा गांधी को मजाक में “मिकी माउस” कहकर संबोधित करती थीं और राजनीतिक तनाव के बीच भी अपनी हाजिरजवाबी से माहौल हल्का कर देती थीं। उनका यह मानना था कि संघर्ष के बीच मुस्कान भी एक ताकत होती है। महात्मा गांधी को “मिकी माउस” कहने का संदर्भ अनु कुमार द्वारा लिखित पुस्तक "सरोजिनी नायडू: द नाइटिंगेल एंड द फ्रीडम फाइटर: व्हाट सरोजिनी नायडू डिड, व्हाट सरोजिनी नायडू सेड" में मिलता है। सरोजिनी नायडू ने ‘द गोल्डन थ्रेशोल्ड’ (1905) और ‘द बर्ड ऑफ टाइम’ (1912) जैसी शानदार रचनाएं दीं। महात्मा गांधी ने उनकी लेखनी और भावनाओं के उग्र प्रदर्शन को देखकर ही उन्हें ‘नाइटिंगेल ऑफ इंडिया’ कहा था।
सरोजिनी नायडू और महात्मा गांधी (Image: mkgandhi.org)
उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल
राजनीति में उनकी भूमिका केवल भाषणों तक सीमित नहीं थी। वे 1925 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं। स्वतंत्रता के बाद वे उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल नियुक्त हुईं। यह उपलब्धि उन्हें भारतीय राजनीति में अग्रणी स्थान दिलाती है। हालांकि प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बावजूद उन्होंने कविता और लेखन से दूरी नहीं बनाई।
महिला शिक्षा और अधिकारों की प्रबल समर्थक
सरोजिनी नायडू का जीवन केवल स्वतंत्रता संग्राम की कहानी नहीं, बल्कि साहस, संवेदनशीलता और सृजनशीलता का अद्भुत संगम है। उनके अनसुने पहलू यह बताते हैं कि वे केवल एक कवयित्री या नेता नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की विचारधारा को आकार देने वाली प्रेरणास्रोत व्यक्तित्व थीं। एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वे महिला शिक्षा और अधिकारों की प्रबल समर्थक थीं। उन्होंने देशभर में महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के लिए प्रेरित किया। उनके भाषणों में राष्ट्रप्रेम के साथ-साथ सामाजिक समानता की स्पष्ट आवाज सुनाई देती थी। 1917 के बाद उन्होंने अपनी कलम को कुछ समय के लिए विराम दिया और मातृभूमि की पुकार पर वह पूरी तरह स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ीं। 1920 के असहयोग आंदोलन में उन्होंने सैकड़ों सभाओं में दहाड़ लगाई।
सरोजिनी नायडू को भारत कोकिला क्यों कहा गया
सरोजिनी नायडू के नाम दर्ज प्रमुख रिकॉर्ड
सरोजिनी नायडू के नाम भारतीय इतिहास में कई महत्वपूर्ण रिकॉर्ड दर्ज हैं। वे 1925 में कानपुर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला थीं (इससे पहले 1917 में एनी बेसेंट अध्यक्ष बनी थीं, जो भारतीय मूल की नहीं थीं)। वे उन शुरुआती भारतीय महिलाओं में शामिल थीं जिन्होंने इंग्लैंड के किंग्स कॉलेज, लंदन और गिर्टन कॉलेज, कैम्ब्रिज में उच्च शिक्षा प्राप्त की। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1947 में वे उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल बनीं और स्वतंत्र भारत की पहली महिला राज्यपाल होने का गौरव भी उन्हें ही प्राप्त है। साहित्य के क्षेत्र में उन्हें “भारत कोकिला” की उपाधि मिली, जो उनकी काव्य प्रतिभा और ओजस्वी वक्ता होने का प्रमाण है। उस दौर में जब महिलाओं का घर से निकलना मुश्किल था, सरोजिनी नायडू ने पर्दा प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ जंग छेड़ी। लंदन में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने महिलाओं के वोटिंग राइट्स के लिए आवाज उठाई थी। वे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई बार जेल जाने वाली अग्रणी महिला नेताओं में भी रहीं, जिसने उन्हें महिला नेतृत्व की प्रतीक के रूप में स्थापित किया।
सम्मान और उपाधियां
सरोजिनी नायडू को उनके साहित्यिक और राष्ट्रीय योगदान के लिए अनेक सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें “भारत कोकिला” की सम्मानजनक उपाधि मिली, जो उनकी मधुर काव्य शैली और प्रभावशाली भाषणों के कारण प्रचलित हुई। उनकी जयंती 13 फरवरी को भारत में राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाई जाती है, जो उनके महिला सशक्तिकरण के योगदान को सम्मानित करता है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व ने उन्हें भारतीय इतिहास में स्थायी सम्मान दिलाया। देशभर के साहित्यिक और सामाजिक मंचों पर उन्हें विशेष सम्मान दिया गया। स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया और आज भी कई शिक्षण संस्थान, सड़कें और पुरस्कार उनके नाम पर स्थापित हैं।
सरोजिनी नायडू की शैक्षिक यात्रा
उन्होंने मात्र 12 वर्ष की आयु में मद्रास विश्वविद्यालय से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी, जो उस समय एक अद्भुत उपलब्धि मानी जाती थी। किशोरावस्था में ही उन्होंने अंग्रेजी में लंबी कविता “The Lady of the Lake” लिखकर अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया। उनकी मेधा से प्रभावित होकर हैदराबाद के निजाम ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की। इसके बाद वे इंग्लैंड गईं, जहां उन्होंने लंदन के किंग्स कॉलेज और बाद में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के गिर्टन कॉलेज में अध्ययन किया। विदेशी शिक्षा ने उनके व्यक्तित्व को वैश्विक दृष्टिकोण दिया, वहीं भारतीय संस्कारों ने उनकी रचनाओं को देश की मिट्टी से जोड़े रखा। इंग्लैंड में रहते हुए उनका संपर्क प्रसिद्ध साहित्यकारों से हुआ। विशेष रूप से कवि एडमंड गोस ने उन्हें भारतीय विषयों पर लेखन करने की प्रेरणा दी, जिसने उनकी काव्य शैली को नई दिशा दी। उनकी शैक्षिक यात्रा ने न केवल उन्हें एक सशक्त कवयित्री बनाया, बल्कि आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में प्रभावशाली वक्ता और नेता बनने की नींव भी रखी। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें कई बार जेल में डाला, लेकिन उनके हौसले को कोई सलाखें नहीं रोक सकीं।
