भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और गड़बड़ी से जुड़े मामलों में अब तेजी आने की उम्मीद है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) देशभर में लंबे समय से लंबित पड़े करीब 158 मामलों को जल्द निपटाने के लिए बड़ा कदम उठाने जा रही है। इन सभी मामलों की जांच पूरी हो चुकी है, लेकिन अलग-अलग अदालतों में अब तक सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है। इनमें कुछ मामले ऐसे भी हैं, जो करीब 20 साल पहले दर्ज किए गए थे।
पेपर लीक मामलों पर CBI का बड़ा एक्शन
सूत्रों के अनुसार, CBI इन लंबित मामलों को विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों में स्थानांतरित कराने के लिए सभी हाई कोर्ट से संपर्क करेगी। ये अदालतें नए एंटी-पेपर लीक कानून के तहत बनाई जा रही हैं ताकि परीक्षा से जुड़े मामलों का तेजी से निपटारा किया जा सके।
सरकारी वकील उपलब्ध करवाएगी सीबीआई
सूत्रों ने बताया कि CBI ने हाई कोर्ट को यह बताने का फैसला किया है कि वह इन मुकदमों को चलाने के लिए खास सरकारी वकील (स्पेशल प्रॉसिक्यूटर) उपलब्ध कराएगी और सभी जरूरी संसाधन मुहैया कराएगी ताकि ये मामले जल्द से जल्द निपटाए जा सकें। सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में साल 2000 से ऐसे लगभग 25 मामले हैं जिनमें CBI की जांच पूरी होने के बावजूद सुनवाई का इंतजार है। इनमें 2010-11 की AIIMS PG भर्ती परीक्षा, 2011 की दिल्ली यूनिवर्सिटी मेडिकल और डेंटल प्रवेश परीक्षा, 2004 की CAT (कॉमन एडमिशन टेस्ट) में गड़बड़ी, 2013 की SSC (स्टाफ सिलेक्शन कमीशन) भर्ती और शिक्षकों की भर्ती से जुड़े मामले शामिल हैं।
बिहार में पांच केस लंबित
उन्होंने बताया कि बिहार में पांच लंबित मामले हैं, जिनमें NEET 2024 के कथित पेपर लीक से जुड़े तीन मामले और 2003 व 2011 की PMT (प्री-मेडिकल टेस्ट) में गड़बड़ी के मामले शामिल हैं।
हिमाचल प्रदेश में 3 मामले लंबित
हिमाचल प्रदेश में, 2022 का कॉन्स्टेबल भर्ती मामला उन तीन मामलों में शामिल है जिनकी सुनवाई शुरू होने का इंतजार है। जम्मू-कश्मीर में तीन मामलों में सुनवाई का इंतजार है, जिनमें जूनियर इंजीनियर और कॉन्स्टेबल भर्ती में गड़बड़ी के मामले शामिल हैं।
झारखंड में पांच केस
इसी तरह, झारखंड में पांच, कर्नाटक में पांच, महाराष्ट्र में तीन (जिनमें NEET 2024 से जुड़े दो मामले शामिल हैं), राजस्थान में आठ, तमिलनाडु में 14 और पश्चिम बंगाल व उत्तर प्रदेश में 10-10 मामलों में सुनवाई का इंतज़ार है।
देरी से कमजोर पड़ जाते हैं मुकदमे
सरकारी अधिकारियों का तर्क है कि लंबी देरी से सफल अभियोजन की संभावना बुरी तरह प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे साल बीतते हैं, गवाह बूढ़े हो जाते हैं या उपलब्ध नहीं रहते, यादें धुंधली हो जाती हैं, आरोपी की पहचान करना मुश्किल होता जाता है और अक्सर गवाही बदल जाती है। जांच अधिकारियों, अभियोजकों और यहां तक कि पीठासीन न्यायाधीशों के बार-बार तबादलों से कार्यवाही और भी जटिल हो जाती है, जिससे यह जोखिम बढ़ जाता है कि देश में परीक्षा धोखाधड़ी के कुछ मुकदमे विफल हो सकते हैं।
नए कानून में क्या है व्यवस्था?
हाल ही में संसद से पास हुए 'सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन अधिनियम, 2026 के तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से सलाह करके एक सेशन कोर्ट को 'विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट' के तौर पर तय करना होगा।
इस कानून में प्रावधान है कि ये फास्ट-ट्रैक कोर्ट बिना किसी गैर-ज़रूरी रुकावट के रोज़ाना मामलों की सुनवाई करेंगे, चार्जशीट दाखिल होने के तीन महीने के अंदर ट्रायल पूरा किया जाएगा, और दूसरे कोर्ट में पहले से लंबित मामलों को इन नए विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट में ट्रांसफर किया जाएगा, जिनका निपटारा ट्रांसफर के तीन महीने के भीतर किया जाना है।
इनपुट- पीटीआई
