भारतीय प्रतिभा, भारतीय तकनीक और भारतीय सपने अब पृथ्वी की सीमाओं को लांघकर एक नया इतिहास रचने वाले हैं। अंतरिक्ष जगत में हिंदुस्तान एक ऐसा कीर्तिमान बनाने जा रहा है, जिससे पूरी दुनिया की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। क्योंकि पहली बार कोई निजी भारतीय कंपनी पृथ्वी की कक्षा में अपना ऑर्बिटल रॉकेट भेजने जा रही है। यह रॉकेट श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर के 'फर्स्ट लॉन्च पैड' पर उड़ान के लिए तैयार है। इस उड़ान के साथ भारत अंतरिक्ष महाशक्ति बनने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ जाएगा। आज हम अंतरिक्ष जगत के इस ऐतिहासिक कार्यक्रम पर बात करेंगे, साथ ही यह भी जानेंगे कि भारत की इस ऊंची उड़ान से अमेरिका और चीन की नींदें क्यों उड़ी हुई हैं। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों को इन सवालों के जवाब जरूर मालूम होने चाहिए?
विक्रम 1 ऑर्बिटल रॉकेट (Photo: X/SkyrootA)
विक्रम 1 क्या है
बता दें कि भारत के स्पेस इतिहास में पहली बार कोई प्राइवेट कंपनी पृथ्वी की कक्षा यानी Orbit में अपना रॉकेट भेजने जा रही है। स्काईरूट एयरोस्पेस नाम की कंपनी ने अपनी इस पहली टेस्ट फ्लाइट को 'मिशन आगमन' नाम दिया है। कंपनी का पहला ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर के 'फर्स्ट लॉन्च पैड' से उड़ान भरेगा और तारीख तय की गई है 12 जुलाई से 4 अगस्त 2026 के बीच। अगर यह मिशन सफल रहता है तो भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में और मजबूती से खड़ा होगा, जहां सरकारी एजेंसियों के साथ-साथ निजी कंपनियां भी अंतरिक्ष में रॉकेट लॉन्च करती हैं।
विक्रम 1 की खासियत क्या है?
दरअसल नवंबर 2022 में स्काईरूट ने विक्रम-S रॉकेट लॉन्च किया था। यह एक सब-ऑर्बिटल मिशन था। यानी रॉकेट अंतरिक्ष की सीमा तक गया और वापस लौट आया। लेकिन विक्रम-1 का लक्ष्य कहीं बड़ा है। यह रॉकेट लगभग 450 किलोमीटर की ऊंचाई तक जाएगा और पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करेगा। यही वह उपलब्धि है जो किसी भी कंपनी को अंतरिक्ष लॉन्च सेवा बाजार में प्रवेश दिलाती है।
क्या होगा अगर रॉकेट रास्ता भटक जाए?
दरअसल, विक्रम-1 रॉकेट का पूरा स्ट्रक्चर कार्बन कंपोजिट से बना है। इसमें सॉलिड फ्यूल बूस्टर और 3D प्रिंटेड लिक्विड इंजन का इस्तेमाल हुआ है। खास बात यह है कि इस रॉकेट में कोई पायलट नहीं होगा। इसे हैंडलिंग और मॉनीटरिंग एक बहुत ही एडवांस ऑनबोर्ड इंटेलिजेंस सिस्टम के जरिए होगी, जो रॉकेट को खुद फैसले लेने की ताकत देता है।
कैसे काम करेगा विक्रम 1
विक्रम-1 को हाईटेक गाइडेंस, नेविगेशन और कंट्रोल सिस्टम से लैस किया गया है। अगर उड़ान के दौरान तेज हवाओं या किसी अन्य कारण से रॉकेट अपने रूट से थोड़ा भी भटकता है, तो उसका सॉफ्टवेयर तुरंत एनालिसिस करेगा और बिना किसी बाहरी निर्देश के खुद रास्ता सुधार लेगा। यानी यह रॉकेट सिर्फ शक्तिशाली नहीं, बल्कि स्मार्ट भी है।
विक्रम 1 का मिशन कंप्यूटर
इस पूरे सिस्टम का सबसे दिलचस्प हिस्सा है इसका मिशन कंप्यूटर। स्काईरूट ने इसे नाम दिया है "रामानुजन"। महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के नाम वाला यह कंप्यूटर पूरे मिशन का ब्रेन है। रॉकेट के भीतर मौजूद सैकड़ों सेंसर लगातार डेटा भेजेंगे और रामानुजन डेटा का विश्लेषण करेगा, इंजन की स्थिति पर नजर रखेगा, स्टेज सेपरेशन को नियंत्रित करेगा और जरूरत पड़ने पर तुरंत निर्णय भी लेगा। एक तरह से कहा जाए तो लॉन्च के बाद इस रॉकेट की जिम्मेदारी इंजीनियर्स से ज्यादा रामानुजन कंप्यूटर की होगी।
