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EXPLAINED: सूखे पत्तों से बनेगी रसोई गैस, LPG संकट के बीच जानें क्या है IIT बॉम्बे की 'लीफ-टू-गैस' तकनीक

Explained IIT Bombay’s Leaf-to-gas technology in Hindi: पश्चिमी एशिया में भू-राजनीतिक तनाव (ईरान-इजरायल) के कारण भारत में एलपीजी (LPG) का गहरा संकट पैदा हो गया है, जिससे आयात प्रभावित हुआ है। इसी बीच देश में बढ़ते एलपीजी (LPG) संकट की चिंता के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बॉम्बे (IIT, Bombay) की एक अनोखी तकनीक चर्चा में है। यह तकनीक सूखे पत्तों को कुकिंग गैस में बदल देती है, जिससे पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने की उम्मीद जगी है। आइये समझते हैं कि आईआईटी बॉम्बे की लीफ टू गैस तकनीक क्या है और यह कितनी कारगर साबित हो सकती है।

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सूखे पत्तों से कैसे बनेगी रसोई गैस?
Authored by: Kuldeep Raghav
Updated Apr 2, 2026, 09:18 IST

Explained IIT Bombay’s Leaf-to-gas technology in Hindi: पश्चिमी एशिया में भू-राजनीतिक तनाव (ईरान-इजरायल) के कारण भारत में एलपीजी (LPG) का गहरा संकट पैदा हो गया है, जिससे आयात प्रभावित हुआ है। कमर्शियल गैस की किल्लत से हजारों फैक्ट्रियां (टेक्सटाइल, मार्बल) बंद हो गई हैं, जिससे बड़े पैमाने पर श्रमिकों का पलायन हो रहा है। सरकार ने अब पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) को बढ़ावा देने और 5 किलो के 'छोटू' सिलेंडर की आपूर्ति बढ़ाने का निर्णय लिया है। इसी बीच देश में बढ़ते एलपीजी (LPG) संकट की चिंता के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बॉम्बे (IIT, Bombay) की एक अनोखी तकनीक चर्चा में है। यह तकनीक सूखे पत्तों को कुकिंग गैस में बदल देती है, जिससे पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने की उम्मीद जगी है। IIT बॉम्बे की ‘लीफ-टू-गैस’ तकनीक एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे साधारण कचरे को ऊर्जा में बदला जा सकता है। यह न सिर्फ पर्यावरण के लिए फायदेमंद है, बल्कि भारत जैसे देश के लिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम भी साबित हो सकती है।

आईआईटी बॉम्बे पिछले 10 वर्ष से इस खास तकनीक पर काम कर रहा है, जिसमें कैंपस में गिरे हुए सूखे पत्तों को इकट्ठा करके कुकिंग फ्यूल बनाया जाता है। यह सिस्टम करीब 60 प्रतिशत थर्मल एफिशिएंसी देता है, जो इसे और भी उपयोगी बनाता है। इस तकनीक की मदद से संस्थान ने अपने LPG इस्तेमाल को 30 से 40 प्रतिशत तक कम कर दिया है। साल 2017 में प्रोफेसर संदीप कुमार इस प्रोजेक्ट से जुड़े और उन्होंने एक खास तरह का बर्नर डिजाइन किया। इस तकनीक को पेटेंट भी मिल चुका है। खास बर्नर से इस गैस का उपयोग और बेहतर तरीके से हो सकता है।

कैसे काम करती है ‘लीफ-टू-गैस’ तकनीक?

इस तकनीक के तहत सबसे पहले सूखे पत्तों को एकत्र किया जाता है। इसके बाद उन्हें काटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदलकर पेलेट के रूप में तैयार किया जाता है। फिर इन पेलेट्स को कम ऑक्सीजन वाले चैम्बर में गर्म किया जाता है। इस प्रक्रिया को गैसीफिकेशन कहा जाता है, जिसके दौरान पत्तों से ज्वलनशील फ्यूल गैस निकलती है। यह गैस स्वच्छ तरीके से जलती है और खाना पकाने के लिए स्थिर व भरोसेमंद लौ प्रदान करती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बड़े स्तर पर लागू करने पर यह तकनीक सालाना लाखों रुपये की बचत और सैकड़ों टन CO₂ उत्सर्जन में कमी ला सकती है।

क्या है IIT Bombay की यह तकनीक?

IIT बॉम्बे के वैज्ञानिकों ने एक पेटेंटेड बायोमास गैसीफिकेशन तकनीक विकसित की है। इसमें सूखे पत्तों और बगीचे के कचरे को इकट्ठा कर प्रोसेस किया जाता है और फिर उसे गैस में बदला जाता है, जिसे खाना पकाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह तकनीक कई सालों के शोध का परिणाम है, जिसकी शुरुआत 2014 में प्रोफेसर संजय महाजनी के नेतृत्व में हुई थी। यह तकनीक न सिर्फ ईंधन बचाती है, बल्कि पत्तों के कचरे को भी उपयोगी बना देती है।

कैसे काम करती है आईआईटी की तकनीक

कैसे काम करती है आईआईटी की तकनीक

कितना असरदार है यह मॉडल?

IIT बॉम्बे के कैंपस में इस तकनीक का इस्तेमाल पहले से किया जा रहा है और इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं:

  • कैंटीन में LPG की खपत में 30–40% तक कमी
  • कुछ जगहों पर एक सिलेंडर प्रतिदिन की बचत
  • करीब 60% थर्मल एफिशिएंसी

भारत के लिए क्यों अहम है यह खोज?

भारत में बड़ी मात्रा में LPG आयात किया जाता है, जिससे देश वैश्विक कीमतों और सप्लाई पर निर्भर रहता है। ऐसे में यह तकनीक:

  • LPG पर निर्भरता कम कर सकती है
  • ईंधन की लागत घटा सकती है
  • कचरा प्रबंधन की समस्या सुलझा सकती है
  • कार्बन उत्सर्जन कम कर सकती है

क्या यह LPG का पूरी तरह विकल्प है?

फिलहाल यह तकनीक LPG का पूर्ण विकल्प नहीं है, लेकिन आंशिक विकल्प के रूप में इन जगहों पर बेहद उपयोगी साबित हो रही है।

  • हॉस्टल
  • कैंटीन
  • कम्युनिटी किचन
  • ग्रामीण क्षेत्र

IIT बॉम्बे की आगे की योजना क्या है?

IIT बॉम्बे इस तकनीक को अन्य संस्थानों और शहरों में लागू करने की योजना बना रहा है। इसे लाइसेंस भी किया जा चुका है, जिससे आने वाले समय में इसका विस्तार संभव है। इस तकनीक को अब Infixen Energy को लाइसेंस दिया गया है। इस तकनीक के इस्तेमाल से करीब 90 टन LPG की खपत को कम किया जा सकता है और लगभग 300 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। अनुमान है कि इस तकनीक के इस्तेमाल से हर साल करीब 50 लाख रुपये की बचत हो सकती है।

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