Assam की सभी 126 सीटों के लिए आज यानी गुरुवार 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान हो रहा है। यहां मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच है। पिछले चुनाव में भाजपा को 64 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस की छोली में 22 सीटें आई थीं। चुनाव के नतीजे 4 मई को घोषित होंगे। आज मतदान के बीच बात असम के एक ऐसे मंदिर की, जो दुनिया के सबसे छोटे नदी द्वीप पर बना है। इस मंदिर को असम में 6 सदियों तक राज करने वाले राजवंश ने आज से लगभग 332 वर्ष पहले बनवाया था। चलिए जानते हैं।
332 साल पहले Assam में अहोम वंश के राजा ने बनवाया था ये मंदिर
असम में कहां है ये मंदिर
जिस मंदिर की हम बात कर रहे हैं, वह असम की राजधानी गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में मौजूद है। ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में यहां एक छोटा सा द्वीप (Island) है। इस द्वीप का नाम पीकॉक आइलैंड है और इसी द्वीप पर यह मंदिर मौजूद है।
ब्रह्मपुत्र नदी के इसी द्वीप पर है उमानंदा मंदिर
मंदिर का नाम क्या है?
पीकॉक पर मौजूद इस मंदिर को उमानंदा मंदिर (উমানন্দ মন্দিৰ - Umananda Temple) के नाम से जानते हैं। इस मंदिर की स्थिति तो अद्वितीय है ही साथ ही यहां का धार्मिक महत्व भी काफी ज्यादा है। हर साल यहां पर महाशिवरात्रि के अवसर पर हजारों श्रद्धालु दर्शनों के लिए पहुंचते हैं।
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कब और किसने बनवाया उमानंदा मंदिर?
उमानंदा मंदिर का निर्माण साल 1694 में संपन्न हुआ था। इस मंदिर का निर्माण उस समय असम पर राज करने वाले अहोम वंश (আহোম বংশ -Tai-Ahom dynasty) के राजा गदाधर सिंह के निर्देश पर किया गया था। उमानंदा मंदिर की दीवारों पर बनी नक्काशी और मूर्तियां यहां के स्थानीय कारीगरों की उत्कृष्ट कला का प्रमाण हैं। यहां सूर्य, शिव, गणेश और देवी के साथ भगवान विष्णु के दशावतार की झलक भी देखने को मिलती है।
ताइ-अहोम राजवंश ने असम में कब तक राज किया?
ताइ-अहोम राजवंश को अहोम राजवंश के नाम से भी जाना जाता है। इस राजवंश ने 1228 से 1826 तक लगभग 600 वर्षों तक असम में राज किया था। इस वंश की शुरुआत मोंग माओ के ताई प्रिंस सुकफा ने की थी। इस राजवंश को अपनी मजबूत मिलिट्री, अच्छे प्रशासन और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। अहम राजाओं ने यहां के कई जनजातीय समूहों को इकट्ठा करके एकीकृत असम की नींव रखी। इनमें चुतिया (Chutias), मोरन (Morans) और कचारी (Kacharis) जनजातियां प्रमुख थीं। बर्मा के आक्रमण और 1826 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के यांदबो संधि के बाद इस राजवंश का शासन खत्म हो गया। आज भी ताइ-अहोम वंश की विरासत असम के इतिहास, संस्कृति और पहचान से जुड़ी है।
यहीं पर भोले बाबा ने कामदेव को भस्म किया था
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिस स्थान पर आज यह मंदिर है, उसे भस्माचल कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव यहां ध्यान में लीन थे, तभी कामदेव ने उन्हें विचलित कर दिया, जिससे क्रोधित होकर शिव ने कामदेव को यहीं पर भस्म कर दिया। इस वजह से इस स्थान का विशेष धार्मिक महत्व है।
भगवान शिव को समर्पित है ये मंदिर
जब भूकंप में मंदिर को हुआ बड़ा नुकसान
साल 1897 में क्षेत्र में एक बड़ा भूकंप आया। इस भूकंप में मंदिर का एक बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसे बाद में एक स्थानीय व्यापारी ने फिर से बनवाया। इसी पुनर्निर्माण के दौरान मंदिर में वैष्णव परंपरा से जुड़ी शिलालेख भी जोड़े गए। उमानंदा मंदिर में अमावस्या और शिव चतुर्दशी के दिन पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
उमानंदा मंदिर तक कैसे पहुंचें?
जैसा कि हमने ऊपर बताया था कि यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीच एक छोटे से द्वीप पर मौजूद है। ऐसे में यहां तक पहुंचना भी एक बड़ा कार्य है। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को उमानंदा घाट से फेरी या नाव में सवार होकर यहां तक जाना पड़ता है। यह घाट गुवाहाटी शहर के प्रमुख स्थानों के बीच स्थित है, जिससे यहां पहुंचना आसान है।
