Voter Adhikar Yatra: बिहार की राजनीति में कांग्रेस पार्टी चर्चा में है, और इसकी सबसे बड़ी वजह बनी है वोटर अधिकार यात्रा। राहुल गांधी के नेतृत्व में निकली इस यात्रा ने कांग्रेस को न सिर्फ राजनीतिक जीवंतता दी है, बल्कि संगठनात्मक मजबूती और जनसमर्थन के नए रास्ते भी खोले हैं। यह यात्रा पार्टी के लिए एक राजनीतिक संजीवनी की तरह साबित हो रही है।
वोटर अधिकार यात्रा में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, राजद नेता तेजस्वी यादव और CPI (ML) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य (चित्र साभार: PTI)
तीन दशक बाद कांग्रेस का चल रहा नाम
1990 के बाद सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस धीरे-धीरे बिहार की मुख्यधारा की राजनीति से गायब होती चली गई थी लेकिन इस बार जब राहुल गांधी सड़कों पर उतरे, तो उनके साथ युवाओं का जोश, महिलाओं की भागीदारी और पार्टी कार्यकर्ताओं की सक्रियता साफ तौर पर देखने को मिली। यात्रा ने न केवल पार्टी को वोट चोरी, बेरोजगारी, पलायन और अपराध जैसे मुद्दों पर मुखर किया, बल्कि कांग्रेस को राजद की छाया से निकालकर एक स्वतंत्र और ताकतवर भागीदार के रूप में स्थापित कर दिया।
25 जिलों में 1300 किलोमीटर की यात्रा
चौदह दिनों में पूरी हुई 1300 किलोमीटर लंबी यात्रा मगध, अंग, सीमांचल, कोसी, मिथिला, तिरहुत, चंपारण, सारण और शाहाबाद जैसे क्षेत्रों से होकर गुजरी। 25 जिलों और 110 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी को मिले जनसमर्थन ने यह संकेत दिया कि कांग्रेस अब फिर से जमीन पर उतर आई है। यात्रा के अंतिम दिन, 1 सितंबर को पटना के गांधी मैदान से अंबेडकर पार्क तक समापन मार्च होगा, जो इस अभियान का प्रतीकात्मक और निर्णायक पड़ाव होगा।
राहुल-तेजस्वी की जोड़ी बनी जनता की पसंद
यात्रा के दौरान राहुल गांधी के साथ राजद नेता तेजस्वी यादव लगातार साए की तरह मौजूद रहे। दोनों नेताओं की साझा रैलियों में जिस प्रकार कांग्रेस के झंडों की संख्या राजद से अधिक दिखाई दी, उसने कांग्रेस के पुनरुत्थान की ओर इशारा किया। युवाओं को जहां बेरोजगारी और शिक्षा जैसे मुद्दों पर पार्टी ने जोड़ा, वहीं ‘माई बहिन मान योजना’ के ज़रिए महिलाओं में भी समर्थन हासिल करने की कोशिश की गई।
INDIA गठबंधन की एकजुटता आई नजर
इस पूरी यात्रा के दौरान INDIA गठबंधन की एकजुटता भी नजर आई। राहुल गांधी के साथ भाकपा-माले के दीपंकर भट्टाचार्य, वीआईपी पार्टी के मुकेश सहनी और वाम दलों के नेता भी मंच साझा करते रहे। मंचों से नेताओं की आपसी तारीफ और सामूहिक नारेबाजी ने साफ कर दिया कि यह गठबंधन सिर्फ चुनावी गणित नहीं, बल्कि एक मजबूत राजनीतिक मोर्चा बनने की ओर बढ़ रहा है।
भविष्य की रणनीति
यात्रा ने कांग्रेस के लिए सिर्फ सियासी माहौल नहीं बदला, बल्कि पार्टी के भीतर नई पीढ़ी के नेताओं को उभारने और कार्यकर्ताओं से जमीनी फीडबैक लेने का अवसर भी दिया। इस अभियान को पार्टी भविष्य के नेतृत्व निर्माण की प्रक्रिया के रूप में भी देख रही है। अब सवाल यह है कि क्या 'वोटर अधिकार यात्रा' से मिले उत्साह और जनसमर्थन को कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनावों में वोटों में बदल पाएगी? इसका जवाब नवंबर में मिलेगा।
