नीतीश कुमार ने आज 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जिस तरह से उनके नेतृत्व में NDA को 202 सीटों पर जीत के साथ प्रचंड बहुमत मिला है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि आज वह बिहार के सबसे भरोसेमंद नेता हैं। यह भरोसा ठीक वैसा ही है, जैसा कभी बचपन में उनके पिता को अपने 'मुन्ना' पर होता था, जब 'मुन्ना' उनकी बतायी गई आयुर्वेदिक दवाओं की पुड़िया बनाता था।
आज 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे नीतीश कुमार
1 मार्च 1951 को पटना के बख्तियारपुर में जन्मे नीतीश कुमार के पिता कविराज राम लखन सिंह आयुर्वेदिक वैद्य थे। बचपन में नीतीश कुमार का नाम मुन्ना था और माता-पिता, आस-पड़ोस के लोग और रिश्तेदार उन्हें इसी नाम से पुकारते थे। बचपन में जब उनके पिता के पास ज्यादा मरीज आ जाते थे तो वह आयुर्वेदिक दवाओं की पुड़िया बनाकर पिता की मदद करते थे।
जब नीतीश ने मुख्यमंत्री से मनवा ली अपनी बात
नीतीश कुमार कुमार के पिता आयुर्वेदिक डॉक्टर होने के साथ ही कांग्रेस के एक्टिव मेम्बर भी थे। नीतीश कुमार ने बचपन से ही अपने घर में राजनीति का माहौल देखा और जब वह कॉलेज गए तो वहां वह जल्द ही छात्रों के बीच फेमस हो गए और उनके नेता बन गए। यहां तक कि उनकी मांगों के आगे उस समय के मुख्यमंत्री केदार पांडेय को भी झुकना पड़ा और उनकी बात माननी पड़ी।
पटना के बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग अब NIT से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद नीतीश कुमार ने रांची के बिजली विभाग में ट्रेनी इंजीनियर के तौर पर नौकरी भी की। लेकिन उनका मन नौकरी से ज्यादा राजनीति में लगता था और वह नौकरी छोड़कर पटना लौट आए। जेपी आंदोलन में जेपी ने नीतीश कुमार को संचालन समिति में जगह दे दी। 1975 में जब देश में इमरजेंसी लगाई गई तो नीतीश कुमार गांव-गांव छिपकर काम करते रहे। लगभग एक साल बाद 10 जून 1976 को आखिरकार उन्हें भोजपुर जिले के दुबौली गांव से गिरफ्तार कर लिया गया। नीतीश ने तब आरा, बक्सर और भागलपुर की जेलों में 9 महीने बिताए।
राजनीति छोड़ने वाले थे नीतीश कुमार
नीतीश कुमार ने राजनीति को ही अपना सब कुछ देने का मन बना लिया था। साल 1977 के विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार ने पहली बार चुनाव लड़ा। उन्हें जनता पार्टी ने नालंदा की हरनौत सीट से अपना उम्मीदवार बनाया। लेकिन इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 1980 में बिहार में फिर से विधानसभा चुनाव हुए और इस बार भी उन्हें हार ही नसीब हुई। लगातार दो हार से नीतीश का दिल टूट गया और उनका स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो गया। तब उनकी पत्नी मंजू गर्भवती थीं और वह मायके चली गईं। हार के बाद नीतीश कुमार ने राजनीति छोड़कर सिविल कॉन्ट्रैक्टर बनने का फैसला कर लिया था।
समाजवादी नेता चंद्रशेखर ने उन्हें नहीं मनाया होता तो आज नीतीश कुमार सिविल कॉन्ट्रैक्टर से रिटायर होने के बाद गुमनामी की जिंदगी जी रहे होते। लेकिन वही मुन्ना जो कभी अपने पिता के साथ आयुर्वेदिक दवाओं की पुड़िया बनाता था, आज बिहार का सबसे बड़ा नेता है और बिहार को गरीबी व पिछड़ेपन की बीमारी से बाहर निकालने की दवा बन गया है।
