Monsoon 2026: भारत में जुलाई 2026 का मानसून मौसम विज्ञानियों और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के सभी पूर्वानुमानों को गलत साबित करते हुए लगभग सामान्य बारिश लेकर आया है। IMD ने शुरुआत में अनुमान जताया था कि प्रशांत महासागर में मजबूत हो रहा 'अल नीनो' (El Nino) मानसूनी बारिश को बुरी तरह प्रभावित करेगा, जिसके कारण जुलाई की बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) के 94% से भी कम रह सकती है।
270 मिमी बारिश से सामान्य के करीब पहुंचा मानसून,
हालांकि, 30 जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में 270.1 मिलीमीटर बारिश दर्ज की जा चुकी है, जो इस अवधि के सामान्य औसत (271.9 मिमी) के बेहद करीब है। 1 से 26 जुलाई के बीच ही 233.9 मिमी के सामान्य आंकड़े के मुकाबले 238.2 मिमी बारिश हो चुकी थी।
जुलाई में हुई इस तेज बारिश ने देश के मानसून के हिसाब किताब को पूरी तरह बदल दिया। जून के अंत तक जहां पूरे देश में मानसूनी बारिश का घाटा लगभग 40% तक पहुंच गया था, वहीं जुलाई के अंत तक यह घटकर मात्र 14 से 16 प्रतिशत के बीच रह गया।
आखिर क्यों गलत साबित हुए मौसम विभाग के पूर्वानुमान?
दिल्ली स्थित प्रसिद्ध जलवायु अनुसंधान संस्था ‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ द्वारा जारी एक नए विश्लेषण के अनुसार, ग्लोबल वॉर्मिंग और महासागर-वायुमंडल के बदलते संबंधों (Ocean-Atmosphere Interactions) के कारण भारत में पारंपरिक मॉडल के जरिए मानसून का सटीक अनुमान लगाना दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है। जलवायु विशेषज्ञों और IMD के पूर्व महानिदेशक डॉ. के. जे. रमेश के अनुसार, दो प्रमुख मौसमी कारकों ने एल नीनो के सूखे वाले प्रभाव को पूरी तरह निष्प्रभावी कर दिया।
पहला है पश्चिमी प्रशांत महासागर का असामान्य रूप से गर्म होना, फिलीपींस के पश्चिम में स्थित पश्चिमी प्रशांत महासागर की सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी देखी गई। यहां से उठे कम से कम तीन चक्रवाती परिसंचरण म्यांमार के रास्ते उत्तर बंगाल की खाड़ी में प्रवेश कर फिर से मजबूत हुए। इससे बने लगातार निम्न दबाव (Low Pressure) के सिस्टमों ने पूरे भारतीय प्रायद्वीप में मानसून को मजबूत बनाए रखा।
दूसरा है तीव्र पश्चिमी विक्षोभ (Intense Western Disturbances), मानसून के दौरान सामान्य से अधिक मजबूत पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय रहे। इन्होंने अरब सागर से भारी मात्रा में नमी खींचकर महाराष्ट्र, गुजरात, और पश्चिमी-मध्य भारत तक पहुंचाई। ये विक्षोभ तिब्बत और पूर्वी हिमालय तक पहुंचे, जिससे असम जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में भारी बारिश और बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हुई।
जलवायु परिवर्तन से बदल रहा मानसून
आईएमडी के राष्ट्रीय मौसम पूर्वानुमान केंद्र (NWFC) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अखिल श्रीवास्तव ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र और जमीन की सतह का औसत तापमान बढ़ा है। जब कई मानसूनी तंत्र एक साथ सक्रिय होते हैं, तो वे वायुमंडल से अत्यधिक नमी सोखते हैं। इसके परिणामस्वरूप कम समय में बहुत भारी बारिश की घटनाएं बढ़ जाती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि आगामी महीनों में अल नीनो की स्थितियां और मजबूत होने का अनुमान है, लेकिन जुलाई 2026 के आंकड़ों ने यह साबित कर दिया है कि क्षेत्रीय महासागरीय बदलाव अब वैश्विक मौसमी पैटर्न पर भारी पड़ रहे हैं।
