संपत्ति में हक तो फिर अनुकंपा नियुक्ति पर क्यों नहीं विवाहित बेटी का अधिकार, Supreme Court ने किया भ्रम दूर

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि शादीशुदा बेटी को सिर्फ वैवाहिक स्थिति के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। उच्चतम न्यायालय का यह फैसला बेटियों के समान अधिकार और पारिवारिक पहचान को मजबूती देता है।

जब आपके घर में बेटी हुई थी तो आप कितना खुश हुए थे। खुशी के मारे आपकी आंखों में आंसू आ गए थे। मुंह से दो शब्द भी नहीं निकल पा रहे थे। नि:शब्द होकर आप कभी उसकी फोटो खींचते थे तो कभी उसके पैरों के निशान फ्रेम करवाकर रखते थे। बेटी के साथ तुतली जुबान में बोलना, उसके एक-एक पग और पल का ध्यान रखना। उसके खान-पान, उसके कपड़ों का ध्यान रखना, यह सब आपकी दिनचर्या का हिस्सा था। उसे देखे बिना न तो दिन होता था न रात ढलती थी। बेटी घर में न हो तो घर किसी भूतिया हवेली सा लगता था। बेटी को बड़े ही नाजुक अंदाज से पाला। फिर बड़ी धूम-धाम से बिटिया की शादी की तैयारी की और नम आंखों से विदा भी कर दिया। बेटी को हर वो चीज दी, जिसकी उसे जरूरत थी या जरूरत हो सकती थी। फिर शादी के बाद बेटी पराया धन कैसे हो गई?

Supreme Court Married woman.

सुप्रीम कोर्ट ने विवाहित महिला की अनुकंपा नियुक्ति पर सुनाया फैसला

उसकी शादी के बाद आप कैसे भूल गए कि आपने पैदा होने से लेकर शादी करने तक उसके लिए क्या-कुछ किया है? कैसे भूल गए कि बेटी की मुस्कान आपकी हर थकान हर लेती थी? कैसे भूल गए कि उसी बेटी का चेहरा देखकर आप हर दर्द भूल जाते थे। पिता के घर पर हक के लिए बेटी को कोर्ट जाना पड़ा, आखिर क्यों? अब बेटी को अनुकंपा नियुक्ति पर हक के लिए भी सुप्रीम कोर्ट को ही भ्रम दूर करना पड़ा। काश ऐसे होता कि बेटी को पिता के घर पर अपने आप हर अधिकार मिलता, अगर वह चाहती तो अपना अधिकार छोड़ सकती थी।

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