UP Assembly Election 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की भले ही अभी घोषणा नहीं हुई है, लेकिन तमाम पार्टियों ने इसके लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं। समीकरण बिठाने शुरू कर दिए हैं। रूठों को मनाने और पुराने रिश्तों पर पड़ी धूल को हटाना भी शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव गुरुवार 22 अक्टूबर को आजम खान से मिलने रामपुर गए। उन्होंने जेल में जाकर वरिष्ठ सपा नेता और पूर्व मंत्री आजम खान से मुलाकात की। कभी MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण बनाकर सत्ता के शिखर तक पहुंची समाजवादी पार्टी का नया चुनावी फॉर्मूला PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) है। इस PDA के लिए A फॉर आजम खान कितना जरूरी है, यह तो अखिलेश यादव ने जेल में उनसे मुलाकात करके बता ही दिया है।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए इस बार मुकाबला सिर्फ भाजपा को चुनौती देने का नहीं, बल्कि अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत बनाए रखने का भी है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में PDA की रणनीति से मिली सफलता के बाद अखिलेश इसे विधानसभा चुनाव 2027 में भी आजमाना चाहते हैं। लेकिन अखिलेश जानते हैं कि MY समीकरण में अहम रहे मुस्लिम मतदाताओं को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस नए PDA फॉर्मूले की कामयाबी के लिए अपने साथ रखना अहम होगा। यही वजह है कि सपा के वरिष्ठ नेता मोहम्मद आजम खान से अखिलेश की मुलाकात को महज औपचारिक मुलाकात के बजाय बड़े राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
सपा का पारंपरिक MY समीकरण मुस्लिम-यादव वोटों पर आधारित रहा है। PDA के जरिए अखिलेश यादव ने इसमें गैर-यादव पिछड़ी जातियों और दलितों को भी जोड़ने का फॉर्मूला तैयार किया है। सवाल है कि क्या यह व्यापक सामाजिक गठजोड़ 2027 में सपा को सत्ता तक पहुंचाने का रास्ता बना सकता है? क्या पश्चिमी यूपी में आजम खान की नाराजगी तथा असदुद्दीन ओवैसी की सक्रियता सपा के लिए चुनौती बन सकती है?
2024 में PDA ने कैसे बदला सियासी गणित?
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा ने 80 में से 37 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को छह सीटों पर जीत मिली। सत्तारूढ़ भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई। इस नतीजे ने दिखाया कि विपक्षी गठबंधन और जातीय-सामाजिक समीकरणों का मेल भाजपा के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों में भी असर डाल सकता है। सपा की इस सफलता का श्रेय PDA को मिला, लेकिन उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय मुद्दे, संविधान और आरक्षण को लेकर बहस तथा विपक्षी वोटों के एकजुट होने से सपा के लिए रहा कुछ आसान हुई।
अखिलेश यादव अब 2024 के इसी फॉर्मूले को विधानसभा स्तर पर दोहराना चाहते हैं। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे, उम्मीदवार और मतदाताओं की प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं। इसलिए 2024 की सफलता 2027 में विधानसभा चुनाव में जीत की फूलप्रुफ गारंटी नहीं हो सकती। यही कारण है कि अखिलेश यादव लगातार सरकार की नाकामियों पर आवाज बुलंद कर रहे हैं और सरकार की खामियों पर उसे घेर भी रहे हैं।
पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोट कितने अहम?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रुहेलखंड की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका हमेशा अहम रही है। विशेषतौर पर रामपुर, मुरादाबाद, संभल, सहारनपुर और बिजनौर जैसे जिलों में कई सीटों पर मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को सीधे प्रभावित करने की स्थिति में हैं। मुस्लिम मतदाताओं के साथ जाट, गुर्जर, सैनी, कश्यप और अन्य पिछड़ी जातियों तथा दलित समुदायों का समर्थन भी सपा के लिए अहम होगा। PDA की असली परीक्षा भी यही है कि क्या पार्टी इन अलग-अलग सामाजिक समूहों को एक साथ साध पाती है या नहीं।
पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर आजम खान का प्रभाव माना जाता है
ओवैसी की सक्रियता और सपा की चिंता
वरिष्ठ सपा नेता आजम खान लंबे समय से पार्टी के प्रमुख मुस्लिम चेहरों में रहे हैं। उनके और पार्टी नेतृत्व के रिश्तों में तनाव की खबरें हाल के समय में सामने आती रही हैं। ऐसे में अखिलेश यादव की रामपुर में उनसे मुलाकात को मुस्लिम मतदाताओं तक भरोसे का संदेश पहुंचाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि, मुलाकात का राजनीतिक असर कितना होगा, यह आने वाले समय में ही साफ हो पाएगा। दूसरी तरफ, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी मुस्लिम बहुल इलाकों में लगातार अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर विपक्षी दलों के बीच मुस्लिम मतों का बंटवारा होता है, तो कुछ सीटों पर सपा को नुकसान हो सकता है।
जाट वोट और ‘चवन्नी’ विवाद की चुनौती
पश्चिमी यूपी में जाट मतदाता भी चुनावी गणित का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। किसान आंदोलन के बाद इस क्षेत्र में जाट राजनीति और भाजपा विरोधी वोटों की भूमिका अहम हो जाती है। हालांकि, जाट मतदाता एकसमान तरीके से वोट नहीं करते और उनकी पसंद क्षेत्र, उम्मीदवार तथा स्थानीय मुद्दों के अनुसार बदलती है।
राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के NDA में शामिल होने के बाद सपा के सामने जाट वोटों को लेकर नई चुनौती है। अखिलेश यादव की जयंत चौधरी के लिए ‘चवन्नी’ वाली टिप्पणी को RLD पर तंज के रूप में देखा गया। ऐसी राजनीतिक बयानबाजी का असर दोनों दलों के समर्थकों पर पड़ सकता है।
क्या PDA अखिलेश को सत्ता तक पहुंचा पाएगा?
2027 में अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ी चुनौती MY समीकरण को बनाए रखते हुए PDA का विस्तार करना है। आजम खान जैसे नेताओं के साथ रिश्ते, मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा, गैर-यादव पिछड़ों और दलितों को अपने साथ जोड़ने तथा जाट वोटों का समीकरण, ये सभी कारक काफी अहम होंगे। अगर अखिलेश यादव UP विधानसभा चुनाव 2027 में PDA को सिर्फ राजनीतिक नारे से आगे एक टिकाऊ सामाजिक गठबंधन में बदल पाने में सफल रहते हैं तो यह उनके लिए चुनावी सफलता की कुंजी साबित हो सकता है।
