मीडिया खबरों के मुताबिक, परिचालन लेनदारों द्वारा दिवालियापन और दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत दायर याचिका में कंपनी के खिलाफ कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रिया शुरू करने की मांग की गई है। अब इस मामले की सुनवाई 26 मार्च 2026 को होगी।
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एनबीटी और दैनिक जागरण के हवाले से क्रेडिटर्स का दावा है कि कंपनी ने एडवाइजरी सेवाओं की फीस तथा इक्विटी कमिटमेंट्स के भुगतान में डिफॉल्ट किया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार कंपनी ने कई बार भुगतान का आश्वासन तो दिया और कुछ आंशिक भुगतान भी किया, लेकिन शेष बकाया राशि का निपटारा नहीं किया गया। इसी के आधार पर कोर्ट में अपील की गई है।
ऑपरेशनल क्रेडिटर्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी.वी. बालासुब्रमण्यम के साथ अधिवक्ता आदित्य भारत मनुबरवाला और अमोघ सिम्हा ने ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की। उन्होंने नोट किया कि जनवरी 2025 में भेजे गए डिमांड नोटिस का कंपनी की ओर से औपचारिक जवाब नहीं मिला। हालांकि कंपनी ने बकाया राशि का एक हिस्सा भुगतान कर अपनी देनदारी स्वीकार की है।
ट्रिब्यूनल ने इस मामले में कंपनी को नोटिस जारी किया है, जिसे कंपनी की ओर से अधिवक्ता रोशन ने स्वीकार कर लिया है। अगली सुनवाई 26 मार्च 2026 को नियत की गई है, जब मामले पर आगे का निर्णय लिया जाएगा।
यदि ट्रिब्यूनल इस याचिका को स्वीकार कर लेता है, तो कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) शुरू हो सकता है। इस प्रक्रिया के तहत एक इंटरिम रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल नियुक्त किया जाएगा, जो कंपनी के प्रबंधन तथा संचालन की निगरानी करेगा और कंपनी को संबल देने के उपाय तलाशेगा। यह मामला न केवल कंपनी के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और तकनीकी उत्पादन क्षेत्र में निवेशकों तथा बाजार सहभागियों के लिए भी चिंता का विषय बन गया है। बिगड़ते आर्थिक संकेत और अनुशासनहीनता के आरोप कंपनी की प्रतिष्ठा तथा भविष्य पर प्रभाव डाल सकते हैं।
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