Great Britain, यूनाइटेड किंगडम (UK), इंग्लैंड और ब्रिटिश आयल्स यह सभी नाम एक-दूसरे के प्रयायवाची लगते हैं। बहुत से लोग आज भी इन सभी को एक ही मानते हैं। अंग्रेजों ने भारत पर 200 साल तक राज किया और आज भी हमारे देश के ज्यादातर लोगों के लिए यह सभी एक ही हैं। बता दें कि ये सब एक होकर भी अलग-अलग हैं। चलिए समझते हैं कि यह सब अलग-अलग होकर भी एक और एक होकर भी अलग-अलग कैसे हैं।
दुनिया के देशों को तोड़ने वाला ग्रेट ब्रिटेन क्या खुद टूट जाएगा!
इंग्लैंड - यूरोपीय महाद्वीप की मुख्य भूमि से बिल्कुल अलग यह एक द्वीप पर बसा देश है, जिसकी भौगोलिक सीमाएं दो देशों से मिलती हैं। इंग्लैंड के पूर्वी और दक्षिणी सीमा पर समुद्र तट है, जबकि पश्चिमी और उत्तरी सीमा दो देशों से मिलती है
ग्रेट ब्रिटेन - ग्रेट ब्रिटेन को सिर्फ ब्रिटेन नाम से भी जाना जाता है। ग्रेट ब्रिटेन में तीन देश शामिल हैं। इसका प्रमुख देश इंग्लैंड है, जबकि पश्चिम में वेल्स और उत्तर में स्कॉटलैंड भी इसका हिसा हैं और यह तीनों मिलकर ही ग्रेट ब्रिटेन बनाते हैं।
यूनाइटेड किंडगम - UK की परिभाषा ग्रेट ब्रिटेन से भी थोड़ा और बड़ी हो जाती है। इसमें ग्रेट ब्रिटेन के अलावा पास के ही आयलैंड पर बसे नॉर्थ आयरलैंड को भी जोड़ लिया जाता है।
ब्रिटिश आयल्स - यह यूरोपीय महाद्वीप का हिस्सा है। लेकिन आयलैंड पर बसे देशों के इस समूह को ब्रिटिश आयल्स कहा जाता है। इसमें ग्रेट ब्रिटेन के तीनों देशों के साथ ही नॉर्थ और साउथ आयरलैंड भी आते हैं। इस तरह यह इंग्लैंड, वेल्स, स्कॉटलैंड, उत्तरी आयरलैंड और दक्षिणी आयरलैंड कुल मिलाकर पांच देशों का समूह है।
मामला क्या है?
कभी दुनिया के बड़े हिस्से पर शासन करने वाला ब्रिटिश साम्राज्य आज खुद अपनी संवैधानिक एकता को लेकर चर्चा में है। स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेताओं ने 14 सितंबर 2026 को कार्डिफ में एक समझौते पर हस्ताक्षर कर संवैधानिक बदलाव और अपना भविष्य तय करने के अधिकार पर साथ आने के संकेत दिए हैं। तीनों देशों में स्वतंत्रता या संवैधानिक बदलाव की मांग अलग-अलग रूप में लंबे समय से मौजूद रही है।
इस घटनाक्रम ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या आने वाले वर्षों में UK का मौजूदा स्वरूप बदल सकता है? हालांकि, अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि समझौता अपने आप UK को तोड़ने वाला कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है।
आखिर UK में क्या चल रहा है?
कार्डिफ बैठक में स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर और SNP नेता जॉन स्विनी, वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर और Plaid Cymru नेता रून एपी आयरवर्थ और उत्तरी आयरलैंड की फर्स्ट मिनिस्टर और Sinn Féin नेता मिशेल ओ'नील शामिल हुए। Sinn Féin की नेता मैरी लू मैकडोनाल्ड भी बैठक में मौजूद थीं।
तीनों नेताओं ने वेस्टमिंस्टर से संवैधानिक बदलाव के लिए तैयारी करने की मांग की और अपने-अपने क्षेत्रों के भविष्य को तय करने के अधिकार पर जोर दिया। समझौते में वेस्टमिंस्टर के मौजूदा प्रभुत्व को लेकर तीखी राजनीतिक टिप्पणी भी की गई। हालांकि, अहम बात यह है कि यह बैठक इन नेताओं के राजनीतिक दलों और स्वतंत्रता समर्थक रुख के संदर्भ में हुई थी; इससे तत्काल संवैधानिक बदलाव लागू नहीं होता।
PM एंडी बर्नहम का क्या रुख है?
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम UK की एकता के पक्ष में हैं। सरकार का फोकस फिलहाल इकोनॉमी, लिविंग कॉस्ट और डीसेंट्रलाइजेशन जैसे मुद्दों पर है। बर्नहम ने इसी साल जुलाई में स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेताओं से बातचीत में Devolution की बात कही थी। उन्होंने आगे के स्वतंत्रता जनमत संग्रहों के बजाय व्यावहारिक मुद्दों पर काम करने पर जोर दिया था।
स्कॉटलैंड पहले भी कर चुका ऐसी कोशिश
फिलहॉल स्कॉटलैंड UK का हिस्सा है, लेकिन इस देश में UK से अलग होने का मुद्दा नया बिल्कुल भी नहीं है। यहां साल 2014 में स्वतंत्रता पर जनमत संग्रह हुआ था। इसमें करीब 55 फीसद मतदाताओं ने UK में बने रहने के पक्ष में वोट दिया था, जबकि लगभग 45 फीसद ने स्वतंत्रता का समर्थन किया था। इस तरह से करीब 12 साल पहले बहुमत ने UK के साथ बने रहने की हामी भरी थी। अब 12 साल बाद SNP एक बार फिर से स्वतंत्रता जनमत संग्रह की मांग कर रहा है। हालांकि, नया जनमत संग्रह कराने के लिए संवैधानिक और कानूनी सवाल अब भी अहम हैं।
नॉर्थ आयरलैंड का मामला अलग
नॉर्थ आयरलैंड में स्थिति स्कॉटलैंड और वेल्स से थोड़ा जुदा है। 10 अप्रैल 1998 के गुड फ्राइडे एग्रीमेंट ने वहां की संवैधानिक व्यवस्था तय की थी। उस समझौते में आयरलैंड के साथ एकीकरण के प्रश्न पर जनमत संग्रह की व्यवस्था भी है, लेकिन इसके लिए निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन जरूरी है। यानी नॉर्थ आयरलैंड का भविष्य सिर्फ वेस्टमिंस्टर की राजनीतिक इच्छा से तय नहीं होता। वहीं स्कॉटलैंड और वेल्स के लिए स्वतंत्रता का रास्ता अलग संवैधानिक प्रक्रिया से होकर गुजरता है।
ब्रिटेन का दुनियाभर की सीमाएं बदलने का इतिहास
ब्रिटिश साम्राज्य के इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं जहां उसने दुनियाभर के देशों में शासन के दौरान उनकी सीमाएं बदली दी थीं। साल 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ, जिसे ब्रिटिश सरकार ने प्रशासनिक कारणों से उचित ठहराया था। व्यापक विरोध के बाद इसे 1911 में रद्द किया गया। साल 1947 में भारत को आजादी तो मिली, लेकिन अंग्रेज देश के दो टुकड़े करके गए। इस तरह से भारत के अलावा पाकिस्तान भी एक देश के रूप में अस्तित्व में आया।
इसी तरह ब्रिटिश शासन के दौरान आयरलैंड का विभाजन हुआ था। Government of Ireland Act 1920 के बाद उत्तरी आयरलैंड UK में बना रहा, जबकि दक्षिणी हिस्सा आगे स्वतंत्र आयरिश देश बन गया। फिलिस्तीन में भी ब्रिटिश मैंडेट के अंत में संयुक्त राष्ट्र ने 1947 में विभाजन योजना प्रस्तावित किया। इसके बाद 1948 में ब्रिटिश मैंडेट समाप्त हुआ और इजरायल के रूप में अलग देश की स्थापना हुई। इन घटनाओं में ब्रिटेन की भूमिका अहम थी, लेकिन हर मामले की राजनीतिक और ऐतिहासिक परिस्थितियां अलग थीं।
तो क्या सच में टूट जाएगा UK?
फिलहाल तो इस प्रश्न का सीधा जवाब 'नहीं' है। कार्डिफ समझौता राजनीतिक रूप से अहम जरूर है, लेकिन यह अपने आप UK को खत्म नहीं करता। जानकारों के मुताबिक तीनों क्षेत्रों के नेताओं का साथ आना वेस्टमिंस्टर पर राजनीतिक दबाव जरूर बढ़ा सकता है, खासकर तब जब स्वतंत्रता और अधिक स्वायत्तता की मांग अलग-अलग क्षेत्रों में बनी हुई है।
इसलिए फिलहाल कहानी UK के तुरंत टूटने की नहीं, बल्कि उसकी संवैधानिक संरचना और वेस्टमिंस्टर-केंद्रित शासन मॉडल पर बढ़ती चुनौती की है। आने वाले वर्षों में जनमत, चुनावी नतीजे, कानूनी प्रक्रिया और UK सरकार का रुख तय करेगा कि यह दबाव सिर्फ राजनीतिक अभियान तक सीमित रहता है या ब्रिटेन के संवैधानिक नक्शे में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलता है।
