आज जब सावन शिवरात्रि के अवसर पर देशभर के शिवालयों में जलाभिषेक हो रहा है तो यह जानना भी रोचक होगा कि उत्तर भारत का सबसे बड़ा शिवलिंग कहां है? इस शिवलिंग से जुड़ी कहानी क्या है? इसे किसने और कब स्थापित किया था? चलिए जानते हैं उत्तर भारत के सबसे बड़े शिवलिंग से जुड़ी कहानी।
यहां है उत्तर भारत का सबसे बड़ा शिवलिंग (AI Image)
कहां है उत्तर भारत का सबसे बड़ा शिवलिंग?
उत्तर भारत में वैसे तो कई बड़े-बड़े शिवालय हैं, जिनमें विशाल शिवलिंग हैं। लेकिन उत्तराखंड में मौजूद बूढ़ा केदार मंदिर में स्थापित शिवलिंग को सबसे बड़ा माना जाता है। यह सबसे बड़ा प्राकृतिक और ऐतिहासिक शिवलिंग यहां के टिहरी जिले में मौजूद है। जबकि मानव निर्मित 8 फीट का सबसे ऊंचा शिवलिंग जम्मू में रणबीरेश्वर मंदिर में मौजूद है।
वृद्ध केदार नाम क्यों पड़ा?
आज इस खबर में बात उत्तराखंड के टिहरी जिले में मौजूद बूढ़ाकेदार मंदिर के शिवलिंग पर होगी। यह मंदिर उन धार्मिक स्थलों में शामिल है, जहां आस्था के साथ हिमालय की प्राकृतिक खूबसूरती भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करती है। बाल गंगा और धर्म गंगा नदियों के संगम पर स्थित यह प्राचीन मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव ने यहां पर पांडवों को एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में दर्शन दिए थे। इसी वजह से इसे ‘बूढ़ाकेदार’ यानी पुराने या वृद्ध केदार के नाम से जाना जाता है।
शांत पहाड़ी क्षेत्र में है वृद्ध केदार मंदिर
वृद्ध केदार मंदिर समुद्र तल से लगभग 1,520 मीटर की ऊंचाई पर टिहरी गढ़वाल के एक शांत पहाड़ी क्षेत्र में मौजूद है। मंदिर की सबसे प्रमुख विशेषता ही यहां स्थापित विशाल शिवलिंग है। यहां मौजूद शिवलिंग को उत्तर भारत के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक माना जाता है। यहां मंदिर परिसर और आसपास का क्षेत्र देवदार के जंगलों, पहाड़ी ढलानों और सीढ़ीनुमा खेतों से घिरा है।
वृद्ध केदार मंदिर की पौराणिक मान्यता क्या है?
वृद्धकेदार मंदिर से जुड़ी कथा महाभारत काल की मान्यताओं से जुड़ी है। कथा के अनुसार कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद पांडव अपने कर्मों से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की तलाश में निकले थे। मान्यता है कि इसी दौरान भगवान शिव ने उन्हें इसी स्थान पर एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में दर्शन दिए। यहां मंदिर परिसर में एक प्राकृतिक शिला पर पांडवों और द्रौपदी जैसी आकृतियां दिखाई देने की बात भी कही जाती है। बता दें कि ये धार्मिक और स्थानीय मान्यताएं हैं, जिनका उल्लेख विभिन्न यात्रा स्रोतों में मिलता है।
बाल गंगा और धर्म गंगा के संगम पर बसा है बूढ़ा केदार
वृद्धकेदार को कई जगहों पर ‘पांचवां धाम’ भी कहा जाता है। हालांकि, यह नाम धार्मिक-स्थानीय परंपरा में प्रचलित है। उत्तराखंड के आधिकारिक चारधाम में फिलहाल इसका स्थान नहीं है। मंदिर की धार्मिक महत्ता के कारण इसे लंबे समय से तीर्थ यात्रियों के मार्ग का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता रहा है।
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कैसे पहुंचें वृद्धकेदार?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बूढ़ाकेदार सड़क मार्ग से नई टिहरी और क्षेत्र के अन्य प्रमुख स्थानों से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार नई टिहरी से वृद्ध केदार की दूरी लगभग 85 किलोमीटर है, जबकि देहरादून से बूढ़ाकेदार करीब 180 किमी दूर है। बूढ़ाकेदार जाने के लिए ऋषिकेश सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन और देहरादून का जॉली ग्रांट प्रमुख एयरपोर्ट है। नई टिहरी से बस या टैक्सी के जरिए आसानी से बूढ़ाकेदार पहुंचा जा सकता है।
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कब जाएं बूढ़ाकेदार?
बूढ़ाकेदार जाने के लिए अप्रैल से जून और सितंबर से नवंबर का समय अच्छा माना जाता है। मानसून के दौरान पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश और भूस्खलन का जोखिम बढ़ सकता है, इसलिए जब भी यहां जाने का प्लान करें, मौसम और सड़क की स्थिति की जानकारी लेकर जुटा लें।
