भारत में हमेशा से यह माना जाता रहा है कि अगर आपको रियल एस्टेट (प्रॉपर्टी) में निवेश करना है, तो आपके बैंक खाते में करोड़ों रुपये होने चाहिए। आम मध्यवर्गीय परिवार के लिए घर या जमीन खरीदना जिंदगी का सबसे बड़ा और इकलौता वित्तीय फैसला होता था, जिसके लिए उन्हें अपनी जमा-पूंजी लगानी पड़ती थी या फिर भारी-भरकम होम लोन का बोझ उठाना पड़ता था। लेकिन बदलते दौर और डिजिटल क्रांति ने इस धारणा को पूरी तरह से बदल दिया है। अब आपको रियल एस्टेट मार्केट से तगड़ा रिटर्न कमाने के लिए करोड़ों या लाखों रुपये की जरूरत नहीं है। आधुनिक वित्तीय विकल्पों की मदद से अब आप महज कुछ हजार रुपये के छोटे निवेश के साथ भी कमर्शियल प्रॉपर्टी, मॉल, और बड़े ऑफिस स्पेस के मालिक बन सकते हैं। यह बदलाव छोटे निवेशकों के लिए निवेश की एक नई और बेहद मुनाफे वाली दुनिया खोल रहा है।
कैसे रियल एस्टेट से करें कमाई?
इस बड़े बदलाव के पीछे सबसे बड़ा हाथ रीट्स (REITs - Real Estate Investment Trusts) और फ्रैक्शनल ओनरशिप (Fractional Ownership) जैसी नई निवेश तकनीकों का है। रीट्स को आप सीधे शब्दों में रियल एस्टेट का 'म्यूचुअल फंड' कह सकते हैं। जिस तरह म्यूचुअल फंड कई लोगों से छोटे-छोटे पैसे जुटाकर शेयर बाजार में लगाता है, ठीक उसी तरह रीट्स के जरिए कंपनियां छोटे निवेशकों से पैसे इकट्ठा करती हैं और बड़े-बड़े कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, आईटी पार्क या मॉल्स में निवेश करती हैं।
इन संपत्तियों से जो किराया (Rent) आता है और जो प्रॉपर्टी की वैल्यू बढ़ती है, उसका सीधा फायदा डिविडेंड के रूप में निवेशकों को मिलता है। सबसे अच्छी बात यह है कि आप शेयर बाजार के जरिए किसी भी रीट्स के यूनिट्स को महज कुछ सौ या हजार रुपये में खरीद सकते हैं। यानी बिना किसी बड़ी जमीन की रजिस्ट्री कराए, आप देश की सबसे बेहतरीन संपत्तियों से होने वाली कमाई में हिस्सेदार बन जाते हैं।
फ्रैक्शनल ओनरशिप
दूसरा तेजी से बढ़ता हुआ विकल्प है फ्रैक्शनल ओनरशिप (टुकड़ों में मालिकाना हक)। मान लीजिए कि दिल्ली या मुंबई के किसी बड़े बिजनेस हब में एक आलीशान ऑफिस स्पेस है, जिसकी कीमत 10 करोड़ रुपये है। कोई भी आम इंसान इसे अकेले नहीं खरीद सकता। लेकिन फ्रैक्शनल ओनरशिप प्लेटफॉर्म इस 10 करोड़ की प्रॉपर्टी को छोटे-छोटे टुकड़ों (जैसे 10-10 लाख रुपये के हिस्सों) में बांट देते हैं।
अब कई सारे छोटे निवेशक मिलकर इस प्रॉपर्टी को खरीद लेते हैं। इस ऑफिस से हर महीने जो लाखों रुपये का किराया आएगा, वह आपके निवेश के अनुपात में सीधे आपके बैंक खाते में ट्रांसफर कर दिया जाएगा। जब कुछ सालों बाद इस प्रॉपर्टी की कीमत बढ़ेगी और इसे बेचा जाएगा, तब आपको कैपिटल गेन (मुनाफा) भी मिलेगा। यह उन लोगों के लिए बेहतरीन मौका है जिनके पास थोड़ा बजट तो है, लेकिन वे पूरी प्रॉपर्टी खरीदने का जोखिम नहीं उठाना चाहते।
इस नए तरीके से रियल एस्टेट में निवेश करने के कई बड़े फायदे हैं। पहला फायदा यह है कि इसमें आपको किसी तरह का मेंटेनेंस नहीं संभालना पड़ता। आपको न तो किरायेदार ढूंढने की टेंशन होती है और ना ही प्रॉपर्टी की देखरेख की; यह सारा काम मैनेजमेंट कंपनियां संभालती हैं। दूसरा बड़ा फायदा है 'लिक्विडिटी' यानी पैसे की तरलता। पारंपरिक रियल एस्टेट (जैसे प्लॉट या फ्लैट) को जरूरत पड़ने पर तुरंत बेचना नामुमकिन होता है; ग्राहक ढूंढने और कागजी कार्रवाई में महीनों लग जाते हैं। लेकिन रीट्स (REITs) के मामले में आप जब चाहें शेयर बाजार में अपनी यूनिट्स बेचकर कुछ ही दिनों में अपना पैसा वापस पा सकते हैं। इसके अलावा, आप अपनी कम रकम को अलग-अलग शहरों की विभिन्न प्रॉपर्टीज में लगाकर अपने जोखिम को भी बहुत कम (Diversify) कर सकते हैं।
