क्या भारत, रूस और चीन मिलकर खत्म कर पाएंगे अमेरिकी डॉलर की बादशाहत?

भारत, रूस और चीन के शीर्ष नेताओं की आगामी मुलाकात से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में हलचल तेज हो गई है। यदि रुपया, रूबल और युआन ने मिलकर डॉलर को नकारने की कोई ठोस रणनीति बनाई, तो वैश्विक व्यापार की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।

अमेरिका और डॉलर, कहने को तो यह एक देश और उसकी करेंसी का नाम है, लेकिन दुनिया के लिए इसके मायने आज भी किसी बड़े दबदबे की तरह कायम हैं। अमेरिका के लिए डॉलर की वही अहमियत है, जो एक लोककथा में राजा की जान के लिए तोते की होती है। कहने का मतलब है कि अमेरिका वही राजा है, जिसकी जान डॉलर नाम के तोते में बसती है। अमेरिका अगर आज दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना है, तो उसका सबसे बड़ा कारण डॉलर का वैश्विक प्रभुत्व ही है। इस सच्चाई के साथ एक बड़ा सच यह भी है कि अमेरिकी डॉलर को रूस और चीन की ओर से लगातार कड़ी चुनौती मिल रही है, और यदि इसमें भारत भी पूरी तरह शामिल हो जाए तो वैश्विक आर्थिक समीकरण काफी हद तक पलट सकते हैं।

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क्या भारत, रूस और चीन मिलकर खत्म कर पाएंगे अमेरिकी डॉलर की बादशाहत?

ट्रंप की धमकी का कितना असर?

पिछले साल जब ब्रिक्स सम्मेलन का मंच सजा था, तब वहां से डी-डॉलराइजेशन की गूंज जोर-शोर से उठी थी। उस सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एक साथ नजर आए थे। दुनिया के इन तीन मजबूत राष्ट्रों के नेताओं की उपस्थिति में जब डॉलर को चुनौती देने की बात उठी, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पूरी तरह बौखला गए थे। उन्होंने धमकी भरे अंदाज में यहां तक कह डाला था कि यदि कोई देश डॉलर की तरफ आंख उठाकर भी देखेगा, तो उस पर भारी टैरिफ लगाकर उसकी अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया जाएगा। हालांकि, अगर आंकड़ों के आईने में देखा जाए तो दुनिया का करीब 55 फीसदी कारोबार और विदेशी मुद्रा बाजार का 90 फीसदी लेनदेन आज भी अकेले डॉलर में ही होता है।

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