भारतीय कॉरपोरेट इतिहास में टाटा ग्रुप की अपनी एक अलग पहचान रही है। आम लोगों के बीच इस ग्रुप के प्रति भरोसा दशकों से कायम है। नमक से लेकर कार तक, टाटा की कंपनियां देश के करोड़ों घरों तक पहुंची हैं और इसी वजह से इस ब्रांड के साथ विश्वास की एक मजबूत डोर जुड़ी रही है।
हालांकि, रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ग्रुप एक बार फिर कॉरपोरेट गवर्नेंस और कंट्रोल को लेकर चर्चा में है। टाटा संस के नियंत्रण और गवर्नेंस से जुड़े मुद्दों को लेकर एन. चंद्रशेखरन और नोएल टाटा से जुड़ा विवाद अब कानूनी स्तर तक पहुंच चुका है।
इस बीच एन. चंद्रशेखरन के कार्यकाल को पांच साल का विस्तार देने और Tata Trusts के Voting Rights को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। आखिर टाटा संस में कंट्रोल का असली गणित क्या है? नोएल-चंद्रशेखरन विवाद में Voting Rights इतना अहम क्यों है? और Tata Trusts के अधिकारों का टाटा ग्रुप के गवर्नेंस पर क्या असर पड़ सकता है? आइए, पूरे मामले को आसान भाषा में समझते हैं।
66% हिस्सेदारी के बावजूद नोएल की नहीं चली
टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66% हिस्सेदारी है। इसके बावजूद एन. चंद्रशेखरन को दोबारा पांच साल के लिए कार्यकारी चेयरमैन नियुक्त करने के फैसले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। 17 सितंबर को टाटा संस के निदेशक मंडल ने उनकी दोबारा नियुक्ति को मंजूरी दी। नोएल टाटा ने इस फैसले की वैधता पर सवाल उठाया है।
नोएल टाटा का तर्क है कि टाटा संस के कंपनी नियमों के तहत कुछ महत्वपूर्ण फैसलों के लिए टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों की मंजूरी जरूरी है। उनका कहना है कि सिर्फ निदेशक मंडल का सामान्य बहुमत या चेयरमैन का निर्णायक मत इस अतिरिक्त शर्त को खत्म नहीं कर सकता। मौजूदा विवाद का मुख्य सवाल यही है कि इन विशेष मतदान अधिकारों को इस मामले में किस तरह लागू किया जाए।
2021 का मिस्त्री मामला चर्चा में आया
मौजूदा विवाद को समझने के लिए 2021 के टाटा-साइरस मिस्त्री मामले को समझना जरूरी है। अक्टूबर 2016 में साइरस मिस्त्री को टाटा संस के कार्यकारी चेयरमैन पद से हटा दिया गया था। इसके बाद मिस्त्री परिवार और शापूरजी पलोनजी समूह, जिसकी टाटा संस में करीब 18.37% हिस्सेदारी थी, ने इस फैसले को चुनौती दी और कुप्रबंधन के आरोप लगाए।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था विवाद
मामला राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। दिसंबर 2019 में न्यायाधिकरण ने मिस्त्री को बहाल करने का आदेश दिया था। लेकिन मार्च 2021 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एस.ए. बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस फैसले को पलटते हुए टाटा संस के पक्ष में फैसला दिया। अदालत ने मिस्त्री को हटाने के फैसले और टाटा संस के कंपनी नियमों से जुड़े कई प्रावधानों को भी बरकरार रखा।
टाटा ट्रस्ट्स के पास मतदान अधिकार क्या हैं?
2021 के फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों के विशेष मतदान अधिकारों से जुड़ा था। टाटा संस के कंपनी नियमों में सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट को कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं। इनमें निदेशकों को नामित करने और कुछ महत्वपूर्ण मामलों में उनकी सहमति की भूमिका शामिल है।
मिस्त्री पक्ष ने इन विशेष मतदान अधिकारों को चुनौती देते हुए इन्हें अल्पसंख्यक शेयरधारकों के लिए दमनकारी और भेदभावपूर्ण बताया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और इन अधिकारों को बरकरार रखा। इन प्रावधानों के कारण कुछ खास मामलों में टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों की सहमति बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यही वजह है कि 2021 का फैसला मौजूदा विवाद में फिर चर्चा के केंद्र में है।
चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर विवाद कैसे बढ़ा?
मौजूदा विवाद में टाटा संस के कंपनी नियमों का अनुच्छेद 121 खास महत्व रखता है। इसके तहत कुछ मामलों में निदेशक मंडल के बहुमत के साथ टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों के बहुमत की सहमति भी जरूरी है। मौजूदा मंडल में टाटा ट्रस्ट्स के दो नामित निदेशक हैं, नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन।
17 सितंबर को चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर श्रीनिवासन ने समर्थन में मत दिया, जबकि नोएल टाटा ने विरोध किया। मंडल के चार अन्य निदेशकों ने भी समर्थन किया। टाटा संस ने इसे बहुमत से लिया गया वैध फैसला माना। वहीं, टाटा ट्रस्ट्स ने सवाल उठाया कि जब ट्रस्ट के दोनों नामित निदेशक एकमत नहीं हैं, तो सिर्फ पूरे मंडल के बहुमत या चेयरमैन के निर्णायक मत के आधार पर फैसला कैसे वैध माना जा सकता है।
समझिए वोटिंग राइट्स का पूरा गणित
2021 के फैसले का विवाद पर क्या असर?
टाटा ट्रस्ट्स का तर्क है कि 2021 में टाटा संस ने सुप्रीम कोर्ट के सामने इन्हीं विशेष मतदान अधिकारों का बचाव किया था और अदालत ने भी इन्हें वैध माना था। इसलिए अब उन्हीं प्रावधानों की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे ट्रस्ट के नामित निदेशकों की भूमिका खत्म हो जाए। ट्रस्ट्स की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने भी 2021 के फैसले का हवाला देते हुए ट्रस्ट्स की भूमिका को रेखांकित किया है।
हालांकि, 2021 के फैसले का मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने टाटा ट्रस्ट्स को टाटा संस के हर फैसले पर अंतिम अधिकार दे दिया था। अदालत ने कंपनी के नियमों में पहले से मौजूद विशेष अधिकारों की वैधता को बरकरार रखा था। अब असली कानूनी सवाल यह है कि जब ट्रस्ट द्वारा नामित दो निदेशक किसी फैसले पर अलग-अलग राय रखते हैं, तब अनुच्छेद 121 और चेयरमैन के निर्णायक मत जैसे प्रावधानों को कैसे लागू किया जाए। मिस्त्री मामले में यह स्थिति सीधे तौर पर सामने नहीं आई थी। इसलिए मौजूदा विवाद का केंद्र 2021 के फैसले से ज्यादा उन कंपनी नियमों की वर्तमान मामले में व्याख्या है।
