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लिपुलेख दर्रा क्या है, जानें इतिहास और महत्व, भारत-चीन समेत दुनिया के लिए क्यों अहम?

Lipulekh Pass: लिपुलेख दर्रे से भारत-चीन सीमा व्यापार 6 साल बाद फिर शुरू होने जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकार ने सभी तैयारियां, एनओसी, ट्रैड पास, बैंकिंग, सीमा शुल्क और सुरक्षा के लिए निर्देश जारी कर दिए हैं। यह ट्रेड दोनों देशों के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से अहम है और दुनिया पर भू-राजनीतिक संकेत देगा।

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Photo : iStock
लिपुलेख दर्रा: भारत-चीन सीमा का ऐतिहासिक व्यापार मार्ग (प्रतीकात्मक तस्वीर-istock)
Authored by: रामानुज सिंह
Updated Mar 21, 2026, 11:00 IST
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Lipulekh Pass : उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत-चीन सीमा व्यापार 6 साल के बाद फिर से शुरू होने जा रहा है। यह व्यापार जून से सितंबर तक संचालित होगा। इस बारे में संबंधित अधिकारियों और एजेंसियों को जरुरी निर्देश जारी कर दिए गए हैं। केंद्र सरकार से निर्देश मिलने के बाद इस वर्ष के सीमा व्यापार सत्र की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। विदेश मंत्रालय द्वारा इस संबंध में अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) जारी किए जाने के बाद प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। राज्य सरकार के विभिन्न विभागों और एजेंसियों को निर्देश दिए गए हैं ताकि 2026 के व्यापार सत्र के अनुसार सभी तैयारियां समय पर पूरी की जा सकें। इसके अलावा स्थानीय अधिकारियों के संपर्क डिटेल चीन के अधिकारियों के साथ शेयर किए जाएंगे, जिससे दोनों देशों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सके। केंद्रीय गृह मंत्रालय और केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने भी इस संबंध में एनओसी जारी किया है। इस कदम से यह सुनिश्चित होगा कि सीमा व्यापार सुचारू रूप से और सुरक्षित तरीके से चल सके। अधिकारियों ने व्यापार मार्ग में जरूरी सुविधाओं के लिए विस्तृत योजना बनाई है। इसमें ट्रैड पास जारी करने वाले अधिकारी, मुद्रा विनिमय के लिए बैंक, सीमा शुल्क विभाग सभी शामिल होंगे। तो आइए जानते हैं लिपुलेख दर्रा क्या है? भारत-चीन के लिए क्यों अहम है। इसका दुनिया पर क्या असर होगा।

लिपुलेख दर्रा क्या है?

लिपुलेख दर्रा भारत और चीन के बीच उत्तराखंड राज्य में स्थित एक उच्च पर्वतीय मार्ग है। यह दर्रा समुद्र तल से करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर है। यह दर्रा भारत के उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में आता है। लिपुलेख दर्रा से होकर नेपाल और चीन के बीच मार्ग जाता है। यह दर्रा ऐतिहासिक रूप से व्यापार मार्ग के रूप में भी प्रसिद्ध रहा है, जहां से लोग तिब्बती मसाले, ऊन और अन्य सामान ले जाते थे। भारत के लिए लिपुलेख दर्रा मुख्य रूप से सुरक्षा और रणनीति के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। यह उत्तराखंड को चीन से जोड़ने वाला मुख्य मार्ग है। भारतीय सेना यहां पर चौकसी बनाए रखती है ताकि सीमा पर किसी भी अनहोनी की स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके। चीन के लिए भी लिपुलेख दर्रा रणनीतिक दृष्टि से अहम है। यह दर्रा तिब्बत और भारत के उत्तराखंड क्षेत्र के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाता है। इसलिए दोनों देशों के लिए यह दर्रा सिर्फ भूगोलिक नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

लिपुलेख दर्रे का इतिहास और महत्व

लिपुलेख दर्रा के जरिये भारत और चीन (तिब्बत) का सीमा व्यापार लंबे समय तक चलता रहा है। यह व्यापार 1992 में फिर से शुरू हुआ था, लेकिन कोविड-19 महामारी के दौरान 2019 में इसे बंद कर दिया गया था। तब से व्यापारी इसके पुनः संचालन का इंतजार कर रहे थे। लिपुलेख दर्रा न केवल व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत-चीन संबंधों में सहयोग और भरोसे का भी प्रतीक है। व्यापार की बहाली से न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ होगा, बल्कि सीमा पर सुरक्षा और प्रशासनिक नियंत्रण भी मजबूत रहेगा। लिपुलेख दर्रा सदियों से भारत और तिब्बत के बीच व्यापार और संपर्क का माध्यम रहा है। यह मार्ग हेमकुंड साहिब और केदारनाथ जैसे धार्मिक स्थलों तक पहुंचने वाले तीर्थयात्रियों के लिए भी महत्वपूर्ण था। ब्रिटिश शासन के दौरान, इस क्षेत्र की नक्शेबंदी हुई और लिपुलेख को सामरिक दृष्टि से देखा जाने लगा। 1962 की भारत-चीन युद्ध के बाद, यह दर्रा दोनों देशों के लिए रणनीतिक और सुरक्षा दृष्टि से और भी अहम बन गया।

भारत-चीन समेत दुनिया पर प्रभाव

हालांकि लिपुलेख दर्रा छोटा और सीमित क्षेत्र वाला है, इसका वैश्विक भू-राजनीतिक महत्व है। यह भारत-चीन जैसे बड़े देशों के बीच रणनीतिक संतुलन और सैन्य तैयारियों का हिस्सा है। यह दर्रा दुनिया के लिए यह याद दिलाता है कि पर्वतीय और सीमावर्ती क्षेत्रों में राजनीतिक और सैन्य महत्व हमेशा उच्च होता है।

आर्थिक और व्यापारिक असर

भारत-चीन सीमा व्यापार शुरू होने से स्थानीय और क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। इससे भारत के उत्तराखंड और पड़ोसी राज्यों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी। छोटे और सीमांत व्यापारी अपने सामान को चीन (तिब्बत) के तकलाकोट भंडारगृहों से वापस ला सकेंगे। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका असर सीमित है, लेकिन यह संकेत देगा कि भारत और चीन दोनों अपने व्यापारिक रिश्तों को बनाए रखने में रुचि रखते हैं। इससे निवेशकों और व्यापारिक साझेदारों के लिए भरोसा बढ़ सकता है।

सैन्य और रणनीतिक दृष्टि

लिपुलेख दर्रा सिर्फ व्यापार मार्ग नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इसका संचालन यह दिखाता है कि दोनों देश विवादों के बावजूद सीमावर्ती क्षेत्रों में सहयोग कर सकते हैं। यह वैश्विक सुरक्षा विश्लेषकों के लिए भी संकेत है कि भारत-चीन संबंध तनावपूर्ण होने के बावजूद पूर्णतः कटु नहीं हैं।

क्षेत्रीय भू-राजनीति पर असर

इस व्यापार से नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी देशों पर भी असर पड़ सकता है। यह दिखाता है कि भारत-चीन सीमावर्ती सहयोग के लिए सीमित लेकिन महत्वपूर्ण पहल कर सकते हैं। इससे एशिया में सामरिक संतुलन पर हल्का सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

पर्यावरण और स्थानीय जीवन पर असर

जैसा कि लिपुलेख दर्रा हिमालय में है, इसका संचालन स्थानीय पर्यावरण और जनजीवन पर असर डाल सकता है। अधिक व्यापार और आवाजाही से ग्लेशियर और पर्वतीय मार्ग प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए सुरक्षा, पर्यावरण और आपातकालीन व्यवस्थाओं को मजबूत रखना जरूरी है।

वैश्विक संकेत और भरोसा

दुनिया के लिए यह संदेश जाता है कि भारत और चीन जैसे बड़े पड़ोसी देशों में विवाद के बावजूद व्यावहारिक सहयोग संभव है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीतिक मंचों पर भरोसा बढ़ता है।

लिपुलेख दर्रे से भारत-चीन व्यापार शुरू होना मुख्य रूप से स्थानीय और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों के लिए फायदेमंद है। इसके साथ ही यह रणनीतिक और भू-राजनीतिक संदेश भी देता है कि सीमावर्ती सहयोग और भरोसा बनाए रखना संभव है। हालांकि इसका सीधे वैश्विक आर्थिक असर सीमित होगा, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।

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