US Supreme Court ने IEEPA के तहत लगाए गए टैरिफ को अवैध करार देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मनमानी पर लगाम लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का व्यावहारिक असर क्या होगा, यह अभी साफ नहीं, लेकिन इतना तय है कि ट्रंप ने अपने कोर वोटर्स को टैरिफ प्लान के जरिये जो 4 ट्रिलियन डॉलर का ख्वाब दिखाया था, वह फिलहाल चकनाचूर हो गया है। 20 जनवरी, 2025 को ट्रंप जब दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति बने, तो व्हाइट हाउस में कदम रखते ही पहले दिन, जो फैसले किए उनमें टैरिफ भी शामिल था। ट्रंप का पूरा चुनावी कैंपेन भी टैरिफ के जरिये अमेरिका को फिर से महान (MAGA) के इर्दगिर्द चला।
क्या है ट्रंप का टैरिफ प्लान?
अप्रैल 2025 में ट्रंप अमेरिका में होने वाले सभी आयात पर 10% का एक बेसिक टैरिफ लगा दिया। इसके अलावा तमाम देशों से अमेरिका में आने वाले आयात पर रेसिप्रोकल यानी जवाबी टैरिफ की तोप तान दी, जिससे तमाम देशों ने अमेरिका के साथ अलग से टैरिफ समझौतों पर बात शुरू कर दी। ट्रंप ने टैरिफ को अपनी सरकार की डिप्लोमेसी का सबसे बड़ा हथियार बना लिया। भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन के साथ ही मैक्सिको और कनाडा जैसे अपने ट्रेड पार्टनर्स पर ट्रंप ने मनमाने ढंग से टैरिफ लगा दिए। ट्रंप का मानना है कि अमेरिकी लोगों की परचेजिंग पावर पर पूरी दुनिया चलती है, ट्रंप इसका इस्तेमाल डिप्लोमेसी की जगह कर सकते हैं और मनमाने नतीजे हासिल कर सकते हैं। हालांकि, यह बहस का विषय है कि ट्रंप इसमें कितने कामयाब हुए। लेकिन, ट्रंप मानते यही हैं कि उनका प्लान काम कर रहा है।
क्या है 4 ट्रिलियन डॉलर का खेल?
4 ट्रिलियन डॉलर का खेल असल में टैरिफ से आने वाले रेवेन्यू का है। ट्रंप प्रशासन की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दी गई दलीलों के मुताबिक टैरिफ लगाकर महज कुछ वर्षों में करीब 4 ट्रिलियन डॉलर तक अतिरिक्त पैसा जुटाया जा सकता है, जिससे करीब 3 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज में दबी अमेरिका की फेडरल गवर्नमेंट को राहत मिलेगी। यूएस कांग्रेसनल बजट ऑफिस (CBO) के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में अमेरिका का सालाना बजट घाटा करीब 1.8 ट्रिलियन डॉलर है और कुल कर्ज 34 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर है।
घुमाकर कान पकड़ने की योजना
कई अमेरिकी अर्थशास्त्रियों ने इसे ट्रंप की शातिर योजना करार दिया है। असल में इसे घुमाकर कान पकड़ने जैसा बताया। ट्रंप रेवेन्यू बढ़ाने के लिए सीधे तौर पर अमेरिकी लोगों पर टैक्स बढ़ाते, तो यह राजनीतिक रूप से उनके लिए नुकसान का सौदा होता। उन्होंने इसका एक शातिर तोड़ निकाला और आयात पर टैरिफ लगाने की योजना बनाई। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि एक बार भले ही ग्लोबल ट्रेड में टैरिफ की वजह से कुछ डिसरप्शन देखने को मिलें, लेकिन आखिर में इसकी कीमत अमेरिकी उपभोक्ताओं को ही चुकानी है। ट्रंप सीधे तौर पर अमेरिकी लोगों से टैक्स बढ़ाकर रेवेन्यू वसूलने की हिम्मत नहीं रखते हैं, इस वजह से उन्होंने यह रास्ता अपनाया है।
क्यों अवैध साबित हुआ ट्रंप का प्लान?
ट्रंप के टैरिफ प्लान को अवैध करार देते हुए अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट यानी IEEPA का सहारा लेकर ये टैरिफ लगाए गए हैं। यह कानून राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की अनुमति देता ही नहीं है। फैसले में साफ शब्दों में लिखा है कि “IEEPA does not authorize the President to impose tariffs.” कोर्ट का तर्क था कि टैरिफ दरअसल टैक्स हैं। अमेरिकी संविधान के मुताबिक टैक्स लगाने की शक्ति कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं। IEEPA में “Regulate” (नियंत्रित करना) शब्द जरूर है, लेकिन उसमें “Tariffs” या “Duties” का जिक्र नहीं है। कोर्ट ने माना कि 10% यूनिवर्सल टैरिफ और कुछ देशों पर 100% से ज्यादा टैरिफ जैसे व्यापक
आर्थिक वाले फैसले के लिए स्पष्ट विधायी मंजूरी जरूरी थी। बिना साफ कानून के “अनलिमिटेड” टैरिफ पावर का दावा संवैधानिक सीमा से बाहर माना गया।
US Supreme Court Decision
क्या सभी टैरिफ हट जाएंगे?
इसका सीधा जवाब है कि सभी टैरिफ नहीं हटेंगे। सुप्रीम कोर्ट का फैसला सिर्फ उन टैरिफ पर लागू होता है जो IEEPA के तहत लगाए गए थे। कोर्ट ने साफ कहा कि “IEEPA does not authorize the President to impose tariffs.” यानी आपातकाल घोषित कर लगाए गए 10% यूनिवर्सल टैरिफ, भारत पर रूसी ऑयल आयात करने पर लगाए गए 25% टैरिफ और चीन पर 145% तक के रिटैलिएटरी टैरिफ अब कानूनी रूप से अमान्य होंगे। कनाडा और मेक्सिको पर लगाए गए 25% टैरिफ भी इस फैसले से हट जाएंगे। क्योंकि कोर्ट ने इन्हें “Unbounded in Scope, Amount, and Duration” भी बताते हुए कहा कि ये टैरिफ दायरे, रकम और समय तीनों मामलों में बिना स्पष्ट सीमा के हैं।
कौनसे टैरिफ रहेंगे जारी?
Trade Expansion Act, 1962 के तहत लगाए गए स्टील पर 25% और एल्युमिनियम पर 10% टैरिफ इस फैसले से प्रभावित नहीं होंगे। कोर्ट ने अपने आदेश में Section 232 को अलग कानूनी ढांचे के रूप में माना है, इसलिए ये शुल्क फिलहाल जारी रहेंगे। इसके अलावा Section 301 (चीन-विशेष) टैरिफ पर भी कोर्ट के इस आदेश का असर नहीं होगा। Trade Act, 1974 के तहत चीन पर 2018 से लागू टैरिफ IEEPA से अलग कानून पर आधारित हैं। इसलिए यह फैसला उन पर लागू नहीं होता और वे यथावत रहेंगे।
एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी जारी
कोर्ट के आदेश से यह भी साफ होता है कि उद्योग जांच और WTO नियमों के तहत लगाए गए एंटी-डंपिंग व काउंटरवेलिंग शुल्क इस फैसले से अप्रभावित हैं, क्योंकि वे आपातकालीन शक्तियों पर आधारित नहीं हैं।
क्या तुरंत हट जाएंगे टैरिफ?
इसका सीधा जवाब है नहीं। क्योंकि, कोर्ट के आदेश के साथ ही टैरिफ अपने-आप शून्य नहीं हो जाएंगे। बल्कि, कोर्ट के आदेश ने ट्रंप प्रसाशन से इन टैरिफ से कानूनी संरक्षण छीन लिया है। अब इन टैरिफ का कोई कानूनी आधार नहीं रह गया है। लेकिन, व्यावहारिक रूप से प्रशासन जब तक इन्हें वापस लेने का आदेश जारी नहीं करता है, या कोई अदालत इन्हें खत्म करने का आदेश नहीं देती है, तब तक ये टैरिफ लागू रहेंगे।
