US Iran Deal 2026 के बीच बातचीत के दौरान ईरान ने अपने ₹1000000 करोड़ वापस मांगे हैं। असल में ईरान पर दशकों से लगे अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने एक ऐसी स्थिति बना दी है, कि अलग-अलग देशों में ईरान के 120 अरब डॉलर से ज्यादा फंसे हैं। यह पैसा मुख्यतः तेल निर्यात से आया राजस्व और विदेशी मुद्रा भंडार है। यही वजह है कि किसी भी परमाणु समझौते, सैंक्शंस रिलीफ या शांति वार्ता में इसकी पूरी और बिना शर्त वापसी उसकी सबसे बड़ी शर्त बन जाती है। हाल में ही इस्लामाबाद में हुई US-Iran बातचीत में भी ईरान ने यह मुद्दा उठाया है।
कुल कितना पैसा फंसा है?
अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान का $80 से $120 अरब (₹6.5 से ₹10 लाख करोड़) तक पैसा विदेशों में अटका हुआ है। यह आंकड़ा अलग-अलग रिपोर्ट्स में थोड़ा बदलता है, लेकिन मोटे तौर पर $100 अरब से ज्यादा रकम फंसी है। इसकी जड़ें 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद शुरू हुए प्रतिबंधों में हैं, लेकिन असली झटका 2018 में लगा, जब Donald Trump ने JCPOA से अमेरिका को बाहर कर दिया। इससे पहले 2015 में इसी डील के तहत ईरान को $100 अरब से ज्यादा की राहत मिली थी, लेकिन बाद में वही पैसा फिर से फंस गया।
कहां-कहां फंसा है पैसा?
1979 के बाद शुरू हुए प्रतिबंधों ने ईरान की वैश्विक बैंकिंग पहुंच सीमित कर दी। 2015 में JCPOA के तहत राहत मिली, लेकिन 2018 में Donald Trump के बाहर निकलते ही फिर सख्ती बढ़ गई। इसके बाद तेल निर्यात से कमाई गई रकम विदेशी खातों में जमा होती रही, लेकिन ईरान उसे निकाल नहीं सका। यह रकम दुनिया के कई हिस्सों में फैली हुई है, और ज्यादातर तेल खरीदार देशों के बैंक खातों में पड़ी है।
कतर में फंसे करीब $6 अरब : यह रकम मूल रूप से दक्षिण कोरिया में फंसी थी, जिसे 2023 में प्रिजनर स्वैप के बाद कतर के खातों में ट्रांसफर किया गया। लेकिन इसका इस्तेमाल सिर्फ खाना और दवा जैसे मानवरीय खर्चों तक सीमित है। इजरायल में अक्टूबर 2023 के हमास अटैक के बाद यह फंड फ्रीज कर दिया गया।
इराक में फंसे $10 अरब : यह पैसा ईरान को गैस और बिजली सप्लाई के बदले मिलना है, लेकिन यह प्रतिबंधित खातों में है और सीधे ईरान को नहीं मिल पा रहा है। इसके अलावा जापान में करीब 3 अरब डॉलर फंसे हैं, जो तेल व्यापार से जुड़े हैं।
UAE और अन्य नेटवर्क: संयुक्त अरब अमीरात, चीन, तुर्की, सिंगापुर, भारत और यूरोप के कुछ हिस्सों में ईरानी पैसे के अलग-अलग चैनल हैं। कई बार यह रकम सीधे सरकारी खाते में नहीं, बल्कि शेल कंपनियों और शैडो बैंकिंग नेटवर्क के जरिए घूमती रही है। इन पैसों तक ईरान की सीधी पहुंच नहीं है। यह पैसा अक्सर US Treasury की निगरानी में होता है और सप्लायर्स को भुगतान के रूप में इस्तेमाल होता है।
US IRAN Deal
क्यों यह डील की सबसे बड़ी शर्त है?
पहला कारण है आर्थिक संकट। ईरान में महंगाई 60% से ऊपर तक पहुंच चुकी है, मुद्रा कमजोर है और क्षेत्रीय तनाव, खासकर हॉर्मूज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते जोखिम ने दबाव और बढ़ा दिया है। यह पैसा मिलते ही सरकार के पास राहत पैकेज, आयात और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए तुरंत संसाधन आ सकते हैं। दूसरा, यह विश्वास का सवाल है। ईरान का साफ कहना है कि जब तक उसका पैसा वापस नहीं मिलता, तब तक किसी भी नई डील पर भरोसा करना मुश्किल है। ईरानी अधिकारियों के लिए यह बातचीत से पहले भरोसे की परख है। तीसरा, यह एक नेगोशिएशन टूल है। ईरान के पास यह मुद्दा एक लेवरेज की तरह है। वह इसे परमाणु कार्यक्रम, सुरक्षा गारंटी और क्षेत्रीय रणनीति के साथ जोड़ता है। वहीं अमेरिका इसे चरणबद्ध तरीके से खोलना चाहता है, ताकि बदले में ठोस परमाणु और सुरक्षा प्रतिबद्धताएं मिलें।
