मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और खास तौर पर ईरान के साथ चल रही तनातनी का सीधा और बहुत बुरा असर अब दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी अमेरिका पर दिखने लगा है। अमेरिका में महंगाई की दर (Inflation Rate) आसमान छू रही है, जिसने पिछले तीन सालों के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। ऊर्जा और ईंधन की कीमतों में अचानक हुए भारी इजाफे ने अमेरिकी नागरिकों के सामने एक बहुत बड़ा 'अफोर्डेबिलिटी चैलेंज' खड़ा कर दिया है। यह आर्थिक संकट ऐसे समय में आया है जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव का माहौल गरमाया हुआ है, जिससे राजनीतिक गलियारों में भी हड़कंप मच गया है।
इसके बजाय, ट्रंप ने सरकार के उन आंकड़ों की सराहना की जिसमें महंगाई के अप्रैल 2023 के बाद के उच्च स्तर पर पहुंचने की बात कही गई है। ट्रंप ने कहा, ’’ आप जानते हैं कि मुझे वास्तव में क्या पसंद है? मुझे महंगाई पसंद है।’’ यह एक अनपेक्षित टिप्पणी है क्योंकि नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले मतदाताओं ने अर्थव्यवस्था को अपनी प्रमुख चिंता बताया है और इस मुद्दे पर डोनाल्ड ट्रंप को कम अंक दिए हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी ने ट्रंप के इस बयान का वीडियो कुछ ही मिनट के भीतर सोशल मीडिया पर तेजी से प्रचारित करना शुरू भी कर दिया।
ईंधन और ऊर्जा की कीमतों ने बिगाड़ा खेल
अमेरिका में महंगाई बढ़ने की सबसे मुख्य वजह इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल (Crude Oil) और गैस की कीमतों में आई भारी तेजी है। ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी जंग और इसमें अमेरिका के सीधे या परोक्ष रूप से शामिल होने के चलते मिडिल ईस्ट के सप्लाई रूट्स बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। ऊर्जा की बढ़ती कीमतों ने अमेरिका के भीतर ट्रांसपोर्टेशन, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स की लागत को काफी बढ़ा दिया है। इस वजह से न केवल पेट्रोल-डीजल महंगे हुए हैं, बल्कि आम जरूरत की चीजें जैसे ग्रोसरी, बिजली और अन्य घरेलू सेवाएं भी आम अमेरिकी नागरिकों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं।
आम अमेरिकी नागरिकों के सामने बड़ा संकट
इस समय अमेरिका में महंगाई की दर अपने तीन साल के उच्चतम स्तर पर है। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिकी डॉलर की परचेजिंग पावर कम हो गई है। लोग अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ जरूरी चीजों जैसे घर के किराए, खाने-पीने और मेडिकल खर्चों को पूरा करने में ही गंवा रहे हैं। बैंकों द्वारा ब्याज दरों में की गई बढ़ोतरी के बावजूद इन्फ्लेशन पर काबू पाना मुश्किल हो रहा है। मिडिल क्लास और लोअर-इनकम ग्रुप के परिवारों के लिए अपनी लाइफस्टाइल को मेंटेन रखना बेहद मुश्किल हो गया है, जिससे वहां की जनता में सरकार के खिलाफ काफी गुस्सा देखा जा रहा है।
राष्ट्रपति चुनाव और जो बाइडेन की मुश्किलें
महंगाई का यह नया शॉक अमेरिकी सरकार के लिए सबसे गलत समय पर आया है। आगामी राष्ट्रपति चुनावों को देखते हुए मौजूदा जो बाइडेन प्रशासन के लिए यह स्थिति किसी बड़े राजनीतिक झटके से कम नहीं है। विपक्ष इस मुद्दे को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। आम जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि सरकार की कमजोर विदेश नीति और ईरान से उलझने के फैसले का खामियाजा देश की अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ रहा है। आर्थिक मोर्चे पर विफलता किसी भी चुनाव में मौजूदा सरकार के लिए सबसे बड़ी कमजोरी साबित होती है, और अमेरिका में भी इस वक्त यही देखने को मिल रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप ने साधा निशाना
इस पूरे आर्थिक संकट के बीच पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जो बाइडेन सरकार पर तीखा हमला बोला है। डोनाल्ड ट्रंप ने इस महंगाई को 'बाइडेन-इन्फ्लेशन' का नाम देते हुए कहा है कि मौजूदा सरकार देश की सीमाओं के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को संभालने में भी पूरी तरह नाकाम रही है। ट्रंप अपनी चुनावी रैलियों में लगातार यह दावा कर रहे हैं कि अगर वे सत्ता में होते, तो ईरान की इतनी हिम्मत नहीं होती और न ही वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें इस कदर बढ़तीं।
आगे क्या हैं संकेत?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मिडिल ईस्ट में शांति स्थापित नहीं होती और ईरान के साथ तनाव कम नहीं होता, तब तक कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने की संभावना बहुत कम है। अगर आने वाले कुछ महीनों में महंगाई की दर नीचे नहीं आती है, तो यह अमेरिकी फेडरल रिजर्व (वहां का केंद्रीय बैंक) को ब्याज दरें और ऊंची रखने के लिए मजबूर करेगा, जिससे आर्थिक मंदी (Recession) का खतरा भी बढ़ सकता है। कुल मिलाकर, ईरान के साथ दुश्मनी मोल लेना अमेरिका को आर्थिक मोर्चे पर बहुत भारी पड़ रहा है, और इसका नतीजा आने वाले चुनावों के नतीजों को पूरी तरह से बदल सकता है।
