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Urban Flooding Explained: मानसून में क्यों घुटनों पर आ जाते हैं हमारे हाइटेक शहर?

भारत के बड़े शहर मानसून की कुछ घंटों की तेज बारिश में झील बन रहे हैं। पटना, दिल्ली, गुरुग्राम, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में जलभराव की तस्वीरें आम हैं। आखिर स्मार्ट सिटी क्यों बन रहे 'वाटर सिटी'?

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बारिश होते ही क्यों डूब रहे शहर?
Authored by: Alok Kumar
Updated Aug 7, 2026, 13:13 IST
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El-Nino के असर से इस साल भले ही मानसून देर से सक्रिय हुआ और जून-जुलाई में बादलों ने कंजूसी दिखाई, लेकिन अगस्त की शुरुआत होते ही बदरा ऐसे बरसे कि देश के जैसे 'स्मार्ट और हाइटेक' शहरों की सांसें फूल रही हैं। दिल्ली से सटे साइबर सिटी गुरुग्राम में मूसलाधार बारिश ने इस कदर आफत मचाई कि सड़कें समंदर बन गईं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने कर्मचारियों के लिए आनन-फानन में 'वर्क फ्रॉम होम' का फरमान जारी करना पड़ा। राजधानी दिल्ली की गलियों की भी भयावह तस्वीरें सामने आईं हैं, जिसने वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर की पोल खोलकर रख दी है।

हालांकि, यह कोई नई कहानी नहीं है। पिछले कई वर्षों से हर मानसून के साथ देश के बड़े और आधुनिक शहरों की यही तस्वीर सामने आती रही है। पटना (2019), बेंगलुरु (2024), दिल्ली (2023), मुंबई (2020) और चेन्नई (2015) में भी भारी बारिश के बाद सड़कें तालाब में बदल गई थीं, यातायात ठप हो गया था और सामान्य जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ था।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए स्मार्ट और हाइटेक शहर कुछ घंटों की बारिश भी क्यों नहीं झेल पाते? बारिश होते ही वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर क्यों चरमरा जाता है? और आखिर ऐसी कौन-सी खामियां हैं, जिनकी वजह से हर साल हमारे 'स्मार्ट सिटी' कुछ ही घंटों में 'वाटर सिटी' बन जाते हैं? आइए, इस कंक्रीट के जाल के पीछे छिपे असली सच और सिस्टम की नाकामी को गहराई से समझते हैं।

अर्बन प्लानिंग के 'भीष्म पितामह' क्या कहते हैं?

हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (HUDCO) के पूर्व सीएमडी और देश के जाने-माने अर्बन प्लानर डॉ. पी. एस. राणा ने टाइम्स नाउ नवभारत से बातचीत में बताया कि हमारी सबसे बड़ी भूल नेचुरल ड्रेनेज के साथ छेड़छाड़ है। शहरों में जो कुदरती बहाव (Natural Drainage Line) थे, हमने उन पर कंक्रीट की इमारतें खड़ी कर दीं। जब पानी का स्वाभाविक रास्ता ब्लॉक होगा, तो फ्लडिंग होना तय है।

इसके साथ ही सड़कों के साथ ड्रेनेज का अभाव है। सही तरीका यह है कि सड़क निर्माण के साथ ही उसके समानांतर प्रॉपर ड्रेनेज डिजाइन हो। लेकिन हमारे यहां ड्रेनेज अक्सर 'आफ्टरथॉट' (बाद की सोच) होता है। हाइटेक शहरों में फ्लडिंग की समस्या सिर्फ प्लानिंग में नहीं है, एक्जीक्यूशन और मेंटेनेंस का स्तर भी बेहद खराब है। जब समस्या बढ़ती है, तो हम सिर्फ 'रीपेयर' (मरम्मत) करते हैं, 'बेस्ट मैनेजमेंट प्रैक्टिस' लागू नहीं करते।

गुरुग्राम के मुकाबले नोएडा में स्थिति क्यों बेहतर?

डॉ. राणा भारत के दो सबसे बड़े हाइटेक शहर नोएडा और गुरुग्राम के अर्बन मॉडल में बुनियादी अंतर को इस तरह समझाते हैं—

नोएडा

  • विकास सरकारी एजेंसी के जरिए हुआ।
  • पहले सड़क, ड्रेनेज और बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया।
  • उसके बाद सेक्टर और इमारतें विकसित हुईं।
  • इसलिए कई इलाकों में ड्रेनेज नेटवर्क अपेक्षाकृत बेहतर है।

गुरुग्राम

  • विकास का बड़ा हिस्सा निजी डेवलपर्स ने किया।
  • अलग-अलग परियोजनाएं बिना समग्र (Integrated) मास्टर प्लान के विकसित हुईं।
  • कई जगह सड़क, सीवर और ड्रेनेज नेटवर्क बाद में जोड़े गए।
  • अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी रही।

इसी वजह से गुरुग्राम में थोड़ी तेज बारिश भी बड़े ट्रैफिक जाम और जलभराव का कारण बन जाती है।

दुनिया के बड़े शहरों की क्या है प्लानिंग?

भारत में मानसूनी बारिश पर जलभराव आम है। क्या यही हालात दुनिया के अन्य शहरों में है। जवाब है नहीं! दुनिया के शहरों में मानूसनी बारिश से निपटने के लिए बेहतर व्यवस्था है।

जापान का टोक्यो शहर में द अंडरग्राउंड श्राइन (G-Cans Project) का इस्तेमाल किया है। इसके तहत टोक्यो ने जमीन से 50 मीटर नीचे 2 अरब डॉलर की लागत से विशालकाय अंडरग्राउंड डिस्चार्ज चैनल और वाटर टैंक (G-Cans) बनाए हैं। यह भारी बारिश के दौरान नदियों और सड़कों के ओवरफ्लो पानी को इन विशालकाय टनल में मोड़ दिया जाता है और 78 टर्बाइन पंपों के जरिए इसे सुरक्षित रूप से बाहर फेंक दिया जाता है।

सिंगापुर में बारिश भारत के कई शहरों से अधिक होती है। इसके बावजूद वहां बड़े स्तर पर जलभराव कम देखने को मिलता है। सिंगापुर में कंक्रीट के गंदे नालों को हरा-भरा बनाकर 'नेचुरल फ्लडप्लेन' में बदल दिया गया है। शहर की सड़कें, पार्क और इमारतें एक स्पॉन्ज की तरह काम करती हैं जो पानी को सोखती हैं और उसे 17 विशालकाय रिजरवायर में स्टोर कर लेती हैं।

नीदरलैंड्स का एम्स्टर्डम शहर में लिविंग विद वाटर तकनीक का इस्तेमाल किया है। इसमें पानी को रोकने के बजाय उसे शहर में जगह देने की नीति है। इसके तहत छतों पर 'ग्रीन रूफ्स', वाटर प्लाजा और पार्किंग लॉट ऐसे बनाए गए हैं जो बारिश के वक्त पानी को अस्थायी रूप से होल्ड करते हैं ताकि ड्रेनेज पाइप्स पर अचानक दबाव न पड़े।

डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन ने भारी बारिश के लिए अलग मास्टर प्लान बनाया है। सड़कें, पार्क और सार्वजनिक स्थान इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि जरूरत पड़ने पर वे अस्थायी जल निकासी मार्ग बन जाएं।

भारतीय शहर कहां पिछड़ रहे हैं?

राणा कहते हैं कि भारतीय शहरों में इंटीग्रेटेड प्लानिंग का अभाव है। हमारे यहां सड़क PWD बनाती है, ड्रेनेज नगर निगम देखता है, और हाउसिंग डेवलपमेंट अथॉरिटी करती है। एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी के कारण ड्रेनेज नेटवर्क बीच में ही टूट जाता है। शहरों को सुंदर दिखाने के चक्कर में कंक्रीट का अत्यधिक प्रयोग हो रहा है। मिट्टी की जगह पेवर ब्लॉक्स और डामर ने ले ली है। वाटर रीचार्ज का कोई रास्ता नहीं बचा है, जिससे 100% बारिश का पानी सड़कों पर ही बहता है। यानी मानूसनी बारिश होती ही सड़क तुरंत नदी बन जाते हैं।

शहरों में हर साल जलभराव क्यों?

शहरों में हर साल जलभराव क्यों?

शहरों को डूबने से कैसे बचाए जाए?

देश के कई अर्बन प्लानर का मनना है कि भारत में जिस तेजी से शहरीकरण हो रहा है, उस स्थिति में अब सिर्फ नाले साफ करने से बात नहीं बनेगी अगर शहरों को जलप्रलय से बचाना है, तो तीन स्तरों पर काम करना होगा।

प्लानिंग स्तर पर बदलाव करना होगा: पूरे मेट्रोपोलिटन एरिया के लिए 'मास्टर ड्रेनेज प्लान' बनना होगा। नेचुरल ड्रेनेज से अतिक्रमण को हटाना होगा।

एक्जीक्यूशन स्तर पर सुधार की जरूरत: सड़कों के निर्माण के साथ ही ड्रेनेज बनाना अनिवार्य करना होगा।

मेंटेनेंस को बढ़ावा दें: पारंपरिक नालों के स्थान पर 'स्पॉन्ज सिटी' इंफ्रास्ट्रक्चर (वाटर होल्डिंग पॉन्ड्स, परमीएबल कंक्रीट और ग्रीन बेल्ट) को बढ़ावा देना होगा।

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