चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग तीन दिवसीय द्विपक्षीय वर्ता के लिए अमेरिका पहुंच चुके हैं। एयरपोर्ट पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप ने खुद उनका स्वागत किया। अमेरिकी प्रोटोकॉल के लिहाज से इसे एक दुर्लभ और खास जेस्चर माना जा रहा है। शी की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ट्रेड वॉर, टैरिफ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर आमने-सामने हैं।
2025 में सत्ता में लौटने के बाद ट्रंप प्रशासन ने चीनी सामानों पर टैरिफ बढ़ाए और चीन को उन्नत AI चिप्स की बिक्री पर प्रतिबंध लगाए हैं। इसका असर यह हुआ है कि अमेरिका-चीन के बीच टकरार बढ़ा है और ट्रेड में गिरावट आई है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि ट्रंप और Xi की मुलाकात से क्या ट्रेड वॉर खत्म होगा? अगर अमेरिका और चीन में मतभेद कम होता है, तो भारत के लिए इसका क्या मायने होगा?
अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर कब शुरू हुआ?
अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तनाव नया नहीं है। ट्रंप के पहले कार्यकाल में 2018 से टैरिफ युद्ध शुरू हुआ था। इसके बाद दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत और समझौते हुए, लेकिन टैरिफ और तकनीकी प्रतिबंध पूरी तरह खत्म नहीं हुए। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में यह टकराव और व्यापक हुआ। अमेरिका ने चीन से आने वाले सामान पर टैरिफ बढ़ाने के साथ-साथ कुछ रणनीतिक तकनीकों और उन्नत सेमीकंडक्टर तक चीन की पहुंच को सीमित किया। चीन ने भी अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी कार्रवाई की और कुछ महत्वपूर्ण खनिजों, खासकर Rare Earths, के निर्यात पर नियंत्रण को अपने रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।
US-चीन ट्रेड वॉर की अभी क्या स्थिति?
एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जुलाई 2026 तक, US में चीनी सामान पर 36.5 प्रतिशत की टैरिफ दर लागू थी, जबकि चीन में आने वाले US सामान पर 31 प्रतिशत टैक्स लगता था। ये टैरिफ दरें औसत हैं, किसी खास प्रोडक्ट के लिए नहीं। यह दर हर प्रोडक्ट के हिसाब से काफी अलग-अलग होती है। उदाहरण के लिए, जून 2026 में चीनी तांबे और उससे बने सामान पर 73.6 प्रतिशत की प्रभावी दर लागू थी, जबकि एल्युमीनियम और उससे बने सामान पर 65.2 प्रतिशत, लोहे और स्टील के सामान पर लगभग 50 से 58 प्रतिशत और गाड़ियों व ऑटो पार्ट्स पर 44.4 प्रतिशत दर लागू थी। ये आंकड़े खास प्रोडक्ट्स पर लागू होने वाले अलग-अलग टैरिफ लेवल को दिखाते हैं।
इस बीच, चीन अपने सामान्य टैरिफ और खास उत्पादों पर लगने वाले शुल्क के अलावा, अमेरिका से होने वाले आयात पर 10 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ भी लगाता है। उदाहरण के लिए, अमेरिकी कच्चे तेल पर 20 प्रतिशत, LNG पर 25 प्रतिशत, सोयाबीन पर 13 प्रतिशत और अमेरिकी बीफ पर 77 प्रतिशत तक शुल्क लग सकता है।
अमेरिका-चीन के रिश्ते अभी कैसे?
वैसे तो अमेरिका लंबे समय से चीन को अपना प्रथम प्रतिद्वंदी मान रहा है लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद दोनों देशों के रिश्ते और बिगड़ गए हैं। अप्रैल 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने चीनी सामान पर 145% टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। इसके जवाब में बीजिंग ने अमेरिकी इंपोर्ट पर 125% शुल्क लगाई और साथ ही रेयर-अर्थ एक्सपोर्ट पर भी रोक लगा दी। हालांकि, साउथ कोरिया में बातचीत के बाद दोनों प्रतिद्वंद्वियों के बीच टैरिफ को लेकर एक समझौता हुआ, जिसकी मियाद 10 नवंबर को खत्म होने वाली है।
हालांकि, इस समझौते के बावजूद वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच ट्रेड पर रोक लगाने का सिलसिला जारी रहा। पिछले महीने, अमेरिका ने चीन में बने ह्यूमनॉइड रोबोट के इंपोर्ट पर रोक लगा दी, ईरानी फ्यूल की कथित हैंडलिंग को लेकर चीनी शिपिंग ऑपरेटरों पर प्रतिबंध लगाए, और अन्य सेक्टरों पर भी पाबंदियां लगाईं, जिसमें चीनी AI कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी भी शामिल थी।
क्या ट्रेड वॉर सिर्फ टैरिफ तक ही सीमित?
जानकारों का कहना है- नहीं, टैरिफ तो अमेरिका और चीन के बीच व्यापक आर्थिक और तकनीकी प्रतिद्वंद्विता का सिर्फ एक पहलू है। इस व्यापारिक टकराव में प्रतिबंध, एंटिटी लिस्ट, निवेश पर रोक और रिसर्च पर पाबंदियां भी शामिल हैं, साथ ही सप्लाई चेन को आर्थिक दबाव बनाने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना भी इसमें आता है।
चीन की ताकत रेयर अर्थ मेटल्स (Rare Earth Metals) है। चीन ने रेयर अर्थ मेटल्स के निर्यात पर रोक लगा दी है - जो सेमीकंडक्टर बनाने और AI के लिए बहुत जरूरी हैं। रेयर अर्थ मेटल्स के क्षेत्र में बीजिंग का दुनिया भर की प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग क्षमता के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण है, और इस दबदबे की वजह से ये पाबंदियां इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहनों और रक्षा उपकरणों के लिए बहुत अहम हो जाती हैं। वहीं, वॉशिंगटन की मुख्य ताकत एडवांस्ड टेक्नोलॉजी है। अमेरिका चीन को एडवांस्ड सेमीकंडक्टर और चिप बनाने वाले उपकरणों तक पहुंच से रोकता है।
ट्रेड वॉर का क्या हुआ अबतक असर?
अमेरिका के सेंसस ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका और चीन के बीच आपसी व्यापार में 29 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह 2024 में 584 अरब डॉलर से घटकर 2025 में 415 अरब डॉलर हो गया है। जनवरी-जुलाई में दोनों देशों के बीच व्यापार 222 अरब डॉलर रहा, जो 2025 की इसी अवधि की तुलना में 14.5 प्रतिशत और जनवरी-जुलाई 2024 की तुलना में 31 प्रतिशत कम है।
क्या ट्रेड वॉर से चीन को नुकसान हुआ?
अमेरिका-चीन के बीच ट्रेड वॉर से चीन को नुकसान हुआ है, लेकिन चीन ने अपने एक्सपोर्ट को दूसरे बाजारों की तरफ मोड़ दिया है, क्योंकि बीजिंग ने दुनिया भर के देशों के खिलाफ ट्रंप की टैरिफ वॉर का फायदा उठा रहा है। चीन के नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के अनुसार, 2025 में चीन का कुल सामान का एक्सपोर्ट 6.1 प्रतिशत बढ़कर लगभग 3.77 खरब डॉलर हो गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल की पहली छमाही में चीन का एक्सपोर्ट 13.4 प्रतिशत बढ़ा, जो लगातार 11वीं तिमाही की बढ़त थी।
चीन एशियाई, यूरोपीय, अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों को ज्यादा सामान बेच रहा है क्योंकि वह इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य हाई-टेक सामानों के मामले में वैल्यू चेन में ऊपर बढ़ रहा है।
क्या अमेरिका का व्यापार घाटा कम हुआ है?
नहीं। हालांकि ट्रंप की टैरिफ नीति का मुख्य मकसद वॉशिंगटन के व्यापार घाटे को कम करना था, लेकिन सामान और सेवाओं के व्यापार का घाटा जस का तस बना हुआ है। अमेरिकी सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से पहले, 2024 में सामान का व्यापार घाटा 1.201 खरब डॉलर था। असल में, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले साल यानी 2025 में यह बढ़कर 1.235 खरब हो गया।
Trump-Xi मुलाकात में क्या दांव पर है?
1. टैरिफ संधि: मौजूदा समझौता नवंबर में खत्म होने वाला है। बाजार यह देख रहा है कि क्या दोनों देश इसे आगे बढ़ाते हैं।
2. अमेरिकी कृषि और विमान खरीद: अमेरिका चाहता है कि चीन अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाए। Boeing विमानों की संभावित खरीद भी बातचीत का हिस्सा है।
3. रेयल अर्थ मेटल्स: अमेरिका चीन से रेयल अर्थ मेटल्स् की आपूर्ति बनाए रखना चाहत है, जबकि चीन अमेरिकी advanced technology restrictions में राहत चाहता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मुलाकात?
भारत पहले ही अमेरिका और चीन दोनों के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार करता है। भारत के लिए अमेरिका सबसे बड़ा निर्यातक देश है। वहीं, दूसरी तरफ चीन भारत के लिए सबसे बड़ा आयातक बना हुआ है। इसका सीधा मतलब है कि भारत एक साथ दोनों देशों से जुड़ा हुआ है। अगर Trump-Xi बातचीत से टैरिफ तनाव कम होता है और दोनों देश व्यापार बढ़ाते हैं, तो कुछ क्षेत्रों में भारत के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। लेकिन दूसरी तरफ स्थिर वैश्विक व्यापार बेहतर होने से भारतीय कंपनियों को भी फायदा हो सकता है। इससे ग्लोबल सप्लाई चेन में अनिश्चितता कम होगी और कंपनियों के लिए बाजार में पहुंच आसान होगी।
अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर
भारत को क्या देखना चाहिए?
Trump-Xi बैठक का भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेत सिर्फ यह नहीं होगा कि दोनों नेता टैरिफ घटाते हैं या नहीं। ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि वे सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी और रणनीतिक कच्चे माल पर किस तरह की व्यवस्था बनाते हैं।
भारत के लिए क्या हैं अवसर और चुनौतियां?
अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर ने भारत के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। वैश्विक कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करने के लिए ‘China + 1’ रणनीति अपना रही हैं, जिससे भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, ऑटो पार्ट्स और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिल सकता है। Apple समेत कई बड़ी कंपनियों के सप्लायर्स ने भारत में उत्पादन बढ़ाया है। PLI जैसी सरकारी योजनाओं ने भी निवेश आकर्षित करने में मदद की है। हालांकि, इसके साथ कुछ जोखिम भी हैं। अगर अमेरिका चीन पर और शुल्क लगाता है, तो चीन अपने अतिरिक्त सामान को भारत जैसे बड़े बाजारों में बेचने की कोशिश कर सकता है। इससे भारतीय MSMEs पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, अगर अमेरिका-चीन के बीच बड़ा व्यापार समझौता होता है, तो ‘China + 1’ से भारत को मिलने वाला फायदा कुछ धीमा पड़ सकता है। ऐसे में भारत को लॉजिस्टिक्स, बंदरगाह, एंटी-डंपिंग व्यवस्था और जरूरी खनिजों की घरेलू क्षमता मजबूत करनी होगी।
