Digital Fraud : देश में लगातार बढ़ रहे साइबर अपराध और 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी वारदातों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सुनवाई के दौरान कहा है कि अगर किसी बैंक या वित्तीय संस्थान की उचित जांच-पड़ताल और लापरवाही के कारण कोई ग्राहक ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार होता है, तो बैंक को पीड़ित को उसकी गंवाई गई पूरी रकम के बराबर मुआवजा देना चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही तय करने और धोखाधड़ी रोकने के लिए बेहद कड़े नियम बनाए जाने की जरुरत है।
डिजिटल धोखाधड़ी पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: बैंक की लापरवाही पर पीड़ितों को मिले पूरा मुआवजा
साइबर अपराधों के आंकड़े और आरबीआई की नई गाइडलाइंस
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि हालांकि साइबर अपराध के मामलों में 50 प्रतिशत की कमी आई है, फिर भी इस साल अब तक लोगों को करीब 800 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ा है। अदालत ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के प्रस्तावित नियामकीय ढांचे का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें मुआवजे, धोखाधड़ी की रोकथाम और बैंकों की जवाबदेही के स्पष्ट प्रावधान होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट आरबीआई के प्रस्तावित 'अपने ग्राहक को जानें' (केवाईसी) संशोधन निर्देश, 2026 की पहले समीक्षा करेगा। इन नए निर्देशों को 30 नवंबर तक अधिसूचित करने और 31 दिसंबर तक लागू करने का प्रस्ताव रखा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों में यह अनिवार्य होना चाहिए कि यदि बैंक की किसी चूक से धोखाधड़ी हुई है, तो ग्राहक को पूरा मुआवजा मिले।
बैंकों की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल और एआई का सुझाव
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक चीफ जस्टिस ने साफ शब्दों में कहा कि जब तक बैंकों के खिलाफ कड़े दंडात्मक प्रावधान नहीं किए जाएंगे, तब तक वे अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं करेंगे। उन्होंने सवाल उठाया कि बैंक खातों को उनकी प्रकृति और लेनदेन के तरीके के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में क्यों नहीं बांटा जा सकता। अदालत ने बैंकों से यह भी पूछा कि वे संदिग्ध गतिविधियों की तुरंत पहचान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तकनीक का इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि बैंकों के पास खाताधारकों के लेनदेन का पूरा इतिहास होता है। अगर कोई व्यक्ति, जो हमेशा छोटे-छोटे लेनदेन करता है, अचानक बहुत बड़ी रकम भेजने की कोशिश करे, तो बैंक को तुरंत बीच में आकर उस ट्रांजैक्शन को रोकना चाहिए।
संदिग्ध लेनदेन रोकने और पुलिस को सूचना देने की व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि बैंकों को ऐसी तकनीकी व्यवस्था तैयार करनी चाहिए जो सामान्य से अलग होने वाले असामान्य लेनदेन को कुछ समय के लिए रोक सके। इसके साथ ही संदिग्ध गतिविधियों की स्वचालित (ऑटोमैटिक) सूचना मिलने पर बैंक को तुरंत खाताधारक से संपर्क करके लेनदेन की पुष्टि करनी चाहिए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि 'डिजिटल अरेस्ट' के संभावित शिकार ग्राहकों के खातों में यदि कोई संदिग्ध और बड़ी रकम आती या जाती है, तो इसकी सूचना नजदीकी पुलिस थानों को स्वतः दी जानी चाहिए। इससे पुलिस समय रहते पीड़ित से संपर्क कर सकेगी। चीफ जस्टिस ने कहा कि पैसा कट जाने के बाद केवल जांच करना काफी नहीं है, असली प्राथमिकता इस तरह के अपराधों को पहले ही रोकने की होनी चाहिए।
कर्मचारियों की जवाबदेही और व्हाट्सएप की कार्रवाई
अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने अदालत को जानकारी दी कि आरबीआई बैंकिंग संस्थानों और उनके कर्मचारियों की जवाबदेही के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रहा है, जिसमें धोखाधड़ी में कर्मचारियों की मिलीभगत मिलने पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी और आपराधिक कार्रवाई भी शामिल है। इस पर चीफ जस्टिस ने चेतावनी दी कि अगर नियमों में जवाबदेही का पुख्ता प्रावधान नहीं किया गया, तो अदालत खुद न्यायिक आदेश के जरिए इसे लागू करेगी। इस बीच, सुनवाई के दौरान त्वरित संदेश मंच व्हाट्सएप के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बताया कि कंपनी ने अब तक 9,400 संदिग्ध खातों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। उन्होंने कहा कि व्हाट्सएप ऐसे संदिग्ध खातों की पहचान करने और उपयोगकर्ताओं को पहले ही सतर्क करने के लिए नए सॉफ्टवेयर विकसित कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट फर्जी दस्तावेजों और डिजिटल अरेस्ट के पीड़ितों से जुड़े इस मामले पर स्वतः संज्ञान लेकर आगे की सुनवाई कर रहा है।
