अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध ने कच्चे तेल की कीमत में रिकॉर्ड तेजी लाने का काम किया है। इसका असर भारतीय शेयर बाजार पर हुआ है। भारतीय शेयर बाजार में बड़ी बिकवाली जारी है, जिसके चलते मार्केट करीब 11 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया है। भारतीय बाजार में गिरावट लाने में विदेशी निवेशकों की अहम भूमिका है। विदेशी निवेशक तेजी से अपना पैसा भारत से बाहर लेकर जा रहे हैं। एक्सचेंज के डेटा के अनुसार, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने मार्च के पहले पखवाड़े में घरेलू शेयर बाजार से 52,704 करोड़ रुपये (लगभग 5.73 अरब डॉलर) निकाले हैं। मार्केट एक्सपर्ट का कहना है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, रुपये की कीमत में गिरावट और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का भारत की वृद्धि और कंपनियों की कमाई पर असर पड़ने की आशंका से विदेशी निवेशकों ने भारी बिकवाली की है। अगर ईरान संकट का हल जल्द नहीं निकेला तो यह बिकवाली जारी रह सकती है। यानी भारतीय बाजार में और गिरावट देखने को मिल सकती है।
शेयर बाजार कहां तक टूटेगा?
फरवरी में जमकर डाले थे पैसे
बता दें कि इससे पहले फरवरी में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 22,615 करोड़ रुपये डाले थे, जो 17 माह का सबसे ज्यादा प्रवाह था। डिपॉजिटरी के आंकड़ों के अनुसार, इससे पहले एफपीआई लगातार तीन माह तक शुद्ध बिकवाल रहे थे। जनवरी में उन्होंने 35,962 करोड़ रुपये, दिसंबर में 22,611 करोड़ रुपये और नवंबर में 3,765 करोड़ रुपये निकाले थे। मार्च में अब तक (13 मार्च तक) एफपीआई ने लगभग 52,704 करोड़ की निकासी की है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि एफपीआई की निकासी की मुख्य वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है।
कच्चा तेल उछलने और रुपया टूटने से सेंटीमेंट खराब हुआ
एंजल वन के वरिष्ठ बुनियादी विश्लेषक वकारजावेद खान ने कहा कि इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में लंबे समय तक संघर्ष की आशंकाओं ने ब्रेंट कच्चे तेल को 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया है। इसके अलावा रुपया 92 प्रति डॉलर के स्तर के आसपास कमजोर बना हुआ है। बॉन्ड प्रतिफल बढ़ने के बीच एफपीआई अब बिकवाली कर रहे हैं। इसी तरह की राय जताते हुए जियोजीत इन्वेस्टमेंट्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार वी के विजयकुमार ने कहा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के बाद वैश्विक शेयर बाजारों में गिरावट, रुपये की कमजोरी और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से भारत की वृद्धि और कॉरपोरेट की कमाई पर असर पड़ने की चिंताओं ने एफपीआई की धारणा को प्रभावित किया है।
उन्होंने कहा कि पिछले 18 माह में विकसित और उभरते बाजारों की तुलना में भारत से कमजोर रिटर्न की वजह से भी एफपीआई की दिलचस्पी कम हुई है। उन्होंने कहा कि दक्षिण कोरिया, ताइवान और चीन को अभी ज्यादा आकर्षक बाजार के रूप में देखा जा रहा है।
