SEBI IPO Study : अक्सर निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे IPO में निवेश लॉन्ग टर्म वेल्थ क्रिएशन के माइंडसेट से करें। इसके अलावा किसी भी IPO में Anchor Investors की एंट्री को अक्सर बड़े और भरोसेमंद संस्थागत निवेशकों के समर्थन के तौर पर देखा जाता है। लेकिन, SEBI की नई स्टडी ने इनके निवेश को लेकर एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखी है। सेबी की स्टडी के मुताबिक, मेनबोर्ड IPO में एंकर इन्वेस्टर्स ने अपनी कुल आवंटित हिस्सेदारी का करीब आधा हिस्सा एक साल के भीतर बेच दिया। सबसे ज्यादा बिकवाली फॉरेन पोर्टफोलियाे इन्वेस्टर्स यानी FPI की रही। उन्होंने एक साल में अपनी करीब 60% एंकर होल्डिंग को बेच दिया।
सेबी की स्टडी में सामने आया हैरान करने वाला डेटा
किसने किया अध्ययन?
SEBI के इकोनॉमिक और पॉलिसी एनालिसिस डिपार्टमेंट के अधिकारियों की इस स्टडी में अप्रैल 2022 से अक्टूबर 2025 के बीच लिस्ट हुए 242 मेनबोर्ड IPOs का विश्लेषण किया गया। इसमें एंकर इन्वेस्टर्स की होल्डिंग और शेयरों की कीमत को अलग-अलग समय पर देखा गया।
एक साल में बिक गई आधी होल्डिंग
SEBI के अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि एंकर इन्वेस्टर लॉक इन खत्म होते ही हिस्सेदारी बेचना शुरू कर देते हैं और T+30 यानी लॉक इन खत्म होने के एक महीने के भीतर एंकर इन्वेस्टर करीब 3.5% हिस्सेदारी बेच देते हैं। इसके बाद T+60 तक यह बिकवाली 9.3% और T+90 तक 18.5% हो जाता है। इसके बाद बिकवाली और तेज हुई और T+180 तक करीब 34.4% तथा T+365 तक 50.7% तक एंकर होल्डिंग बिक चुकी थी। यानी IPO में एंकर इन्वेस्टर का नाम लॉन्गटर्म भरोसे से जुड़ा जरूर है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि एक साल के भीतर उनकी करीब आधी हिस्सेदारी बाजार में आ जाती है।
FPI सबसे बड़े Seller क्यों?
अध्ययन में यह भी सामने आया कि एंकर अलॉटमेंट में FPI की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 43.8% रही। इसके बाद म्यूचुअल फंड 38.5% के साथ दूसरे स्थान पर रहे। लेकिन बिकवाली के मामले में FPI ने सबको पीछे छोड़ दिया। एक साल के भीतर FPI अपनी करीब 60% होल्डिंग को बेचा, जबकि इस दौरान Mutual Funds ने करीब 38% हिस्सेदारी को बेचा। इसके अलावा कॉरपोरेट ने करीब 58%, AIFs ने 55% और अन्य QIBs ने करीब 46% हिस्सेदारी बेची। रकम के हिसाब से भी FPI सबसे बड़े सेलर रहे। उन्होंने करीब ₹22,474 करोड़ की एंकर होल्डिंग बेच दी, जबकि उनका कुल निवेश ₹37,491 करोड़ था।
छोटे IPO में ज्यादा बिकवाली
SEBI की स्टडी में IPO के आकार और एंकर सेलिंग में भी बड़ा अंतर दिखाई दिया। ₹0–250 करोड़ के छोटे IPOs में एक साल के भीतर करीब 72.5% एंकर होल्डिंंगबिक गई। इसके मुकाबले ₹1,001–2,500 करोड़ के IPOs में एक साल तक यह बिकवाली करीब 40.8% रही। यानी छोटे IPOs में एंकर इन्वेस्टर तेजी से अपनी हिस्सेदारी कम करते दिखे। यह निवेशकों के लिए इसलिए अहम है, क्योंकि छोटे IPO में एंकर सेलिंग से बाजार में उपलब्ध शेयरों की सप्लाई ज्यादा असर पड़ सकता है।
ताबड़तोड़ बिकवाली से शेयर पर दबाव
SEBI की स्टडी ने एंकर सेलिंग और शेयर की कीमत के बीच संबंध का भी संकेत दिया है। जिन IPOs में 10% से ज्यादा एंकर होल्डिंग बेची गई, उनमें T+29 से T+33 के बीच शेयर की औसत कीमत करीब 3.5% गिरी। इस कैटेगरी में Median Price Decline करीब 6% रहा। वहीं, जिन IPOs में एंकर बिकवाली 2.5% तक सीमित रहा, वहां औसत गिरावट सिर्फ करीब 0.4% थी।
क्या खत्म हो रहा है लॉन्गटर्म का ट्रेंड?
SEBI के अध्ययन में यह नहीं कहा गया है कि लॉन्ग टर्म का ट्रेंड खत्म हो रहा है। लेकिन, एंकर इन्वेस्टर्स के आंकड़े बताते हैं कि खासतौर पर PFI ने भारतीय बाजार में लॉन्गटर्म निवेश का रुख छोड़ दिया है।
