स्क्रैप पर GST दर कम करने से बनेगी बात, 2035 तक बड़े राजस्व नुकसान का अनुमान; क्या कहते हैं एक्सपर्ट

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ (CSE) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस ऊंची कर दर के कारण कबाड़ खरीदने-बेचने वाले छोटे कारोबारी टैक्स देने से बचते हैं और नकद लेन-देन को तरजीह देते हैं। लिहाजा, लीगल पेशेवर कारोबारी खुद को ग्रे मार्केट में कमजोर पाते हैं।

भारत में ठोस कचरा प्रबंधन यानी रिसाइक्लिंग की स्थिति डांवाडोल है। इसमें हाई जीएसटी दर लगने से पर्यावरण के अनुकूल रिसाइक्लिंग प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है, इससे सरकार के साथ व्यापारियों को भी नुकसान सहना पड़ रहा है। एक ओर यह क्षेत्र देश की ग्रीन इकॉनामी की रीढ़ बनने की क्षमता रखता है, जो लैंडफिल अपशिष्ट को कम कर सकता है और कच्चे माल उत्पादन से होने वाले उत्सर्जन में कटौती कर सकता है। लेकिन दूसरी ओर, मौजूदा वस्तु एवं सेवा कर (GST) स्ट्रक्चर इस क्षेत्र के लिए राहत की जगह एक 'ब्लैक होल' बन गया है। "इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर" को देखें तो PET स्क्रैप पर GST 18% है, जबकि रीसाइकिल्ड PET फाइबर पर केवल 5% है। यह विसंगति रीसाइक्लर्स को मजबूर करती है कि वे अपने इनपुट पर अधिक टैक्स का भुगतान करें, जबकि उनके आउटपुट पर कर वसूली कम हो। परिणामस्वरूप, उनकी वर्किंग कैपिटल अदावी Input Tax Credit (ITC) के रूप में फंस जाती है। विशेषकर MSMEs के लिए यह गंभीर कैश-फ्लो संकट पैदा करता है। धीमी रिफंड प्रक्रिया इस समस्या को और बढ़ा देती है, जो वर्किंग कैपिटल की रिलीज में देरी करती है और औपचारिक रिसाइक्लिंग वैल्यू चेन में पार्टिसिपेशन को हतोत्साहित करती है।

GST

GST cut fuels festive shopping spree.

क्या है स्क्रैप कारोबारियों की चिंता

एक रीसाइक्लर ने कहा कि हम GST कानूनों का अनुपालन करते हैं, लेकिन Input Tax Credit की गारंटी कौन दे सकता है? हम स्क्रैप खरीदते समय करों सहित कीमत चुकाते हैं और महीनों बाद हमें GST विभाग से नोटिस मिलता है कि जिससे हमने स्क्रैप खरीदा वह फर्जी था और ITC को ब्याज और जुर्माने के साथ वापस करना होगा।

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