भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा रेपो रेट तय करना लोन लेने वाले आम लोगों के लिए भी बेहद मायने रखता है। जब RBI रेपो रेट बदलता है तो इसका सीधा असर लोन लेने वाले ग्राहकों की ईएमआई (EMI) पर पड़ता है। फिलहाल रिजर्व बैंक की ओर से रेपो रेट में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं किया गया है। RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने रेपो रेट को 5.25% पर अपरिवर्तित रखा है और अपनी नीति का रुख ‘न्यूट्रल’ बनाए रखने का निर्णय लिया है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली समिति ने तीन दिवसीय बैठक के बाद यह निर्णय लिया। रेपो रेट के बढ़ने या घटने का लोन की ईएमआई पर क्या असर पड़ता है, आइए समझते हैं।
रेपो रेट क्या है
सबसे पहले तो यही समझें कि रेपो रेट क्या होती है। रेपो रेट ब्याज की वह दर होती है, जिस पर केंद्रीय बैंक कमर्शियल बैंक को उधार देता है। दरअसल, फंड की कमी होने पर कर्मशियल बैंक को आरबीआई के पास जाने की जरूरत होती है, जिसके लिए आरबीआई की ओर से बैंक से ब्याज भी लिया जाता है। ब्याज की इसी दर को रेपो रेट कहा जाता है।
RBI Repo rate
रेपो रेट का EMI से कनेक्शन
बैंक अपने ग्राहकों के लिए रेपो रेट के आधार पर ही लेडिंग रेट तय करते हैं, जिस पर ग्राहकों को होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन दिया जाता है। ऐसे में आरबीआई की ओर से जब रेपो रेट को घटाया जाता है तो बैंक कम लागत पर RBI से पैसा उधार लेते हैं। इससे बैंक आम ग्राहकों को दिए जाने वाले लोन को लेकर ब्याज दरों को कम करने के लिए भी प्रेरित होते हैं। अगर आपका लोन फ्लोटिंग रेट या रेपो-लिंक्ड है तो बैंक ब्याज दर को कम कर देते हैं, जिसके साथ ही आपकी लोन ईएमआई या तो कम हो सकती है या बिना ईएमआई में बदलाव के लोन की अवधि घट सकती है। वहीं, जब रेपो रेट ज्यादा होता है तो बैंकों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है और इसका बोझ वे ग्राहकों पर डाल देते हैं, जिससे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन जैसे कर्ज पर ब्याज दरें बढ़ जाती हैं।
RBI Repo rate
इसके अलावा, रेपो रेट बदलने का असर बचत और निवेश पर रिटर्न को लेकर भी पड़ता है। रेपो रेट बढ़ता है तो बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट और दूसरी बचत योजनाओं पर ज्यादा ब्याज देते हैं, ताकि जमाएं आकर्षित की जा सकें। इसके उलट, जब रेपो रेट कम होता है तो इन बचत साधनों पर मिलने वाला ब्याज भी घट सकता है।
RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने रेपो रेट में किसी तरह कोई बदलाव नहीं किया यानी ग्राहकों को उनकी ईएमआई को लेकर फिलहाल कोई राहत नहीं मिलेगी।
रेपो रेट को क्यों बढ़ाया-घटाया जाता है
रेपो रेट इकोनॉमिक फ्रेमवर्क में बेहद अहम भूमिका निभाता है। यह एक ऐसा टूल है, जिसका इस्तेमाल केंद्रीय बैंक कई बड़े आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए करता है-
महंगाई पर नियंत्रण
रेपो रेट का सबसे प्रमुख उद्देश्य महंगाई को काबू में रखना होता है। जब महंगाई ज्यादा होती है तो केंद्रीय बैंक रेपो रेट बढ़ा सकता है। इससे कर्ज लेना महंगा हो जाता है, अर्थव्यवस्था में पैसों की उपलब्धता कम होती है और इससे महंगाई को कम करने में मदद मिलती है।
आर्थिक विकास को बढ़ावा
इसके उलट, जब आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी होती है तो केंद्रीय बैंक रेपो रेट घटा सकता है। इससे कर्ज सस्ता हो जाता है और कारोबारियों व उपभोक्ताओं को लोन लेने के लिए प्रोत्साहन मिलता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है।
लिक्विडिटी मैनेजमेंट
रेपो रेट बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी को नियंत्रित करने में भी अहम भूमिका निभाता है। इस दर में बदलाव कर केंद्रीय बैंक यह तय करता है कि बैंक कितनी आसानी से पैसा उधार ले सकते हैं, जिससे वित्तीय व्यवस्था स्थिर और मजबूत बनी रहती है।
रेपो रेट की गणना
रेपो रेट की गणना कई आर्थिक कारणों पर निर्भर करती है, जैसे महंगाई, पैसा कितना उपलब्ध है और देश की आर्थिक बढ़त (GDP)। इसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपनी नीतियों के अनुसार तय करता है। रेपो रेट निकालने के लिए एक खास फार्मूला होता है, जिसमें यह देखा जाता है कि बैंक पैसे कितने दिन के लिए लेते हैं और उस पर कितना ब्याज लगता है। इससे RBI और बैंकों के बीच लेन-देन की पारदर्शिता बनी रहती है।
