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शेयर बेचकर सोना–चांदी में पैसा लगाने की सोच रहे हैं? जानें क्यों उल्टा पड़ सकता है दांव?

Gold Silver Rates में जारी नॉन-स्टॉप रैली को देख हर कोई इन चमकदार मेटल्स में निवेश को आतुर है। स्टॉक मार्केट के निराशाजनक प्रदर्शन को देखते हुए कई निवेशक यह भी सोच रहे हैं कि शेयर बेचकर गोल्ड-सिल्वर में निवेश किया जाए। लेकिन, यह भी दुविधा है कि ऑल टाइम हाई पर इन मेटल्स में निवेश करना रिस्की हो सकता है। बहरहाल, यहां जानें गोल्ड-सिल्वर की रैली, निवेशकों के फोमो और नए निवेश से जुड़े तमाम सवालों को लेकर एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं?​​​​

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Photo : Times Now Digital
सोना चांदी खरीदें या नहीं

Stocks vs Gold-Silver: पिछले डेढ़ साल की कमजोरी से चोट खाए रिटेल निवेशक अब तेजी से गोल्ड और सिल्वर का रुख कर रहे हैं। दोनों कीमती धातुओं में आई रिकॉर्डतोड़ तेजी ने इस ट्रेंड को और हवा दी है। लेकिन, वेल्थ मैनेजर्स और मार्केट एक्सपर्ट्स की चेतावनी साफ है कि हालिया रिटर्न के आधार पर पोर्टफोलियो में बड़ा उलटफेर करना, हेज को सट्टेबाजी में बदलने जैसा है, जिसका अंजाम लंबे समय में नुकसानदेह हो सकता है।

रिटर्न का गणित क्यों बढ़ा रहा बेचैनी?

Gold-Silver Return के आंकड़े पहली नजर में बेहद आकर्षक हैं। गोल्ड लगभग दोगुना हो चुका है और सिल्वर ने 250 प्रतिशत तक की छलांग लगाई है, जबकि इसी अवधि में निफ्टी का रिटर्न करीब 10 प्रतिशत के आसपास रहा। इस अंतर ने खासकर उन निवेशकों को असहज किया है, जिन्होंने स्मॉल-कैप और मिड-कैप शेयरों में नुकसान झेला है। नतीजतन, इक्विटी से निकलकर गोल्ड और सिल्वर ETFs में पैसा लगाने का मोह बढ़ा है। लेकिन, यही वह बिंदु है, जहां रिसेंसी बायस निवेश फैसलों पर हावी होने लगता है।

क्या ऑल टाइम हाई पर एंट्री सही?

कमोडिटी और मार्केट एक्सपर्ट अनुज गुप्ता कहते हैं, गोल्ड-सिल्वर फिलहाल ऑल टाइम हाई पर हैं। अगर किसी नए निवेशक को पैसा लगाना है, तो जाहिर तौर पर ऑल टाइम हाई पर एक साथ बड़ा निवेश रिस्की हो सकता है। खासतौर पर जब होराइजन शॉर्ट टर्म का है। क्योंकि, फिलहाल दोनों ही एसेट्स पीक पर हैं, जहां हल्क करेक्शन की संभावना हमेशा रहेगी। ऐसे में 'वन टाइम ऑल इन' बेहद रिस्की हो सकता है।

नया निवेश कैसे करें?

इसके साथ ही गुप्ता कहते हैं अगर किसी को गोल्ड-सिल्वर में 10 लाख रुपये का निवेश करना है, तो एक साथ एक ही दिन में यह निवेश करने से बेहतर है कि इसे SIP के तौर पर एक महीने, तीन महीने या 6 महीने के स्प्रेड में करें। इससे दो फायदे होंगे, जब बड़ी गिरावट आएगी, तो ज्यादा खरीदारी के लिए फंड मौजूद रहेगा और लंबे समय में इन्वेस्ट करने से बेहतर एवरेज प्राइस मिल सकती है। इसके अलावा ETF और फिजिकल में भी इस रकम को बांट सकते हैं। कुछ रकम फिजिकल मेटल में इन्वेस्ट करें और कुछ रकम ETF के जरिये डालें।

किसमें रिस्क ज्यादा?

केडिया एजवाइजरी के अजय केडिया बताते हैं गोल्ड और सिल्वर दोनों के प्राइस फिलहाल ऑल टाइम हाई पर हैं, जहां से कभी भी एक करेक्शन आ सकता है। हालांकि, सिल्वर में करीब 250% की रैली देखने को मिली है, ऐसे में सिल्वर में डीप करेक्शन का जोखिम भी ज्यादा नजर आता है।

Gold Silver technical Analysis.

Kedia Advisory ने अपने आउटलुक में बताया है कि स्ट्रक्चरल तेजी के बावजूद 2026 में करेक्शन का खतरा बना हुआ है। 2025 वह साल रहा जब प्रीशियस मेटल्स में पारंपरिक बुल रन एक स्पष्ट स्ट्रक्चरल शिफ्ट में बदल गया। आम तौर पर 2.5 से 3 साल के कमोडिटी साइकिल में करेक्शन का पैटर्न देखा जाता है, और इसी आधार पर 2025 की दूसरी छमाही में सुधार की उम्मीद थी। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-ईरान तनाव और वैश्विक ‘मिनरल वॉर्स’ ने इस साइकिल को पूरी तरह डिस्टॉर्ट कर दिया। Kedia Advisory का आकलन है कि गोल्ड ने 3,500–3,600 डॉलर के फिबोनाची टारगेट को मजबूती से पार करते हुए लगभग लाइनियर मूव में 5,100 डॉलर का स्तर छू लिया। खास बात यह रही कि जनवरी 2025 के बाद से गोल्ड में एक भी तिमाही गिरावट नहीं आई, जो अपने आप में एक एक्सट्रीम ट्रेंड को दर्शाता है। सिल्वर ने भी इसी पैटर्न को फॉलो किया और 75–80 डॉलर का लक्ष्य अपेक्षा से कहीं पहले हासिल कर लिया, जिसमें अमेरिका और चीन से आई स्ट्रक्चरल डिमांड और सप्लाई कंस्ट्रेंट्स की बड़ी भूमिका रही।

कितना हो फंड अलोकेशन?

केडिया बताते हैं कि अगर किसी निवेशक को नया निवेश करना है, तो उसे गोल्ड-सिल्वर में 70-30 के रेश्यो में निवेश करना चाहिए। निवेशक अपने फंड का 70% गोल्ड में निवेश करें और 30% सिल्वर में निवेश करें, क्योंकि जब सिल्वर में 20 से 50% का करेक्शन आएगा, तो गोल्ड में यह काफी कम रहेगा। इसके अलावा लॉन्ग टर्म के लिए गोल्ड ज्यादा स्टेबल ऐसेट है।

कितने पर प्रॉफिट बुक करें?

केडिया का कहना है कि अगर आपको गोल्ड-सिल्वर में अपने निवेश पर 30-40% तक का रिटर्न मिल चुका है, तो अपने कुल निवेश का 40-50% तक प्रॉफिट बुक कर सकते हैं। वहीं, इस रकम को फिर से इन्हीं एसेट्स में SIP के तौर पर लगा सकते हैं। अच्छे रिटर्न के लिए यह बेहद जरूरी है, कि समय-समस पर प्रॉफिट बुक किया जाए, ताकि हर बुल रन में पैसा बनाया जा सके।

रिस्क प्रोफाइल पर दें ध्यान

ET की एक रिपोर्ट में लाइटहाउस कैंटन के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और हेड ऑफ इन्वेस्टमेंट्स (इंडिया) प्रदीप गुप्ता के हवाले से बताया गया है कि एसेट एलोकेशन को कभी भी हालिया प्रदर्शन के आधार पर नहीं करना चाहिए। इसक पीछे उनकी दलील है कि मौजूदा ट्रेंड में निवेशक जोखिम लेने की अपनी क्षमता को नजरअंदाज कर रहे हैं और फंडामेंटल्स व प्राइस–वैल्यू गैप को पीछे छोड़ रहे हैं। गुप्ता यह भी कहते हैं कि गोल्ड और सिल्वर जैसे एसेट्स कैश-फ्लो जनरेट नहीं करते। ऐसे में इक्विटी से भारी मात्रा में शिफ्ट करना लॉन्ग टर्म वेल्थ क्रिएशन के मूल सिद्धांतों के खिलाफ जाता है।

इक्विटी vs गोल्ड-सिल्वर

कई निवेशक सवाल कर रहे हैं कि क्या 20 प्रतिशत प्रीशियस मेटल्स अलोकेशन भी कम है। लेकिन एक्सपर्ट्स का जवाब लगभग एक जैसा है। अनुज गुप्ता का कहना है कि मौजूदा प्राइस ट्रेंड को देखते हुए पूरा पोर्टफोलिया किसी एक तरह के ऐसे में लगा देना समझदारी नहीं है। गुप्ता का कहना है कि लॉन्ग टर्म के लिए अब भी 20% वाला नियम फॉलो करना चाहिए, जिसमें पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई करते हुए 20% तक एक्सपोजर गोल्ड-सिल्वर और दूसरी कमोडिटी में रखें। इसी तरह प्राइम वेल्थ फिनसर्व के को-फाउंडर और डायरेक्टर चक्रिवर्धन कुप्पाला बताते हैं कि ऐतिहासिक तौर पर इंस्टीट्यूशनल निवेशक गोल्ड और सिल्वर में 5 से 15 प्रतिशत तक का एक्सपोजर रखते आए हैं। उनके मुताबिक 20 फीसदीअलोकेशन पहले ही पोर्टफोलियो के जोखिम प्रोफाइल को बदल देता है। इससे ऐसे एसेट्स में कंसंट्रेशन बढ़ता है, जो डिफेंसिव तो हैं, लेकिन लॉन्ग टर्म ग्रोथ या इनकम खुद से नहीं देते।”

सिल्वर की रैली जोखिमभरी

सिल्वर की हालिया तेजी खास तौर पर निवेशकों को आकर्षित कर रही है। क्लीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और AI डेटा सेंटर्स में बढ़ती इंडस्ट्रियल डिमांड ने इसे सपोर्ट दिया है। इसके बावजूद, पिछले 16 सालों में सिल्वर ने 50 प्रतिशत समय नेगेटिव रिटर्न दिए हैं। लगातार पांच साल से सप्लाई डेफिसिट होने के बावजूद, यह सवाल बना हुआ है कि क्या मौजूदा प्राइस लेवल्स पर यह डिमांड टिकाऊ है। प्रदीप गुप्ता के शब्दों में, “यह कहना मुश्किल है कि इंडस्ट्रियल डिमांड-ड्रिवन समीकरण किसी भी कीमत पर कायम रह पाएगा या नहीं।”

निफ्टी टू गोल्ड रेश्यो

इतिहास बताता है कि जब Nifty-to-Gold रेशियो मौजूदा स्तरों पर पहुंचता है, तो कई बार इसके बाद इक्विटीज का आउटपरफॉर्मेंस देखने को मिलता है। चक्रिवर्धन कुप्पाला का कहना है कि यह कोई गारंटी नहीं है, लेकिन यह जरूर याद दिलाता है कि ऐसे फेज अक्सर साइक्लिकल होते हैं, न कि किसी स्थायी बदलाव का संकेत। यही वजह है कि मौजूदा शिफ्ट को एक्सपर्ट्स इक्विटी से स्थायी पलायन नहीं, बल्कि एक टैक्टिकल मूव मानते हैं।

गोल्ड हेज है, ड्राइवर नहीं

हरिचंदन यह भी साफ करते हैं कि गोल्ड को पोर्टफोलियो में हेज और डाइवर्सिफायर के रूप में देखना चाहिए, न कि रिटर्न ड्राइवर के तौर पर। उनकी फर्म 80:20 के इक्विटी-डेट एलोकेशन की सलाह देती है, जिसमें गोल्ड को डेट पोर्शन के भीतर आंशिक विकल्प की तरह शामिल किया जाता है। इससे डाइवर्सिफिकेशन तो बेहतर होता है, लेकिन लॉन्ग टर्म ग्रोथ की कीमत पर नहीं

डिस्क्लेमर: TIMES NOW नवभारत किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ में निवेश की सलाह नहीं देता है। यहां पर केवल जानकारी दी गई है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें।
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