ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक बड़े संकट में डाल दिया है। जैसे ही युद्ध की सुगबुगाहट शुरू हुई, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा गया। दुनिया के कई देशों में रातों-रात पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ा दी गईं ताकि बढ़ी हुई लागत की भरपाई की जा सके। लेकिन भारतीय कंज्यूमर्स के लिए राहत की बात यह है कि यहां तेल कंपनियों ने अभी तक कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है। इस स्थिरता के पीछे कोई एक वजह नहीं, बल्कि भारत सरकार की सोची-समझी रणनीति और तेल कंपनियों का 'बफर स्टॉक' मैनेजमेंट काम कर रहा है।
भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, फिर भी यहां कीमतों का न बढ़ना आम जनता के लिए बड़ी राहत है। ऐसे में आइए आपको बताते हैं आखिर दुनिया में तेल की कीमतें जहां बढ़ रही हैं वहां भारत की कीमतें स्थिर कैसे हैं?
95 देशों में महंगा हुआ पेट्रोल-डीजल
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते तनाव ने वैश्विक कच्चे तेल की सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिसका सीधा असर अब पूरी दुनिया की जेब पर दिख रहा है। कंबोडिया में ईंधन की कीमतें रिकॉर्ड 67.8%, वियतनाम में 49.7% और नाइजीरिया में 35% तक बढ़ गई हैं। अमेरिका में भी पेट्रोल के दाम 16.5% उछल चुके हैं, जहां कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में यह $5 प्रति गैलन के पार पहुंच गया है।यूरोप के जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों में भी भारी इजाफा दर्ज किया गया है। पड़ोसी देश पाकिस्तान में तेल की खपत कम करने के लिए '4-डे वर्किंग वीक' (हफ्ते में 4 दिन काम) का नियम लागू कर दिया गया है, जबकि बांग्लादेश में ऊर्जा बचाने के लिए यूनिवर्सिटीज तक बंद कर दी गई हैं।
भारत में क्यों नहीं बढे दाम?
इसका सबसे बड़ा कारण है भारत का 'सोर्स डायवर्सिफिकेशन' यानी अलग-अलग देशों से तेल खरीदना। पिछले कुछ समय में भारत ने केवल मिडिल ईस्ट पर निर्भर रहने के बजाय रूस और अन्य देशों से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने का जो फैसला लिया था, वह अब संकट के समय काम आ रहा है। इसके अलावा, भारतीय सरकारी तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) के पास पिछले कुछ महीनों के मुनाफे का एक हिस्सा सुरक्षित है, जिसे वे इस अस्थाई संकट के दौरान इस्तेमाल कर रही हैं। जब कच्चे तेल की कीमतें कम थीं, तब कंपनियों ने अच्छा मार्जिन कमाया था, और अब जब वैश्विक स्तर पर दाम बढ़े हैं, तो वे उस मुनाफे को ग्राहकों को महंगाई से बचाने के लिए 'शॉक एब्जॉर्बर' की तरह इस्तेमाल कर रही हैं।
ये फैक्टर भी करता है काम
एक और पहलू यह है कि भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार पर ही निर्भर नहीं करतीं, बल्कि इसमें टैक्स (Excise Duty और VAT) का एक बड़ा हिस्सा होता है। सरकार के पास हमेशा यह विकल्प रहता है कि अगर वैश्विक कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ती हैं, तो वह टैक्स में थोड़ी कटौती करके आम आदमी पर बोझ न पड़ने दे। हालांकि, अभी तक टैक्स कटौती की नौबत नहीं आई है क्योंकि कंपनियों ने खुद ही कीमतों को रोक कर रखा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत सरकार अभी 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में है। अगर ईरान युद्ध लंबा खिंचता है और कच्चा तेल $100 प्रति बैरल के पार जाता है, तभी भारत में कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना बनेगी। फिलहाल, भारत की मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और स्मार्ट सप्लाई चैन ने हमें दुनिया की इस महंगाई की लहर से बचा कर रखा है।
भारत में दाम न बढ़ने के 4 मुख्य कारण
- रूस से सस्ता तेल: भारत अभी भी रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल प्राप्त कर रहा है, जिससे मिडिल ईस्ट के संकट का असर कम हो गया है।
- बफर प्रॉफिट: पिछली तिमाही में तेल कंपनियों ने जो मोटा मुनाफा कमाया था, उसका इस्तेमाल अब बढ़ी हुई कीमतों को सोखने में किया जा रहा है।
- रणनीतिक भंडार: भारत के पास अपने 'स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व' में कई दिनों का तेल सुरक्षित रहता है, जो आपातकालीन स्थिति में कीमतों को कंट्रोल करने में मदद करता है।
- सरकारी नियंत्रण: हालांकि कीमतें बाजार आधारित हैं, लेकिन बड़े संकट के समय सरकार और सरकारी कंपनियां जनहित में कीमतों को स्थिर रखने का प्रयास करती हैं।
