Petrol Diesel price: पश्चिम एशिया (West Asia) में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आए तेज उछाल के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। हालांकि, उपभोक्ताओं के लिए यह राहत की खबर है, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (Oil companies) जैसे इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल के लिए यह स्थिति बड़ी चुनौती बन गई है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, कीमतों को स्थिर रखने के कारण इन कंपनियों को हर दिन ₹700 से ₹1,000 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ रहा है, जो मासिक आधार पर लगभग ₹30,000 करोड़ तक पहुंच जाता है।
कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल
पिछले कुछ महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखा गया है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत जो दो महीने पहले लगभग $70 प्रति बैरल थी, वह तनाव बढ़ने के कारण बढ़कर $120 प्रति बैरल तक पहुंच गई है। बीच में तो यह कीमतें $144 प्रति बैरल तक भी गई थीं, हालांकि अब यह $100 के आसपास कारोबार कर रही हैं। लागत और खुदरा बिक्री मूल्य के बीच इस बढ़ते अंतर के कारण अप्रैल के महीने में पेट्रोल पर करीब ₹18 प्रति लीटर और डीजल पर ₹25 प्रति लीटर तक का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया है।
उपभोक्ताओं को राहत देने की सरकारी कोशिश
सरकार का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को वैश्विक महंगाई की मार से बचाना रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा के अनुसार, सरकार ने अब तक कीमतों को स्थिर रखने का प्रयास किया है ताकि आम आदमी पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। इस दबाव को कम करने के लिए सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में भी भारी कटौती की है। पेट्रोल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को ₹13 से घटाकर ₹3 प्रति लीटर और डीजल पर ₹10 से घटाकर शून्य कर दिया गया है। यदि यह कटौती नहीं की जाती, तो तेल कंपनियों पर यह वित्तीय बोझ ₹62,500 करोड़ तक जा सकता था।
राजस्व और तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर असर
उत्पाद शुल्क में कटौती के कारण सरकार को खुद भी हर महीने करीब ₹14,000 करोड़ के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है। दूसरी ओर, तेल कंपनियों के बहीखाते और मुनाफे (Margin) पर भारी दबाव है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो कंपनियों को अपनी कार्यशील पूंजी (Working Capital) की जरूरतों के लिए बाजार से और अधिक कर्ज लेना पड़ सकता है। इससे उनकी भविष्य की विस्तार योजनाओं और पूंजीगत व्यय (Capex) पर भी असर पड़ सकता है, हालांकि सरकार ऊर्जा सुरक्षा और रिफाइनिंग विस्तार से जुड़े प्रोजेक्ट्स को पूरा समर्थन दे रही है।
दुनिया के मुकाबले भारत की स्थिति
दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत की स्थिति काफी अलग है। जहां स्पेन, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों ने कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के बाद पेट्रोल-डीजल के दाम 20% से 30% तक बढ़ा दिए हैं, वहीं भारत में 28 फरवरी के बाद से खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। परिवहन लागत और बीमा प्रीमियम बढ़ने के बावजूद देशभर में ईंधन और एलपीजी की आपूर्ति को सामान्य बनाए रखा गया है।
