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Explained: BRICS में मोदी-शी की मुलाकात से भारत-चीन व्यापारिक रिश्तों में आएगी गर्माहट?

India-China Trade: BRICS 2026 में नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात के बीच भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा चिंताजनक स्थिति में है लेकिन इस मुलाकात से भारत-चीन व्यापारिक रिश्ते में गर्माहट की उम्मीद जताई जा रही है।

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मोदी-शी की बैठक के बाद क्या सुधरेंगे व्यापारिक रिश्ते? जानिए भारत-चीन कारोबार का पूरा गणित (तस्वीर-AI)
Authored by: रामानुज सिंह
Updated Sep 13, 2026, 10:59 IST
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India-China Trade : दिल्ली में हुए BRICS 2026 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर रही। दोनों नेताओं की यह बैठक ऐसे समय हुई, जब भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव पहले की तुलना में कम हुआ है, लेकिन व्यापार के मोर्चे पर कई बड़ी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। खास तौर पर भारत का चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा और जरूरी औद्योगिक सामान के लिए चीन पर निर्भरता बड़ा मुद्दा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या मोदी-शी की मुलाकात से दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में एक बार फिर गर्माहट आएगी?

सात साल बाद भारत पहुंचे शी जिनपिंग

BRICS के 18वें शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत पहुंचे। यह 7 साल बाद उनका पहला भारत दौरा है। सम्मेलन से अलग 12 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बातचीत हुई। यह मुलाकात इसलिए भी अहम है क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद काफी खराब हो गए थे। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन पिछले कुछ समय में तनाव कम करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। भारत का स्पष्ट मानना है कि सीमा पर शांति और स्थिरता ही दोनों देशों के बीच आर्थिक और दूसरे रिश्तों को आगे बढ़ाने का आधार बन सकती है।

भारत-चीन व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर, लेकिन तस्वीर एकतरफा

भारत और चीन के बीच कारोबार लगातार बढ़ रहा है। चीनी सीमा शुल्क के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार करीब 155.6 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। हालांकि, इस व्यापार का सबसे बड़ा फायदा चीन को होता दिखाई देता है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार 7.9 प्रतिशत बढ़कर 127.7 अरब डॉलर हो गया, जबकि 2024-25 में यह 118.39 अरब डॉलर था। व्यापार बढ़ना सकारात्मक संकेत है, लेकिन समस्या यह है कि भारत चीन से जितना सामान खरीदता है, उसके मुकाबले भारत का निर्यात काफी कम है। यही वजह है कि भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है।

भारत का करीब 100 अरब डॉलर का व्यापार घाटा

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा बढ़कर 99.19 अरब डॉलर हो गया। इससे पहले 2024-25 में यह करीब 85 अरब डॉलर था। 2023-24 में व्यापार घाटा 83.2 अरब डॉलर, 2022-23 में 73.3 अरब डॉलर और 2021-22 में करीब 44 अरब डॉलर था। यानी पिछले कुछ वर्षों में भारत का चीन पर व्यापारिक घाटा लगातार बढ़ा है। यह भारत के लिए बड़ी चिंता है, क्योंकि इसका मतलब है कि चीन से होने वाला आयात भारत के निर्यात से कई गुना ज्यादा है। भारत ने 2025-26 में चीन को 19.47 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया, जो एक साल पहले के 14.25 अरब डॉलर के मुकाबले 36.62 प्रतिशत ज्यादा है। दूसरी तरफ चीन से भारत का आयात 16 प्रतिशत बढ़कर 131.62 अरब डॉलर हो गया, जो 2024-25 में 113.44 अरब डॉलर था।

चीन से क्या-क्या खरीदता है भारत?

भारत की चीन पर निर्भरता केवल तैयार सामान तक सीमित नहीं है। बड़ी समस्या यह है कि चीन से आने वाले बहुत से सामान भारत के अपने उद्योगों के लिए कच्चे माल और जरूरी मध्यवर्ती उत्पाद हैं। साल 2025 में चीन से भारत के आयात में करीब 98.5 प्रतिशत हिस्सा औद्योगिक उत्पादों का था। इनमें इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जे, मशीनरी, कंप्यूटर से जुड़े सामान, ऑर्गेनिक केमिकल, इलेक्ट्रिक वाहन की बैटरी, सोलर मॉड्यूल, सक्रिय औषधीय सामग्री यानी API और विशेष रसायन जैसे उत्पाद शामिल हैं। भारत के चीन से होने वाले करीब 66 प्रतिशत आयात का मूल्य करीब 82.6 अरब डॉलर है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कंप्यूटर और ऑर्गेनिक केमिकल प्रमुख हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर दवा उद्योग तक चीन पर निर्भरता

भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स आयात में चीन की हिस्सेदारी करीब 43 प्रतिशत है। मशीनरी और कंप्यूटर से जुड़े आयात में यह हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत और ऑर्गेनिक केमिकल के आयात में करीब 44 प्रतिशत है। यही कारण है कि चीन से आयात कम करना भारत के लिए केवल राजनीतिक फैसला नहीं है। इसे अचानक कम करने से भारत के विनिर्माण उद्योग पर भी असर पड़ सकता है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव यानी GTRI के मुताबिक, चीन से आने वाले कई उत्पाद ऐसे हैं जिन्हें भारत अपनी जरूरत के हिसाब से आसानी से दूसरे देशों से नहीं खरीद सकता। ये भारत के कारखानों में इस्तेमाल होने वाले जरूरी कच्चे माल और मध्यवर्ती उत्पाद हैं। उदाहरण के लिए मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने के लिए चीन से आने वाले कलपुर्जों की जरूरत पड़ती है। इसी तरह इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा, दवा और केमिकल उद्योग भी चीन से आने वाले कई उत्पादों पर निर्भर हैं।

मोदी-शी की मुलाकात से जगी उम्मीद

मोदी-शी की मुलाकात से जगी उम्मीद

भारत के निर्यात की राह में भी यही चुनौती

भारत अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए लगातार कोशिश कर रहा है। लेकिन यहां एक दिलचस्प स्थिति सामने आती है। भारत जिन तैयार उत्पादों का निर्यात करना चाहता है, उन्हें बनाने के लिए कई बार उसे चीन से कच्चा माल और कलपुर्जे आयात करने पड़ते हैं। वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, चीन के साथ व्यापार घाटे का बड़ा कारण कच्चे माल, मध्यवर्ती सामान और पूंजीगत सामान का आयात है। इनमें वाहन कलपुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स, मोबाइल फोन के उपकरण, मशीनरी और API शामिल हैं। इसका मतलब यह है कि चीन से आने वाला हर आयात भारत के लिए नुकसान नहीं है। कई उत्पाद भारत के अपने उद्योगों के उत्पादन और निर्यात के लिए जरूरी हैं। चुनौती यह है कि भारत इन जरूरी सामानों के लिए एक ही देश पर अपनी निर्भरता कितनी कम कर सकता है।

मोदी-शी की बातचीत में व्यापार घाटा भी बड़ा मुद्दा

इसी पृष्ठभूमि में मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों नेताओं ने आर्थिक और व्यापारिक रिश्तों पर चर्चा की। इसमें व्यापार असंतुलन, सप्लाई चेन और बाजार तक बेहतर और भरोसेमंद पहुंच जैसे मुद्दे शामिल रहे। भारत चाहता है कि उसके उत्पादों के लिए चीन का बाजार ज्यादा खुले और दोनों देशों के बीच व्यापार ज्यादा संतुलित हो। वहीं, कंपनियों के लिए कारोबार आसान बनाने, परिवहन संपर्क बढ़ाने और कारोबारी आवाजाही में सुधार पर भी जोर दिया गया। दोनों देशों की कंपनियां लंबे समय से वीजा में देरी, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और औद्योगिक उपकरणों की बिक्री से जुड़ी पाबंदियों जैसी समस्याओं की बात करती रही हैं।

चीनी निवेश पर भारत का रुख अभी भी सख्त

व्यापार के साथ चीन से आने वाले निवेश का मुद्दा भी अहम है। अप्रैल 2000 से मार्च 2026 के बीच भारत को चीन से करीब 2.51 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मिला है। हालांकि भारत ने हाल में कुछ देशों से जुड़े FDI नियमों में ढील दी है, लेकिन यह छूट चीन, हांगकांग और भारत के साथ जमीन की सीमा साझा करने वाले दूसरे देशों में पंजीकृत संस्थाओं पर लागू नहीं होती। इससे साफ है कि आर्थिक रिश्तों को सुधारने की कोशिशों के बावजूद भारत सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सावधानी बरत रहा है।

क्या फिर मजबूत हो सकते हैं भारत-चीन रिश्ते?

मोदी-शी की मुलाकात को भारत-चीन संबंधों में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। दोनों देशों के बीच कारोबार बढ़ रहा है और सीमा पर तनाव पहले की तुलना में कम हुआ है। लेकिन व्यापार घाटा, बाजार तक पहुंच, निवेश नियम और चीन पर भारत की औद्योगिक निर्भरता जैसी समस्याएं अभी भी मौजूद हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा है कि बीजिंग भारत के साथ संबंधों को रणनीतिक और लंबे समय के नजरिए से देखता है। दोनों देशों के बीच संस्थागत बातचीत धीरे-धीरे फिर शुरू हो रही है और सहयोग के अवसर बढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भी स्पष्ट किया है कि सीमा क्षेत्रों में शांति दोनों देशों के संबंधों के विकास के लिए जरूरी आधार है।

BRICS के मंच पर भारत के लिए क्यों अहम है यह मुलाकात?

BRICS अब केवल कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है। इसमें 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। इन देशों की हिस्सेदारी दुनिया की करीब 49.5 प्रतिशत आबादी, करीब 40 प्रतिशत वैश्विक GDP और करीब 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार में है। ऐसे में BRICS सम्मेलन के दौरान भारत और चीन के नेताओं की बातचीत का असर केवल दोनों देशों के रिश्तों तक सीमित नहीं रहेगा। अगर दोनों देश व्यापार और आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने में सफल होते हैं, तो इसका असर ग्लोबल साउथ की अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, मोदी-शी की मुलाकात से भारत और चीन के रिश्तों में सुधार की उम्मीद जरूर जगी है, लेकिन व्यापार में वास्तविक संतुलन लाने के लिए केवल टॉप नेताओं की बैठक काफी नहीं होगी। बाजार तक बेहतर पहुंच, व्यापार बाधाओं में कमी, सप्लाई चेन का विस्तार और सीमा पर स्थायी शांति जैसे कई मोर्चों पर लगातार काम करना होगा। अगर इन क्षेत्रों में प्रगति होती है, तो आने वाले समय में भारत-चीन के व्यापारिक रिश्तों में नई गर्माहट देखने को मिल सकती है।

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