Meta Vs Media Content Uses Case : फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा को फ्रांस में बड़ा झटका लगा है। फ्रांस की प्रतिस्पर्धा नियामक संस्था ने मेटा को आदेश दिया है कि वह स्थानीय मीडिया संस्थानों के साथ दोबारा बातचीत शुरू करे और उनके कंटेंट के इस्तेमाल के बदले भुगतान का नया प्रस्ताव 15 दिनों के भीतर पेश करे। फ्रांसीसी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह विवाद उन खबरों और लेखों के इस्तेमाल को लेकर है, जिन्हें मेटा अपने प्लेटफॉर्म पर दिखाता है। फ्रांस के मीडिया संगठनों का कहना है कि उन्हें सालों से उचित भुगतान नहीं मिला है।
मेटा को करनी होगी फीस पर बात
आखिर मामला क्या है?
फ्रांस के दो प्रमुख मीडिया संगठनों DVP और APIG ने शिकायत की थी कि मेटा ने कंटेंट इस्तेमाल की फीस तय करने का तरीका खुद ही तय करने की कोशिश की। इसके साथ ही कंपनी ने वह जरूरी जानकारी भी साझा नहीं की, जिससे मीडिया संस्थान यह समझ सकें कि उन्हें कितना भुगतान मिलना चाहिए। फ्रांस के प्रतिस्पर्धा नियामक का मानना है कि पहली नजर में मेटा ने अपने बाजार प्रभुत्व का गलत फायदा उठाया है। इसलिए कंपनी को 15 दिनों के भीतर भुगतान की रूपरेखा पेश करने और मीडिया संस्थानों से फिर बातचीत शुरू करने का निर्देश दिया गया है।
मेटा ने क्या कहा?
मेटा ने कहा कि वह नियामक के फैसले से सहमत नहीं है, लेकिन प्रक्रिया में सहयोग करेगा। कंपनी का कहना है कि वह मीडिया संगठनों के साथ "उचित समझौता" करना चाहती है और उम्मीद करती है कि अब दोनों पक्ष अच्छे इरादे से बातचीत आगे बढ़ाएंगे।
मीडिया संस्थानों ने फैसले का स्वागत किया
फ्रांसीसी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मामले में मीडिया के पक्ष को AVP आगे बढ़ा रहा है। ले मोंदे और ले इको जैसे बड़े अखबार इस ग्रुप में शामिल हैं। ग्रुप ने प्रतिस्पर्धा नियामक के फैसले का स्वागत किया है। माना जा रहा है कि अब बातचीत दोबारा शुरू होने से लंबे समय से अटका विवाद सुलझने की उम्मीद बढ़ गई है।
'नेबरिंग राइट्स' क्या होते हैं?
इस पूरे विवाद की जड़ में "नेबरिंग राइट्स" हैं। यूरोपीय संघ (European Union) के नियमों के तहत समाचार प्रकाशकों को यह अधिकार मिलता है कि अगर कोई डिजिटल प्लेटफॉर्म उनके समाचार या कंटेंट का उपयोग करता है, तो वह उसके बदले भुगतान मांग सकते हैं। यानी यदि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म किसी अखबार या समाचार वेबसाइट की खबरों का व्यावसायिक उपयोग करते हैं, तो प्रकाशकों को उसका उचित हिस्सा मिलना चाहिए।
फ्रांस क्यों सख्ती दिखा रहा है?
फ्रांस उन देशों में शामिल है जो यूरोपीय संघ के इस कानून को सबसे सख्ती से लागू कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में इसी तरह के मामलों में गूगल समेत कई बड़ी टेक कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जा चुका है। अब मेटा भी इसी तरह की कानूनी कार्रवाई का सामना कर रही है।
कितनी रकम देनी होगी?
फिलहाल फ्रांस की प्रतिस्पर्धा संस्था ने यह तय नहीं किया है कि मेटा को कितनी राशि चुकानी होगी। नियामक संस्था के अध्यक्ष बेनोआ कोयरे ने कहा कि अगर अभी कोई निश्चित रकम तय कर दी जाती, तो बातचीत उसी आंकड़े पर अटक सकती थी। इसलिए भुगतान की राशि दोनों पक्षों की बातचीत से ही तय होने दी जाएगी।
2025 से नहीं हुआ कोई भुगतान
मेटा और फ्रांस के मीडिया संगठनों के बीच पहले हुआ समझौता 2024 में खत्म हो गया था। इसके बाद दोनों पक्ष नई फीस पर सहमत नहीं हो सके। इसी वजह से 2025 से फ्रांसीसी मीडिया संस्थानों को कोई भुगतान नहीं मिला, जबकि उनकी खबरें लगातार मेटा के प्लेटफॉर्म पर दिखाई जाती रहीं। नियामक संस्था का कहना है कि इससे मीडिया कंपनियों को आर्थिक नुकसान हुआ है।
क्यों अहम है यह मामला?
यह मामला सिर्फ फ्रांस तक सीमित नहीं है। दुनियाभर में समाचार प्रकाशक और टेक कंपनियां कंटेंट के इस्तेमाल और उसके बदले भुगतान को लेकर आमने-सामने हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बढ़ते कंटेंट उपयोग के बीच ऐसे विवाद लगातार बढ़ रहे हैं। फ्रांस का यह फैसला भविष्य में दूसरे देशों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
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