भारत में बहुत से लोगों के मन में यह गलतफहमी होती है कि इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) सिर्फ उन्हीं लोगों को फाइल करना चाहिए जिनकी कमाई टैक्स स्लैब के दायरे में आती है या जिन्हें सरकार को टैक्स देना होता है। अगर आपकी सालाना आय 2.5 लाख या 7 लाख (नया टैक्स रिजीम) से कम है और आपका कोई टैक्स नहीं बनता, तो आप शायद सोचते होंगे कि भला आईटीआर भरने की झंझट में क्यों पड़ा जाए। लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों और नियमों की मानें तो टैक्स न बनने के बावजूद आईटीआर फाइल करना आपके लिए बेहद फायदेमंद और कई मामलों में तो बहुत जरूरी साबित हो सकता है। आईटीआर सिर्फ टैक्स चुकाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह आपके कई काम आ सकता है।
क्या है जीरो ITR फाइल करने के फायदे?
निल या जीरो आईटीआर (Nil ITR) फाइल करने का सबसे पहला और बड़ा फायदा तब मिलता है जब आप बैंक से किसी भी तरह के लोन (Loan) के लिए आवेदन करते हैं। चाहे आपको अपने सपनों का घर खरीदने के लिए होम लोन लेना हो, नई गाड़ी के लिए कार लोन चाहिए हो या फिर बिजनेस को बढ़ाने के लिए बिजनेस लोन की जरूरत हो बैंक सबसे पहले आपसे पिछले 2 से 3 सालों का आईटीआर मांगते हैं। बैंक इसे आपकी आय के सबसे भरोसेमंद और प्रामाणिक प्रमाण (Proof of Income) के रूप में देखते हैं। भले ही आपका टैक्स न बनता हो, लेकिन लगातार भरा गया आईटीआर यह साबित करता है कि आपकी आय का एक नियमित स्रोत है और आप वित्तीय रूप से अनुशासित हैं। इससे बैंकों का आप पर भरोसा बढ़ता है और आपका लोन आसानी से और कम ब्याज दरों पर मंजूर हो जाता है।
विदेश यात्रा में पड़ती है जरुरत
दूसरा सबसे महत्वपूर्ण फायदा विदेशी यात्रा या वीजा (Visa Application) के समय मिलता है। अगर आप पढ़ाई, नौकरी या सिर्फ घूमने के लिए विदेश जाने की योजना बना रहे हैं, तो वीजा इंटरव्यू या डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के दौरान दूतावास (Embassies) अक्सर आपसे पिछले कुछ सालों का आईटीआर मांगते हैं। खासकर अमेरिका, यूके, कनाडा और यूरोप जैसे देशों के वीजा के लिए आईटीआर एक बेहद जरूरी दस्तावेज माना जाता है। विदेशी दूतावास यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जो व्यक्ति उनके देश में आ रहा है, उसकी भारत में वित्तीय स्थिति कैसी है और क्या वह यात्रा का खर्च उठाने में सक्षम है। ऐसे में आपका जीरो टैक्स वाला आईटीआर भी आपकी मजबूत वित्तीय बैकग्राउंड को दर्शाता है, जिससे वीजा रिजेक्ट होने का खतरा काफी कम हो जाता है।
TDS रिफंड
आईटीआर फाइल करने का एक और व्यावहारिक फायदा है कटे हुए टीडीएस (TDS) का रिफंड पाना। कई बार ऐसा होता है कि आपकी कुल सालाना आय टैक्स के दायरे में नहीं आती, लेकिन बैंकों में रखी आपकी एफडी (Fixed Deposit) के ब्याज, लाभांश (Dividend) या किसी फ्रीलांस काम के भुगतान पर बैंक या कंपनियां पहले ही टीडीएस काट लेती हैं। इस कटे हुए पैसे को वापस पाने का एकमात्र कानूनी तरीका इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करना है। जब आप अपना आईटीआर दाखिल करते हैं और उसमें दिखाते हैं कि आपकी कुल आय टैक्स के दायरे से बाहर है, तो आयकर विभाग आपके कटे हुए टीडीएस की पूरी रकम सीधे आपके बैंक खाते में वापस (Refund) भेज देता है। अगर आप आईटीआर नहीं भरते हैं, तो आपका यह पैसा सरकार के पास ही रह जाता है।
कैपिटल गेन में करता है मदद
अगर आप शेयर बाजार में निवेश करते हैं, म्यूचुअल फंड या फ्यूचर एंड ऑप्शंस (F&O) में ट्रेडिंग करते हैं, तो बिजनेस या कैपिटल गेन्स में होने वाले नुकसान (Losses) को आगे के सालों के लिए कैरी फॉरवर्ड (Carry Forward) करने के लिए समय पर आईटीआर भरना बेहद जरूरी है। इसका मतलब यह है कि अगर इस साल आपको निवेश में कोई घाटा हुआ है, तो आप उस घाटे को आईटीआर में दर्ज करके अगले कुछ सालों के मुनाफे के साथ एडजस्ट कर सकते हैं, जिससे भविष्य में आपको कम टैक्स देना पड़ेगा। लेकिन इस नियम का फायदा उठाने की पहली शर्त यही है कि आपका आईटीआर नियत तारीख से पहले भरा होना चाहिए।
आईटीआर आपके लिए एक वैध एड्रेस और इनकम प्रूफ के रूप में भी काम करता है। जब आप खुद का कोई नया काम या स्टार्टअप शुरू करते हैं, या ₹50 लाख से ज्यादा का बड़ा टर्म इंश्योरेंस (Life Insurance) कवर खरीदने जाते हैं, तब भी बीमा कंपनियां आपकी वित्तीय हैसियत जांचने के लिए आईटीआर की मांग करती हैं। कुल मिलाकर देखा जाए, तो टैक्स न बनने पर भी हर साल आईटीआर फाइल करना एक समझदारी भरा फैसला है। यह आपकी एक क्लीन फाइनेंशियल हिस्ट्री (Clean Financial History) तैयार करता है, जो भविष्य में किसी भी बड़े वित्तीय मोड़ पर आपके लिए मददगार साबित होती है।
