Iranian rial vs USD vs Indian Rupee : ईरान में इस्लामिक शासन के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों को अब दो हफ्ते से ज्यादा समय हो चुका है। देश के कई हिस्सों में लोग ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं। इन विरोध प्रदर्शनों के बीच ईरान की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में आ गई है और देश की मुद्रा रियाल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से गिर गई है।
औंधे मुंह गिरी ईरान करेंसी की कीमत (तस्वीर-istock)
वर्तमान स्थिति यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईरानी रियाल की डॉलर के मुकाबले कीमत करीब शून्य के बराबर मानी जा रही है। एक डॉलर की कीमत ईरान के करीब 10,65,000 रियाल तक पहुंच गई है, जो रियाल की भारी कमजोरी को दर्शाती है। अगर भारतीय मुद्रा से तुलना करें, तो एक ईरानी रियाल की कीमत भारतीय रुपये में सिर्फ 0.000085 रुपये रह गई है। वहीं, एक भारतीय रुपया ईरान में लगभग 11,797.83 रियाल के बराबर है। यह आंकड़े साफ दिखाते हैं कि राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट के चलते ईरान की मुद्रा पर कितना गहरा असर पड़ा है।
डॉलर के मुकाबले जीरो
रुपये के मुकाबले ईरान की करेंसी
ईरान की मुद्रा संकट
ईरान की मुद्रा रियाल एक बार फिर तेज दबाव में है। बीते एक साल में रियाल ने डॉलर के मुकाबले अपनी करीब आधी कीमत खो दी है। महंगाई अब भी संकट के स्तर पर है और दिसंबर 2025 में यह 42.5% दर्ज की गई। यह गिरावट किसी एक हफ्ते की घबराहट नहीं है, बल्कि कई सालों से जमा हो रही आर्थिक कमजोरियों का नतीजा है, जिसे अब नए राजनीतिक और नीतिगत दबाव और तेज कर रहे हैं।
क्या ईरानी मुद्रा शून्य तक गिर सकती है?
सीधा जवाब है नहीं। कोई भी मुद्रा तब तक “शून्य” पर नहीं जाती जब तक देश मौजूद है और उसी मुद्रा का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन आम लोगों को यह ऐसा महसूस हो सकता है कि मुद्रा की कीमत करीब खत्म हो चुकी है। जब लोग कहते हैं कि “रियाल शून्य हो जाएगी” तो आमतौर पर इसका मतलब तीन बातों में से एक होता है।
- खरीदने की ताकत का टूटना:- जब महंगाई इतनी तेज हो जाए कि तनख्वाह बढ़ने से कहीं अधिक तेजी से कीमतें बढ़ें, तब पैसे की असली कीमत आम आदमी के लिए लगभग खत्म हो जाती है।
- एक्सचेंज रेट में लगातार जीरो जुड़ना:- जैसे एक डॉलर 15 लाख रियाल से बढ़कर 20 लाख या 30 लाख रियाल तक पहुंच जाए।
- नोटों से जीरो हटाना (Redenomination):- सरकार पुराने नोटों से जीरो हटाकर नई मुद्रा जारी करती है। कागज पर कीमतें छोटी दिखने लगती हैं, लेकिन मूल समस्या बनी रहती है।
ईरान पहले से ही तीसरे विकल्प पर काम कर रहा है। अक्टूबर 2025 में संसद ने रियाल से चार जीरो हटाने की योजना मंजूर की, जिसमें दो साल की तैयारी और तीन साल तक पुराने-नए नोट साथ चलने की व्यवस्था है।
इस समय रियाल की असली कीमत क्या है?
ईरान में एक नहीं, बल्कि कई तरह के एक्सचेंज रेट चलते हैं। यही समस्या की जड़ है। सरकारी दर करीब 42,000 रियाल प्रति डॉलर, खुले बाजार की दर करीब 14,57,000 रियाल प्रति डॉलर इसका मतलब है कि दोनों के बीच करीब 35 गुना का अंतर है। यह अंतर अपने आप में अस्थिरता पैदा करता है।
कई दरें क्यों रियाल को और कमजोर करती हैं?
- नीति बदलाव से पहले सट्टेबाजी:- जब लोगों को लगता है कि सरकार सब्सिडी या सस्ती डॉलर व्यवस्था खत्म करने वाली है, तो वे पहले से ही कमजोर रेट मानकर लेन-देन करने लगते हैं।
- अरबिट्राज और दलाली:- सरकारी और बाजार दर में बड़ा फर्क होने से बिचौलियों को भारी मुनाफा मिलता है, जिससे डॉलर गलत जगहों पर चला जाता है।
- भरोसे की कमी:- कई दरें यह संकेत देती हैं कि सरकार के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं है। इससे अवमूल्यन की उम्मीद और मजबूत होती है।
रियाल पर दबाव बढ़ाने वाले मुख्य कारण
- प्रतिबंधों से डॉलर की कमी:- अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण तेल निर्यात और विदेशी भुगतान मुश्किल हो गए हैं। डॉलर की कमी सीधे रियाल को कमजोर करती है।
- बहुत ऊंची महंगाई:- 42% से अधिक महंगाई में लोग नकद पैसा रखने से बचते हैं। वे डॉलर, सोना, जमीन या सामान खरीदने लगते हैं।
- कमजोर आर्थिक वृद्धि:- विश्व बैंक के अनुसार 2025 में ईरान की अर्थव्यवस्था 1.7% सिकुड़ी और 2026 में 2.8% और घटने का अनुमान है। कमजोर अर्थव्यवस्था से सरकार पर छपाई का दबाव बढ़ता है।
- नीतिगत बदलाव से डॉलर की मांग बढ़ना:- दिसंबर 2025 में सरकार ने जरूरी आयात के लिए भी खुले बाजार से डॉलर खरीदना अनिवार्य कर दिया, जिससे मांग अचानक बढ़ गई।
- राजनीतिक अस्थिरता: दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में विरोध प्रदर्शनों ने जोखिम बढ़ाया। जब लोगों को भविष्य अनिश्चित लगता है, तो वे अपनी मुद्रा जल्दी छोड़ते हैं।
रियाल शून्य पर नहीं जाएगी, लेकिन महंगाई, अवमूल्यन और जीरो हटाने की प्रक्रिया इसे आम लोगों के लिए लगभग बेकार महसूस करा सकती है। असली संकट कागज़ी कीमत का नहीं, बल्कि लोगों की खरीदने की ताकत का है और वही आज ईरान में सबसे तेजी से टूट रही है।
