भारत में महंगाई अब उस दिशा में बढ़ रही है जिसे केवल 'मर्फी का नियम' (Murphy’s Law) से समझा जा जा सकता है। यानी 'जो गलत हो सकता है, वह गलत होकर ही रहेगा'। आप सोच रहेंगे होंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं तो इसे आपको प्रसिद्ध हिंदी कहावत 'करे कोई और भुगते कोई' (गलती, अपराध या काम कोई और करे और उसका परिणाम, सजा या नुकसान किसी दूसरे निर्दोष व्यक्ति को उठाना पड़े) से समझाते हैं। भारत में महंगाई लगातार बढ़ रही है लेकिन क्यों? क्या भारत ने कुछ गलत किया है? क्या इसके पीछे भारत की कोई भूमिका है? जवाब है, नहीं! फिर आम लोगों पर महंगाई का बोझ क्यों बढ़ रहा है?
बता दें कि यह सब दुनियाभर में जारी युद्ध और मौसम के चलते हो रहा है। अमेरिका-ईरान और रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते दुनियाभर में जरूरी सामान की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया और खाद समेत कई जरूरी चीजें महंगी हुईं। इसका सीधा असर भारत की महंगाई पर पड़ा है। जुलाई में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.45% हो गई, जबकि थोक महंगाई मामूली नरमी के बावजूद 9.78% के ऊंचे स्तर पर है। देश में बढ़ती महंगाई आम लोगों की परेशानी बढ़ा रहा है। आइए समझते हैं कि महंगाई डायन किस तरह आपकी जेब और घर का बजट खा रही है।
वैश्विक युद्ध, मानसून और हमारी थाली पर बढ़ता बोझ
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे युद्ध और मौसम की बेरुखी का सीधा असर भारत में आम आदमी के पर पड़ रहा है। महंगाई बढ़ने से घर का बजट बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में स्थिति और भी खराब हो सकती है क्योंकि थोक महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर बनी हुई है। बता दें कि जब थोक महंगाई दर महीनों तक 9% से ऊपर बनी रहती है, तो उत्पादक कंपनियों और व्यापारियों के लिए उस बढ़े हुए बोझ को लंबे समय तक खुद झेलना असंभव हो जाता है। शुरुआत में कंपनियां अपना मुनाफा घटाकर कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश करती हैं। लेकिन जब ईंधन, पैकेजिंग मटीरियल, ट्रांसपोर्ट और प्लास्टिक की लागत बढ़ती ही जाती है, तो वे अंततः यह बोझ उपभोक्ता पर डाल देती हैं। यानी आज जो थोक महंगाई ऊंची दिख रही है, वह आने वाले दिनों में आपकी खुदरा महंगाई को और बढ़ाएगी।
वैश्विक फसल उत्पादन में गिरावट की आशंका
महंगाई बढ़ाने में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फसलों का कम उत्पादन भी एक बड़ा कारण है। अमरीकी कृषि विभाग (USDA) के मुताबिक, यूरोपीय संघ (EU) में इस साल गेहूं का उत्पादन 145.1 मिलियन टन से घटकर 134.2 मिलियन टन रहने का अनुमान है। वहीं मक्के का उत्पादन गिरकर लगभग 50.2 मिलियन टन पर आ सकता है, जो बीते दो दशकों में सबसे कम है। इसी तरह अमरीका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया से निर्यात होने वाले अनाज के दाम 15% से 35% तक बढ़ चुके हैं। यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और दुनिया भर में 'अल-नीनो' के कारण बिगड़े मौसम ने गेहूं, मक्के और चावल की बुवाई व पैदावार को काफी चोट पहुंचाई है।
दुनिया के किसानों पर बढ़ता दबाव
संयुक्त राष्ट्र (FAO) के विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल और नेचुरल गैस की ऊंची कीमतों से दुनिया भर के किसानों की लागत बढ़ रही है। अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में किसान महंगे डीजल और खाद के कारण बुवाई का दायरा घटा रहे हैं या उन फसलों की ओर रुख कर रहे हैं जिनमें कम खाद लगती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा माल महंगा होने का असर दुकानों तक पहुंचने में 3 से 6 महीने का समय लगता है। इसी वजह से अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में भारत में खुदरा महंगाई औसतन 5% से 5.5% के आसपास बनी रह सकती है।
आम आदमी का बजट और सिमटती बचत
महंगाई का सबसे ज्यादा असर मध्यमवर्ग और कम आय वाले परिवारों पर पड़ता है। खाने-पीने का सामान महंगा होने पर लोगों को अपनी जरूरी जरूरतों के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी परिवार का महीने का राशन खर्च ₹8,000 है और खाद्य वस्तुओं की लागत 5% बढ़ जाती है, तो हर महीने ₹400 और साल में करीब ₹4,800 का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। जब आमदनी (सैलरी) स्थिर रहे और राशन, बिजली व ट्रांसपोर्ट का बिल बढ़ जाए, तो इंसान को अपनी मासिक बचत में कटौती करनी पड़ती है। यह स्थिति न केवल आज का बजट बिगाड़ती है, बल्कि भविष्य की आर्थिक सुरक्षा पर भी असर डालती है।
भारतीय कृषि और बफर स्टॉक का सुरक्षा कवच
भारत के लिए मानसून की शुरुआत थोड़ी धीमी और चिंताजनक रही थी, जिससे चावल के उत्पादन और खाद्य कीमतों को लेकर सवाल उठने लगे थे। लेकिन राहत की बात यह है कि जून के अंत और जुलाई के दौरान देश भर में बारिश की स्थिति में काफी सुधार आया है। नदियों और जलाशयों (डैम) में पानी का स्तर अब सामान्य से बेहतर है। इसके अलावा, भारत सरकार के पास अनाज का बफर स्टॉक तय सीमा से लगभग 5 गुना अधिक मौजूद है।
भारत में महंगाई
सरकार और रिजर्व बैंक के सामने चुनौतियां
जब महंगाई सप्लाई रुकने, युद्ध या मौसम खराब होने की वजह से बढ़ती है, तो केवल रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरें (Repo Rate) बढ़ाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होती। अगर ब्रेंट क्रूड ऑयल 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना रहता है, तो केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों पर कड़ा फैसला लेना पड़ सकता है। हालांकि, असली राहत सरकार की नीतियों से ही संभव है। पर्याप्त सरकारी राशन का वितरण, जमाखोरी पर सख्ती, विदेशों से व्यापार के रास्तों को दुरुस्त रखना और किसानों को सही समय पर बीज व खाद उपलब्ध कराना ही आने वाले महीनों में भारतीय थाली को महंगा होने से बचा सकता है।
