India–US Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से रुकी हुई ट्रेड डील एक बार फिर तेजी पकड़ती नजर आ रही है। दोनों देशों के अधिकारी 10 से 12 दिसंबर तक तीन दिनों की महत्वपूर्ण चर्चा करने वाले हैं। माना जा रहा है कि यह बातचीत ट्रेड डील के पहले चरण को अंतिम रूप देने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है। भले ही इसे औपचारिक राउंड नहीं कहा जा रहा, लेकिन इसकी रणनीतिक अहमियत इसे बेहद महत्वपूर्ण बना रही है।
इस मीटिंग में अमेरिका की ओर से Deputy USTR रिक स्विट्ज़र की टीम हिस्सा लेगी। यह उनकी दूसरी भारत यात्रा होगी। रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर अमेरिकी नाराजगी के बाद भारत के कुछ उत्पादों पर 25% टैरिफ और 25% अतिरिक्त पेनल्टी लगाई गई थी। उसी मुद्दे पर आगे बातचीत के लिए अमेरिकी अधिकारी लगातार भारत से संवाद कर रहे हैं। इससे पहले अमेरिकी टीम 16 सितंबर को आई थी।
भारत से नेतृत्व करेंगे दर्पण जैन
भारत की ओर से इस बातचीत का नेतृत्व वाणिज्य विभाग के संयुक्त सचिव दर्पण जैन करेंगे। बड़े और व्यापक समझौते के लिए अमेरिका की तरफ से मुख्य वार्ताकार ब्रेंडन लिंच, Assistant USTR for South & Central Asia, हैं। भारत सरकार का मानना है कि इस साल के भीतर फ्रेमवर्क ट्रेड डील के मसौदे पर सहमति बन सकती है। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने भी संकेत दिया था कि यह डील भारत के निर्यात पर लग रहे भारी टैरिफ की समस्या को काफी हद तक कम कर सकती है।
फिलहाल भारत और अमेरिका के बीच दो स्तरों पर बातचीत चल रही है फ्रेमवर्क ट्रेड डील, जिसमें टैरिफ से जुड़े मुद्दों को हल करने पर जोर है, और कॉम्प्रिहेंसिव ट्रेड एग्रीमेंट, जो दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक व्यापारिक संबंध मजबूत करेगा। दोनों देशों ने फरवरी 2025 तक पहले चरण के पूरा होने का लक्ष्य तय किया है। अब तक 6 दौर की बातचीत हो चुकी है।
दोनों देशों का कारोबार कैसा है?
साल 2024-25 में भी अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर बना रहा। इस दौरान दोनों देशों के बीच कुल व्यापार 131.84 बिलियन डॉलर तक पहुंचा, जिसमें से 86.5 बिलियन डॉलर का निर्यात भारत ने अमेरिका को किया। अमेरिका भारत के कुल निर्यात में करीब 18% का योगदान देता है, जबकि भारत के कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी 6.22% है। वहीं कुल मर्चेंडाइज ट्रेड में अमेरिका का हिस्सा लगभग 10.73% रहता है। ये आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका भारत के लिए कितना बड़ा और महत्वपूर्ण व्यापारिक बाजार है।
हालांकि चिंता की बात यह है कि अक्टूबर में भारत का निर्यात लगातार दूसरे महीने गिरा और 8.58% घटकर 6.3 बिलियन डॉलर रहा। एक्सपोर्टर्स का मानना है कि अमेरिका द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ इसका मुख्य कारण हैं। इसलिए व्यापार जगत इस संभावित समझौते को एक राहत के रूप में देख रहा है।
अगर यह डील सफल रही और पहला चरण मंजूर हो गया तो भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ कम हो सकता है।इसके अलावा निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में बेहतर मौका मिलेगा, टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग बढ़ेगा और सप्लाई चेन और FDI पार्टनरशिप और मजबूत हो सकती है।
अब सभी निगाहें 10–12 दिसंबर की मीटिंग पर टिकी हैं। इस बातचीत से यह साफ होगा कि भारत–अमेरिका अपने करोड़ों डॉलर के व्यापार को आगे बढ़ाने के लिए किस रफ्तार से आगे बढ़ते हैं और क्या यह महत्वपूर्ण ट्रेड डील जल्द ही हकीकत बन पाएगी।
