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India-US Trade Deal : गोयल-ग्रीयर की मुलाकात; टैरिफ, कृषि और डिजिटल ट्रेड कहां फंसा पेंच?

भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर लंबे समय से चर्चा चल रही है। 23 जून को ट्रंप के विशेष वाणिज्य दूत भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से मिले। आखिर कौनसे मुद्दे हैं, जिनके चलते डील अटकी है?

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भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर बातचीत अंतिम चरण में है
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Jun 23, 2026, 14:27 IST
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India-US Trade Deal 2026 : 23 जून, 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर भारत के उद्योग एंव वाणिज्य मंत्री से मिले। भारत और अमेरिका के बीच होने वाली ट्रेड डील के लिहाज से इस बैठक को बेहद अहम माना जा रहा है। क्योंकि, दोनों देश पिछले करीब 1 साल से ट्रेड डील पर बात कर रहे हैं। लेकिन, अब तक यह बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है। भारत और अमेरिका के रिश्तों के लिहाज से ट्रेड डील बेहद अहम है।पिछले दिनों फ्रांस में आयोजित G7 की बैठक के इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ने समझौते को जल्द अंतिम रूप देने पर सहमति जताई। ऐसे में माना जा रहा है कि अब यह डील को लेकर हो रही बातचीत का आखिरी पड़ाव है।

टैरिफ की मनमानी पड़ी भारी

भारत और अमेरिका पहले से ही परस्पर कारोबार को 500 अरब डॉलर पहुंचाने के लिए एक व्यापक ट्रेड डील पर बात कर रहे थे। लेकिन, अप्रैल 2025 में ट्रंप ने टैरिफ लगाकर इस मामले को पेचीदा बना दिया। इसके बाद भारत और अमेरिका के वार्ताकारों का फोकस व्यापक ट्रेड डील की जगह एक अंतरिम समझौते पर है, जिसके तहत दोनों देश टैरिफ को ध्यान में रखते हुए ट्रेड डील करेंगे। ट्रंप की तरफ से मनमाने तरीके से थोपे गए टैरिफ की वजह से यह बातचीत पटरी से उतर गई। बाद में ट्रंप को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट और दूसरी अदालतों से टैरिफ नीति पर झटका लगा, इसके साथ ही ट्रंप की घरेलू मोर्चें पर आलोचना होने लगी, तो भारत से होने वाले आयात पर टैरिफ कम किया गया, जिसके बाद यह बातचीत फिर पटरी पर लौटी। लेकिन, हाल में ही अमेरिका ने जबरन श्रम के नाम पर अलग से भारत पर 12.5 फीसदी टैरिफ लगाया है।

तिथि महत्वपूर्ण घटनाक्रमरणनीतिक निहितार्थ
13 फरवरी, 2025मोदी और ट्रम्प द्वारा द्विपक्षीय व्यापार वार्ता (BTA) की घोषणा2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया।
2 अप्रैल, 2025अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा भारतीय वस्तुओं पर अतिरिक्त 26% टैरिफ का प्रस्ताव10% बेसलाइन और 16% पारस्परिक टैरिफ लागू करने की घोषणा की गई, जिसे बाद में निलंबित कर दिया गया।
6 अगस्त, 2025रूसी तेल खरीद के कारण भारत पर अतिरिक्त 25% दंडात्मक टैरिफ लगाया गयाकुल आयात शुल्क बढ़कर 50% हो गया, जिससे व्यापार वार्ता पर रणनीतिक दबाव बढ़ा।
2 फरवरी, 2026मोदी-ट्रम्प फोन वार्ता में टैरिफ को 18% तक कम करने पर सहमतिअंतरिम समझौते के तहत पारस्परिक टैरिफ को 25% (या 50%) से घटाकर 18% करने की रूपरेखा तैयार हुई।
7 फरवरी, 2026पहले चरण के अंतरिम समझौते के लिए संयुक्त बयान जारीटैरिफ में कटौती और भारत द्वारा अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों के आयात बढ़ाने की प्रतिबद्धता का खाका पेश किया गया।
20 फरवरी, 2026अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने पारस्परिक टैरिफ नीति को असंवैधानिक घोषित कियाअमेरिका को अपनी टैरिफ रणनीति में कानूनी बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
24 फरवरी, 2026अमेरिका ने सभी देशों पर 150 दिनों के लिए अस्थायी 10% टैरिफ लागू कियायह अवधि 24 जुलाई, 2026 को समाप्त हो रही है, जिससे मौजूदा वार्ता में तात्कालिकता बढ़ गई है।
23-24 जून, 2026वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और यूएसटीआर जेमिसन ग्रीयर के बीच नई दिल्ली में निर्णायक बैठकटैरिफ, कृषि और डिजिटल व्यापार से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर अंतिम सहमति बनाने का प्रयास।
टैरिफ पर क्या चाहता है भारत?

भारत के उद्योग व वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत के लिए केवल टैरिफ कम होना अहम नहीं है, बल्कि उसे दूसरे निर्यातकों के हिसाब से अमेरिकी बाजार में तरजीही पहुंच (Preferential Access) चाहिए।

क्यों 24 जुलाई से पहले डील चाहता है अमेरिका?

दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा मुद्दा टैरिफ का है। कहानी में बड़ा मोड़ तब आया जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन की पारस्परिक टैरिफ नीति को असंवैधानिक करार दिया। इसके बाद अमेरिका ने अस्थायी तौर पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लागू कर दिया, जिसकी अवधि 24 जुलाई 2026 को समाप्त हो रही है। यही वजह है कि जुलाई की डेडलाइन से पहले दोनों देशों पर समझौता करने का दबाव बढ़ गया है। भारत की चिंता यह है कि उसे अमेरिका में वियतनाम, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे प्रतिस्पर्धी देशों से बेहतर बाजार पहुंच मिले। यदि यह बढ़त नहीं मिली तो भारतीय निर्यातकों को बड़ा नुकसान हो सकता है। वहीं, अमेरिका चाहता है कि 10 फीसदी एक्स्ट्रा टैरिफ के साथ ही डील हो जाए।

India US Trade Deal info graph

India US Trade Deal info graph

किसानों को लेकर भारत सख्त

कृषि क्षेत्र इस समझौते का सबसे संवेदनशील हिस्सा बन गया है। अमेरिका चाहता है कि भारत मक्का, सोयाबीन उत्पाद, डीडीजीएस और अन्य कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करे या खत्म करे। यहीं पर भारत ने अपनी सबसे बड़ी ‘रेड लाइन’ खींच दी है। किसान संगठनों और विपक्ष का आरोप है कि इन उत्पादों के जरिए आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी जीएम फसलों को भारतीय बाजार में प्रवेश मिल सकता है। इससे घरेलू किसानों पर दबाव बढ़ेगा। सरकार साफ कर चुकी है कि गेहूं, चावल, डेयरी और कई संवेदनशील कृषि उत्पादों पर कोई समझौता नहीं होगा। भारत का मानना है कि किसानों के हितों की कीमत पर व्यापार समझौता राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से नुकसानदेह साबित हो सकता है।

Google-Meta पर नजर

इस समझौते का एक बड़ा मुद्दा डिजिटल व्यापार है। अमेरिका चाहता है कि भारत डेटा स्थानीयकरण के नियमों में ढील दे और सीमा पार डेटा प्रवाह को आसान बनाए। वहीं, भारत का रुख इससे बिल्कुल अलग है। सरकार का मानना है कि भारतीय नागरिकों का डेटा देश के कानूनों के तहत सुरक्षित रहना चाहिए। इसके साथ ही भारत अपने उभरते एआई और डिजिटल इकोसिस्टम पर नियंत्रण बनाए रखना चाहता है। यही कारण है कि भारत किसी भी ऐसे प्रावधान को स्वीकार करने के मूड में नहीं दिख रहा जो उसकी डिजिटल संप्रभुता को कमजोर करे। आने वाले वर्षों में यह मुद्दा टैरिफ से भी ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

अमेरिका से बढ़ा भारत का आयात

ट्रंप की दलील रही है कि आपसी व्यापार में भारत ट्रेड सरप्लस में रहता है। इसे लेकर भारत ने अमेरिका से एनर्जी आयात बढ़ा दिया है। इसकी वजह से एक साल में भारत का ट्रेड सरप्लस 41 फीसदी घट गया है। इसके साथ ही भारत अगले 5 वर्षों में अमेरिका से ऊर्जा, विमानन, कोकिंग कोल और अन्य उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीद की योजना पर काम कर रहा है। इससे यह भी संभव है कि ट्रेड बैलेंस अमेरिका के पक्ष में हो जाए। ऐसे में भारत अपनी कुछ शर्तों पर अड़ा है।

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