Semiconductor Manufacturing India : विकसित भारत का सपना पूरा करने के लिए हमें सेमीकंडक्टर जैसे एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आगे बढ़ना होगा। सरकार फिलहाल पूरी ताकत से भारत में सेमीकॉन मैन्युफैक्चरिंग का इकोसिस्टम डेवलप करने में जुटी है। लेकिन, इडस्ट्री एक्स्पर्ट बताते हैं कि चुनौती निवेश और तकनीक से ज्यादा टैलेंट पूल की है। क्योंकि, सेमीकॉन मैन्युफैक्चरिंग एक ऐसा काम है, जहां हाई एंट्री बैरियर है और टैलेंट पूल की भारी कमी है। बहरहाल, भारत के सेमीकॉन सुपरपावर बनने के ड्रीम की सबसे बड़ी अड़चन को IIT Bombay के कुछ छात्रों ने दूर करने में जुटे हैं।
IIT Bombay के छात्रों का कमाल
दुनियाभर में बहुत कम देश हैं, जहां सेमीकंडक्टर फैक्ट्रियां हैं। क्योंकि, इन्हें बनाने में अरबों डॉलर खर्च होते हैं। लेकिन, वहीं IIT Bombay के कुछ अंडरग्रेजुएट छात्रों ने सिर्फ ₹30 लाख में ऐसी स्टूडेंट-रन चिप फैब्रिकेशन लैब तैयार कर दी है, जिसने पूरे टेक जगत का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। यह सिर्फ एक कॉलेज प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि भारत के सेमीकंडक्टर मिशन को नई दिशा देने वाला मॉडल बन सकता है।
Aryaman with Fellow Students
असल में अगस्त 2025 में आर्यमान भाटिया, अभिनीत अग्रवाल और कार्तिक यूसी नाम के तीन अंडरग्रेजुएट छात्रों ने HackerFab IITB की शुरुआत की। महज 10 महीनों में उन्होंने रिसर्च और डेवलपमेंट सहित लगभग ₹30 लाख की लागत से भारत की पहली स्टूडेंट-रन सेमीकंडक्टर फैब तैयार कर ली। सबसे खास बात यह है कि पूरा प्रोजेक्ट ओपन-सोर्स है, यानी देश का कोई भी कॉलेज इसे दोहरा सकता है।
आखिर उन्होंने क्यों शुरू की ये पहल?
आर्यमान भाटिया ने बताया कि सेमीकंडक्टर चिप बनाने के लिए जिन मशीनों की जरूरत होती है, उनमें से तीन सबसे अहम मशीनें छात्रों ने खुद डिजाइन और तैयार की हैं। आर्यमान बताते हैं कि ज्यादातर इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें छात्र के तौर पर AI, ड्रोन्स और रोबोटिक्स जैसे सब्जेक्ट्स की तरह प्रैक्टिकल एक्स्पोजर नहीं मिल है। इसके साथ ही आर्यमान कहते हैं कि आज दुनियाभर में सेमीकॉन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के इंजीनियर्स और रिसर्चर की मांग है, लेकिन टैलेंट पूल की भारी कमी है। भारत के सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के सपने में भी यह बड़ी बाधा है। इस बाधा से निपटने के लिए ही उन्होंने यह पहल की है।
क्यों है यह भारत के लिए गेम-चेंजर?
आर्यमान बताते हैं कि भारत में ज्यादातर इंजीनियरिंग कॉलेजों में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग अभी तक सिर्फ किताबों तक सीमित है। छात्र लिथोग्राफी, डिपोजिशन और एचिंग जैसी प्रक्रियाएं पढ़ते तो हैं, लेकिन उन्हें फैक्ट्री या लैब में इन प्रक्रियाओं को अपने हाथों से करने का अनुभव नहीं मिलता है। HackerFab इस समस्या का समाधान पेश करता है। यह छात्रों को वास्तविक चिप फैब्रिकेशन प्रक्रिया पर काम करने का मौका देता है, जिससे उद्योग के लिए तैयार इंजीनियर तैयार किए जा सकते हैं। इस प्रोजेक्ट की दूसरी बड़ी ताकत इसकी फ्रुगल इनोवेशन सोच है। महंगे विदेशी उपकरण खरीदने के बजाय छात्रों ने पुराने प्रोजेक्टर, ड्रोन मोटर और कम कीमत वाले कंपोनेंट्स का इस्तेमाल किया। कई रिटायर्ड इंजीनियरों ने ऑनलाइन मार्गदर्शन देकर इस प्रयास को सफल बनाया।
भारत के सेमीकंडक्टर मिशन में क्यों है अहम भूमिका?
भारत सरकार India Semiconductor Mission के तहत बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है। देश में नई फैब्रिकेशन और पैकेजिंग यूनिट्स स्थापित की जा रही हैं और लक्ष्य 2030 तक भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर हब बनाना है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती मशीनें नहीं, बल्कि प्रशिक्षित इंजीनियर हैं।
अनुमान है कि 2027 तक भारत को 2.5 से 3.5 लाख अतिरिक्त सेमीकंडक्टर प्रोफेशनल्स की जरूरत होगी। बड़ी फैब्रिकेशन यूनिट्स बनने के बाद उन्हें चलाने, मेंटेन करने और नई तकनीक विकसित करने के लिए व्यावहारिक अनुभव रखने वाले इंजीनियर चाहिए होंगे। यहीं HackerFab जैसी पहल सबसे महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
पूरे देश में फैल सकता है यह मॉडल
HackerFab की सबसे बड़ी ताकत इसका ओपन-सोर्स मॉडल है। मशीनों के डिजाइन, निर्माण प्रक्रिया और तकनीकी दस्तावेज GitHub पर उपलब्ध हैं। आर्यमान कहते हैं कि उनका मकसद सेमीकॉन मैन्युफैक्चरिंग टेक की प्रैक्टिकल नॉलेज को डेमोक्रेटाइज करना है, ताकि केवल IIT Bombay ही नहीं, बल्कि देशभर के इंजीनियरिंग कॉलेज कम लागत में सेमीकंडक्टर लैब बनाई जा सके और हजारों छात्रों को हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण मिले।
छात्रों ने क्या बनाया
- पहली मशीन DLP आधारित Maskless Lithography System है, जिसे एक पुराने प्रोजेक्टर को मॉडिफाई करके बनाया गया। यह 3 से 4 माइक्रोन स्तर तक बेहद सटीक पैटर्न तैयार कर सकती है।
- दूसरी मशीन High-Temperature Tube Furnace है, जो 1100 से 1200 डिग्री सेल्सियस तक तापमान पैदा करती है और सिलिकॉन ऑक्सीडेशन जैसी प्रक्रियाओं में काम आती है।
- तीसरी मशीन DC Plasma Sputterer है, जो अल्ट्रा-हाई वैक्यूम में सिलिकॉन वेफर पर बेहद पतली धातु की परत चढ़ाने का काम करती है।
- इन मशीनों की मदद से टीम पहले ही डायोड और MOSCAP डिवाइस सफलतापूर्वक तैयार कर चुकी है, जबकि अब NMOS ट्रांजिस्टर विकसित करने पर काम चल रहा है।
₹30 लाख बनाम लाखों करोड़ की फैक्ट्री
आमतौर पर किसी विश्वविद्यालय स्तर की छोटी सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन लैब बनाने में भी कई करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं। वहीं दुनिया की सबसे आधुनिक कमर्शियल फैब, जैसे TSMC की फैक्ट्री, लगाने में ₹80,000 करोड़ से लेकर ₹1.6 लाख करोड़ तक की लागत आती है। इसके मुकाबले IIT Bombay के छात्रों ने केवल ₹30 लाख में ऐसा सेटअप तैयार कर दिया। उनका दावा है कि यदि कोई दूसरा कॉलेज इस मॉडल को अपनाए तो वह इसे लगभग ₹15-20 लाख में भी बना सकता है। आर्यमान कहते हैं कि उनका मकसद कमर्शियल ग्रेड के चिप तैयार नहीं करना है, बल्कि छात्रों को प्रैक्टिकल एक्सपोजर मिले उसके लिए किफायती तरीका निकालना है। वे इस काम को जहां 30 लाख में कर रहे हैं, वही काम दुनियाभर में करोड़ों रुपयों में बनी लैब्स में किया जाता है।
भविष्य में क्या बदल सकता है?
आर्यमान कहते हैं कि यदि यह मॉडल देशभर के कॉलेजों तक पहुंचता है, तो हजारों छात्र वास्तविक चिप निर्माण सीख सकेंगे। छोटे शहरों के इंजीनियरिंग कॉलेज भी सेमीकंडक्टर रिसर्च का हिस्सा बन पाएंगे। इससे नए स्टार्टअप्स, स्थानीय रिसर्च और कम लागत वाली फैब्रिकेशन टेक्नोलॉजी विकसित होगी। एक तरफ सरकार फैब, निवेश और नीतियां तैयार कर रही है, तो दूसरी तरफ HackerFab जैसे प्रोजेक्ट भविष्य के इंजीनियर तैयार कर रहे हैं। यही तालमेल भारत को सिर्फ चिप असेंबली नहीं, बल्कि चिप डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी में भी वैश्विक खिलाड़ी बना सकता है।
