होम लोन एक बड़ा वित्तीय बोझ होता है। अधिकांश घर खरीदने वाले लोग होम लोन लेते हैं। बैंक अक्सर 20 साल के लिए होम लोन देते हैं। इस वित्तीय जिम्मेदारी को वहन करने में आधी जिंदगी निकल जाती है। हालांकि, थोड़ी समझदारी से इस बोझ को हद तक कम किया जा सकता है और होम लोन पर लगने वाले ब्याज से राहत पाई जा सकती है। आज हम आपको बता रहे हैं कि कैसे आप 50 लाख रुपये के लोन पर आसानी से 15 लाख रुपये तक बचत कर सकते हैं। इस काम में आप पर कोई वित्तीय बोझ भी नहीं बढ़ेगा। तो आइए जानते हैं कि आप यह काम कैसे कर सकते हैं।
होम लोन
इस तरह कर सकते हैं बचत
रियल एस्टेट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, लोन लेने वालों को ध्यान रखना चाहिए कि साल में सिर्फ एक एक्स्ट्रा होम लोन EMI से स्टैंडर्ड मॉर्गेज में लगभग 5 साल की बचत हो सकती है और लोन लेने वालों को ब्याज में 15 लाख रुपये से ज़्यादा की बचत हो सकती है। इसको उदाहरण से समझते हैं: ग्रुरुग्राम में रहने वाले 35 साल के रमेश ने 25 साल के लिए 8.5 प्रतिशत ब्याज दर पर ₹60 लाख का होम लोन लिया है। अगर वह साल में एक एक्स्ट्रा EMI बैंक को देंगे तो उनका कुल लेान पीरियड 5 कम हो सकते हैं और ब्याज में ₹15 लाख से ज्यादा की बचत हो सकती है।
होम लोन की एक एक्स्ट्रा ईएमआई चुकाने में बोनस और वेरिएबल पे का इस्तेमाल कर सकते हैं। जानकारों का कहना है कि होम बायर्स को फोकस कुल चुकाए जाने वाले इंटरेस्ट को कम करने पर होना चाहिए, न कि सिर्फ कम EMI के पीछे भागने पर। स्टेबल रेट के माहौल में, वही EMI जारी रखने से लोन का समय तेजी से कम करने में मदद मिलती है। पार्ट-प्रीपेमेंट के लिए बोनस या सालाना इंक्रीमेंट का इस्तेमाल करने से समय के साथ इंटरेस्ट का खर्च कम हो सकता है।
होम लोन लेने में इन बातों का ख्याल रखें
चुकाने की क्षमता: होम लोन लेने से सबसे पहले अपनी चुकाने की क्षमता का आकलन करें। आपकी मासिक EMI, आपकी नेट इनकम के 30–35% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
ब्याज दर: होम लोन लेने से पहले फ्लोटिंग और फिक्स्ड रेट में फर्क जरूर समझें। फ्लोटिंग रेट आमतौर पर कम होता है लेकिन RBI की नीतियों के साथ बदलता रहता है, जबकि फिक्स्ड रेट स्थिर रहता है पर शुरुआती दर ज्यादा हो सकती है। लोन लेते समय यह देखें कि आपके लिए कौन सा विकल्प बेहतर है।
लोन अवधि: लोन की अवधि का चुनाव सोच-समझकर करें। लंबी अवधि से EMI कम हो जाती है, लेकिन कुल ब्याज ज्यादा देना पड़ता है। वहीं छोटी अवधि में EMI ज्यादा होती है, पर ब्याज कम चुकाना पड़ता है। सही बैलेंस बनाना जरूरी है।
इसके अलावा प्रोसेसिंग फीस, प्री-पेमेंट चार्ज और अन्य छिपे खर्च जरूर जांचें। कई बैंक कम ब्याज दर दिखाकर अतिरिक्त चार्ज जोड़ देते हैं, जिससे लोन महंगा पड़ सकता है।
