उड़ानें महंगी, विकल्प कम: इंडिगो-एयर इंडिया के भरोसे कब तक? समझें क्यों चाहिए एक और बड़ी एयरलाइन?

भारत के घरेलू आसमान पर इंडिगो और एयर इंडिया की 'डुओपोली' का कब्जा है। सीमित विकल्पों और मनमाने किराए से परेशान यात्रियों को अब एक तीसरे मजबूत प्लेयर की सख्त जरूरत है, लेकिन कठिन सरकारी नीतियां राह का सबसे बड़ा रोड़ा हैं।

भारतीय एविएशन इंडस्ट्री आज अपने सबसे सुनहरे दौर से गुजर रही है। नए-नए एयरपोर्ट्स का निर्माण हो रहा है, पैसेंजर्स की संख्या लगातार नए रिकॉर्ड तोड़ रही है और देश में हवाई सफर करने वालों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। लेकिन इस शानदार तस्वीर के पीछे एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि भारतीय आसमान में अब विकल्प बेहद सीमित हो चुके हैं। देश का घरेलू एविएशन मार्केट लगभग पूरी तरह से दो बड़े प्लेयर्स इंडिगो (IndiGo) और एयर इंडिया ग्रुप (Air India Group) के हाथों में सिमट कर रह गया है। यह दोनों कंपनियां मिलकर मार्केट का करीब 90 फीसदी हिस्सा कंट्रोल करती हैं। जब किसी भी इंडस्ट्री में सिर्फ दो ही बड़े खिलाड़ियों का दबदबा हो जाता है, तो उसे 'डुओपोली' (Duopoly) कहा जाता है।

Why India needs Third Airline

इंडिगो-एयर इंडिया के भरोसे कब तक?

सीमित विकल्प और महंगा किराया

इस स्थिति का सबसे सीधा और बड़ा नुकसान आम यात्रियों को उठाना पड़ रहा है। प्रतिस्पर्धा (Competition) की कमी के कारण हवाई यात्रा की टिकटें लगातार महंगी हो रही हैं, पीक सीजन या इमरजेंसी के वक्त फ्लाइट्स के किराए आसमान छूने लगते हैं और उड़ानों के कैंसिल या लेट होने पर यात्रियों के पास किसी दूसरी एयरलाइन में शिफ्ट होने का विकल्प तक नहीं बचता। ऐसे में यह सवाल बेहद गंभीर हो चुका है कि आखिर भारत को एक तीसरी मजबूत और बड़ी एयरलाइन की जरूरत क्यों है, और इस राह में सबसे बड़ी सरकारी व नीतिगत रुकावटें क्या हैं।

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