Functional Urban Settlements : तेजी से बदलते ग्रामीण और शहरी परिदृश्य को देखते हुए केंद्र सरकार एक बड़े नीतिगत बदलाव करने की तैयारी में है। देश में अभी तक किसी भी इलाके को केवल दो ही श्रेणियों 'ग्रामीण' (Rural) या 'शहरी' (Urban) में बांटा जाता है। लेकिन, अब सरकार इनके बीच की एक तीसरी नई कैटेगरी 'फंक्शनल अर्बन सेटलमेंट्स' (Functional Urban Settlements) बनाने पर विचार कर रही है।
गांव शहर के बीच बनेगी तीसरी कैटेगरी
TOI की रिपोर्ट के मुताबिक आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स (NIUA) के एक अध्ययन में एक नए नेशनल सेटलमेंट क्लासिफिकेशन फ्रेमवर्क (National Settlement Classification Framework) की सिफारिश की है। इस रिपोर्ट को प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा की तरफ से जारी किया गया है।
क्या हैं 'फंक्शनल अर्बन सेटलमेंट्स'
फंक्शनल अर्बन सेटलमेंट्स गांव और शहरों के बीच की कड़ी हैं। यह कैटेगरी देश के उन अर्ध-शहरी या संक्रमणकालीन (Transitional) क्षेत्रों को सटीक रूप से परिभाषित करती है, जो कागजों या प्रशासन में तो 'गांव' हैं, लेकिन उनका रहन-सहन और अर्थव्यवस्था पूरी तरह 'शहर' जैसी हो चुकी है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और केरल जैसे कई राज्यों में शहरों से सटे गांवों का दौरा करने पर दिखता है कि वहां अब खेती पर निर्भरता बेहद कम हो गई है, पक्के मकान (Built-up area) बन चुके हैं और हाई-स्पीड ट्रांसपोर्ट जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं।
क्यों पड़ी इस बदलाव की जरूरत
रिपोर्ट में मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि देश में वास्तविक शहरीकरण दर्ज किए गए आंकड़ों से कहीं अधिक है। कई इलाके पूरी तरह शहरी लक्षण प्रदर्शित करते हैं, लेकिन प्रशासनिक रूप से आज भी उनका संचालन ग्राम पंचायतों के जरिये किया जा रहा है। इससे शहरीकरण के भूगोल और शासन व्यवस्था के बीच एक बड़ा अंतर पैदा हो गया है।
शहरीकरण के आंकड़े चौंकाने वाले
फिलहाल भारत में शहरीकरण को केवल दो मापदंडों पर मापा जाता है। स्टैच्यूटरी टाउन यानी जहां नगरपालिका संस्थाएं हैं और सेंसस टाउन यानी जहां 5,000 से अधिक आबादी है। इस पुराने ढर्रे के कारण आंकड़ों में बड़ा अंतर दिखाई देता है। सरकार के मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से देश की केवल 36% आबादी शहरों में रहती है। जबकि, संयुक्त राष्ट्र (UN) के फ्रेमवर्क 2025 : डिग्री ऑफ अर्बनाइजेशन पर आधारित अनुमान के मुताबिक, साल 2025 तक भारत की करीब 84% आबादी शहरी बस्तियों (Urban Settlements) में रह रही थी।
सैटेलाइट से तय होगा शहर का दायरा
अब तक शहरीकरण का पैमाना प्रशासनिक सीमाएं या जनसंख्या की दहलीज (Population Threshold) हुआ करता था, लेकिन इस नए मैट्रिक्स में तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। सरकार अब नाइट-टाइम लाइट (NTL) पद्धति का उपयोग कर रही है। इसके तहत सैटेलाइट सेंसर के जरिए रात के समय चमकने वाले (रोशनी की तीव्रता वाले) इलाकों के आधार पर यह तय किया जाएगा कि किसी शहर या फंक्शनल टाउन का वास्तविक भौगोलिक विस्तार कहां तक हो चुका है।
शहरों की नई 'टियर' व्यवस्था
मंत्रालय छोटे-बड़े शहरों के लिए अलग नीति, निवेश और प्लानिंग तैयार करने के लिए टियर-2, 3, 4 और 5 शहरों का एक समान वर्गीकरण अंतिम रूप दे रहा है। इसके साथ ही, टियर-1 महानगरों को भी आबादी के आधार पर तीन उप-श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव है। सरकार ने पिछले बजट में सिटी इकोनॉमिक रीजन्स (CERs) के लिए वित्तीय सहायता की भी घोषणा की थी, जो प्रशासनिक सीमाओं से परे जाकर रणनीतिक आर्थिक हब के रूप में काम करेंगे।
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