Strait of Hormuz history: ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान होर्मुज की खाड़ी (Strait of Hormuz) की ओर खींच लिया है। 28 फरवरी को ईरान द्वारा समुद्री रास्ता बंद करने और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की गई नेवल नाकाबंदी ने इस जलमार्ग की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है। लेकिन यह खींचतान नई नहीं है। यह उस सदियों पुराने इतिहास का हिस्सा है जहां वैश्विक ताकतों ने इस 'टोलगेट' पर कब्जे के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। आइए इतिहास के पन्नों से इस अहम समुद्री मार्ग की कहानी आपको बताते हैं।
होर्मुज का इतिहास
16वीं सदी: पुर्तगालियों की सैन्य घेराबंदी
सदियों तक होर्मुज साम्राज्य दुनिया के सबसे अमीर व्यापारिक केंद्रों में से एक था। इसकी किस्मत 1515 में तब बदली जब पुर्तगाली साम्राज्य ने इस पर कब्जा कर लिया। पुर्तगालियों का मॉडल पूरी तरह किलेबंदी और सैन्य शक्ति पर आधारित था। उन्होंने होर्मुज को एक विशाल किले में तब्दील कर दिया और भारत से आने वाले मसालों व रेशम के व्यापार पर भारी टैक्स वसूलना शुरू किया। करीब एक सदी तक पुर्तगालियों ने इस समुद्री द्वार पर एकछत्र राज किया।
17वीं और 18वीं सदी: एंग्लो-डच प्रतिद्वंद्विता
1622 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) ने फारस के सफाविद साम्राज्य के साथ मिलकर पुर्तगालियों को खदेड़ दिया। इसके बाद मैदान में उतरी डच ईस्ट इंडिया कंपनी। डच लोग पुर्तगालियों से अधिक आक्रामक और व्यापारिक रूप से कुशल थे। उन्होंने 17वीं सदी में मसालों के व्यापार पर एकाधिकार जमा लिया। हालांकि, अंदरूनी भ्रष्टाचार और युद्धों के भारी खर्च ने डच शक्ति को खोखला कर दिया। 1784 में चौथे एंग्लो-डच युद्ध के बाद डचों की विदाई हुई और अंग्रेजों के लिए रास्ता साफ हो गया।
ब्रिटिश दबदबा और 'ट्रूशियल स्टेट्स' का उदय
ब्रिटेन का लक्ष्य पुर्तगालियों की तरह सिर्फ टैक्स वसूलना नहीं था, बल्कि अपने सबसे कीमती उपनिवेश—ब्रिटिश इंडिया के समुद्री रास्तों को सुरक्षित करना था। 1819 में स्थानीय बेड़ों को नष्ट करने के बाद, अंग्रेजों ने एक नया मॉडल अपनाया। उन्होंने स्थानीय अरब शासकों के साथ 'शांति संधियां' कीं। इन राज्यों को 'ट्रूशियल स्टेट्स' कहा गया, जो आज का संयुक्त अरब अमीरात (UAE) है। ब्रिटेन ने इन शासकों को आंतरिक स्वायत्तता तो दी, लेकिन उनकी विदेश नीति और समुद्री सुरक्षा पर खुद नियंत्रण कर लिया।
पुर्तगाली बनाम ब्रिटिश
पुर्तगाली और ब्रिटिश नियंत्रण के तरीकों में बुनियादी फर्क था, जिसने लंबे समय तक इस क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित किया।
पुर्तगाली मॉडल (हस्तक्षेप और किला): पुर्तगालियों का दृष्टिकोण सीधे सैन्य कब्जे का था। उन्होंने भारी-भरकम किलों का निर्माण किया और व्यापार को सीधे तौर पर डरा-धमका कर नियंत्रित किया। उनका ध्यान केवल तत्काल राजस्व वसूली पर था, जिससे वे स्थानीय शक्तियों के बीच अलोकप्रिय रहे।
ब्रिटिश मॉडल (कूटनीति और सुरक्षा): अंग्रेजों ने महसूस किया कि इतने दूरदराज के इलाके में सीधे शासन करना महंगा और अस्थिर होगा। इसलिए उन्होंने 'इनडायरेक्ट रूल' (अप्रत्यक्ष शासन) को चुना। उन्होंने खुद को क्षेत्र के 'अंपायर' या रक्षक के रूप में पेश किया। स्थानीय शेखों के साथ संधियाँ करके उन्होंने समुद्री डकैती रोकी और यह सुनिश्चित किया कि कोई दूसरी यूरोपीय ताकत यहाँ कदम न रख सके। यह मॉडल कम खर्चीला और अधिक टिकाऊ साबित हुआ।
इतिहास फिर अपने को दोहरा रहा
आज जब हम ईरान को होर्मुज की खाड़ी बंद कर दिया है और अमेरिका ने अपनी नौसेना के जरिये नाकेबंदी की है, तो यह 17वीं और 19वीं सदी के संघर्षों की ही गूंज लगती है। फर्क सिर्फ इतना है कि उस दौर में संघर्ष 'मसालों और रेशम' के लिए था, और आज यह 'तेल और गैस' के लिए है। होर्मुज की खाड़ी कल भी वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन थी और आज भी है।
