पासबुक की लाइनों से लेकर QR कोड की स्कैनिंग तक...जानें 1947 से अबतक कैसे बदली भारत की बैंकिंग!

1947 में आजादी के वक्त बैंक खाता होना किसी बड़े मुकाम से कम नहीं था, जबकि आज महज एक क्लिक में यूपीआई (UPI) से सेकेंडों में पेमेंट हो जाता है। जानिए भारत की बैंकिंग व्यवस्था के इस ऐतिहासिक और क्रांतिकारी सफर के बारे में।

वर्ष 1947 में जब भारत आजाद हुआ, उस समय देश का बैंकिंग सेक्टर बेहद सीमित और प्राथमिक स्तर पर था। उस दौर में बैंक खाता खोलना केवल बड़े उद्योगपतियों, रसूखदार लोगों या फिर शहर के अमीर वर्ग के बस की बात थी। आम नागरिक, किसान और छोटे व्यापारी बैंकिंग सेवाओं से कोसों दूर थे। बैंकों का संचालन ज्यादातर निजी हाथों में था और उनकी शाखाएं मुख्य रूप से बड़े शहरों तक ही सीमित थीं। गांवों में रहने वाली देश की बहुसंख्यक आबादी अपनी छोटी-मोटी जरूरतों और कर्ज के लिए स्थानीय साहूकारों या जमींदारों पर ही निर्भर रहती थी, जहां उनसे भारी-भरकम ब्याज वसूला जाता था।

Passbook to UPI

जानें 1947 से अबतक कैसे बदली भारत की बैंकिंग!

बैंकों का राष्ट्रीयकरण (1969)

भारत में बैंकिंग सेवाओं का असली विस्तार 1969 में शुरू हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण (Nationalization) करने का ऐतिहासिक फैसला लिया। इसके बाद 1980 में 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इस कदम का मुख्य उद्देश्य बैंकों को केवल मुनाफा कमाने का जरिया न बनाकर उन्हें सामाजिक और आर्थिक विकास से जोड़ना था। राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों की शाखाएं तेजी से ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों में खुलने लगीं, जिससे पहली बार देश का किसान और मध्यम वर्ग बैंकिंग व्यवस्था से सीधे तौर पर जुड़ सका।

End of Feed