US-Iran Ceasefire: अमेरिकी राष्ट्रपति ने महाविनाश की धमकी के बाद बुधवार को ईरान के साथ सीजफायर का ऐलान कर दिया है। ईरान द्वारा होर्मुज खोलने की सहमति के बाद दोनों देशों के बीच 14 दिन का युद्ध विराम हुआ है। उम्मीद है कि यह शांति आगे भी जारी रहेगी। मिडिल ईस्ट में शांति लौटने से पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली है। इस खबर से क्रूड ऑयल की कीमत एक झटके में 15% से अधिक लुढ़क गई है। यह भारत के लिए बड़ी राहत की खबर है। आइए समझते हैं कि इस सीजफायर का पूरी दुनिया पर क्या असर होगा? आपको कैसे राहत मिलेगी? भारत के परिपेक्ष में इसके क्या मायने हैं?
वैश्विक इकोनॉमी पर क्या होगा असर?
सीजफायर भले ही वह कुछ समय के लिए ही क्यों न हो, इस बात का संकेत देता है कि तत्काल खतरा शायद टल रहा है। इस सीजफायर के फौरन बाद, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की कीमतें गिर गई हैं, और मध्य-पूर्व से मिली इस अच्छी खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए एशियाई बाजारों में अचछी तेजी है। में शुरुआती कारोबार में तेजी देखी गई। तनाव का केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य रहा है—पानी का एक संकरा रास्ता, जिससे दुनिया के तेल की एक बड़ी खेप चुपचाप गुज़रती है। जब इस रास्ते पर किसी टकराव का खतरा मंडराता है, तो दुनिया भर के बाज़ार तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं। तेल कारोबारी जोखिम को कीमतों में शामिल कर लेते हैं, बीमा कंपनियां प्रीमियम बढ़ा देती हैं, और सरकारें तेल की आपूर्ति में रुकावटों से निपटने की तैयारी शुरू कर देती हैं। अब क्रूड सस्ता होने का सीधा फायदा दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को मिलेगा, क्योंकि ऊर्जा लागत कम होने से महंगाई पर दबाव घटेगा। इससे दुनियाभर में महंगाई में कमी आएगी और मांग बढ़ेगी जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार तेज करेगा।
मिडिल ईस्ट के लिए इसका क्या मतलब है?
मिडिल ईस्ट के देशों के लिए, यह विराम राहत लेकर आया है। इस युद्ध के चलते यह क्षेत्र काफी प्रभावित रहा है। UAE, सऊदी अरब, ओमान, कतर और बहरीन जैसे कई देशों को ईरान-इज़रायल संघर्ष के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ा है, क्योंकि लड़ाई के दौरान ईरानी सेनाओं ने उनके प्रमुख ठिकानों को निशाना बनाया था। दुबई और कुवैत जैसे महत्वपूर्ण केंद्रों में भी निवेश के माहौल और व्यापार प्रवाह पर गहरा असर पड़ा है। युद्धविराम के बाद इस क्षेत्र में फिर से कारोबारी गतिविधियां तेज होंगी।
भारत को कहां और कितनी राहत?
- पेट्रोल-डीजल महंगा नहीं होगा: ईरान संकट के कारण कच्चे तेल की कीमत एक महीने में डबल हो गई थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। हालांकि, आज सीजफायर के ऐलान के बाद कच्चे तेल का दाम तेजी से लुढ़का है। इससे भारत को बड़ी राहत मिली है। कच्चा तेल सस्ता होने से आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमत बढ़ाने की जरूरत नहीं होगी।
- महंगाई को कंट्रोल करना आसान होगा: कच्चे तेल की कीमत कम होने से महंगाई को काबू करना आसान होगा। अगर क्रूड में तेजी बनी रहती तो देश में डीजल को महंगा करना सरकार की मजबूरी होती। इससे ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ती। यह महंगाई को बढ़ाता लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। इससे महंगाई को कंट्रोल करने में मदद मिलेगी। ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत घटने से रोजमर्रा की चीजें सस्ती हो सकती हैं।
- रुपया मजबूत होगा: कच्चा तेल सस्ता होने से रुपये में मजबूती लौटेगी। ऐसा विदेशी निवेश बढ़ने से रुपये पर दबाव कम होगा।
- करंट अकाउंट घाटा घटेगा: कम तेल बिल से भारत का आयात खर्च कम होगा।
- एविएशन और ट्रांसपोर्ट सेक्टर को फायदा मिलेगा: ईंधन सस्ता होन से हवाई यात्रा और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा। ईंधन लागत कम होने से एयरलाइंस कंपनियों का मुनाफा बढ़ सकता है।
- घर का बजट नहीं बढ़ेगा: ईरान युद्ध के कारण ईंधन के दाम बढ़ रहे थे। सरकार की ओर से गैस की कीमत बढ़ाई भी गई थी। आगे पेट्रोल और डीजल भी महंगा होता है। इससे सभी जरूरी सामान के दाम बढ़ते जो घर का बजट बढ़ाते। अब युद्ध खत्म होने से यह खतरा टल गया है।
बुलियन मार्केट पर असर
अमेरिकी-ईरान सीजफायर का बुलियन मार्केट (सोना-चांदी) पर भी असर देखने को मिल रहा है। अमेरिका-ईरान सीजफायर के बाद सोने और चांदी में बड़ी तेजी है। यह निवेशकों के लिए एक अच्छी खबर है। लेकिन आगे क्या होगा, यह एक बड़ा सवाल है।
US-Iran Ceasfire
चुनौतियां अभी भी बरकरार
हालांकि, युद्ध टलने की ख़बर एक बड़ी राहत है, लेकिन ग्लोबल इकोनॉमी और ईरान अब होर्मुज पर अपने नियंत्रण को औपचारिक रूप देने की कोशिश कर रहा है। एक संभावित दीर्घकालिक शांति समझौते से जुड़े अपने प्रस्तावों के हिस्से के तौर पर, तेहरान चाहता है कि उसे होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से ट्रांजिट शुल्क लेने का अधिकार मिले। अधिकारियों के अनुसार, ये शुल्क तय नहीं होंगे, बल्कि जहाज के प्रकार, उसके माल की प्रकृति और मौजूदा परिस्थितियों के आधार पर इनमें बदलाव हो सकता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान एक ऐसे ढांचे पर भी काम कर रहा है जिसके तहत जहाजों को वहां से गुजरने की अनुमति मिलने से पहले परमिट या लाइसेंस लेना जरूरी हो सकता है। ऐसे में किसी भी छोटी सी घटना से तनाव फिर से बढ़ सकता है।
